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ब्लॉग: अपनी कथनी-करनी के प्रति जवाबदेह हों नेता

By विश्वनाथ सचदेव | Updated: August 30, 2024 11:07 IST

पांच साल में एक बार वोट देना ही पर्याप्त नहीं है, इस बात का भी ध्यान रखना जरूरी है कि हमारे वोट से नेता बना व्यक्ति अपने वादों और दावों पर खरा उतर रहा है कि नहीं।

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टीवी पर अदालत से संबंधित एक कार्यक्रम आया करता है, इस अदालत के ‘वकील’ से किसी ने पूछा था, ‘अभिनेता अच्छे नेता होते हैं या नेता अच्छे अभिनेता’, तो ‘वकील साहब’ को यह कहने में तनिक भी देरी नहीं लगी कि नेता अच्छे अभिनेता होते हैं! और इस उत्तर पर श्रोताओं ने खूब तालियां बजाई थीं– अर्थात श्रोता भी यह जानते-मानते थे कि हमारे नेता अच्छे अभिनेता हैं! नेता-अभिनेता वाला यह प्रसंग अचानक तब याद आ गया जब एक नई-नई नेता बनी अभिनेत्री को किसान-आंदोलन के संदर्भ में यह कहते सुना कि हमारे देश में भी बांग्लादेश जैसे हालात पैदा करने का षड्यंत्र रचा जा रहा था।

उसी सांस में उसने यह भी कह दिया कि साल भर से अधिक समय तक चलने वाले उस आंदोलन में ‘लाशें लटकी हुई थीं और बलात्कार हो रहे थे।’ यह सही है कि उस आंदोलन के दौरान लगभग सात सौ किसानों की मृत्यु हुई थी, पर उसे ‘लाशें लटकना’ कहना क्या मायने रखता है, यह बात शायद उस अभिनेत्री को समझ नहीं आई थी,  और फिर किसान आंदोलन को कथित बलात्कारों से जोड़ने से कितना राजनीतिक नुकसान हो सकता है,  यह भी उसकी समझ से परे की बात थी।

ऐसे अवसर पर बड़ी आसानी से राजनीतिक नेतृत्व यह कहकर अपना पल्ला झाड़ लेता है कि यह कथित नेता का निजी बयान है. सवाल उठता है, इस तरह की निजी राय रखने वाले व्यक्ति को राजनीतिक पार्टियों तरजीह ही क्यों देती हैं? किसी भी राजनीतिक दल का सदस्य होने का सबसे महत्वपूर्ण मतलब यह होता है कि व्यक्ति पार्टी की रीति-नीति में विश्वास रखता है। उसका आचरण इसी विश्वास के अनुरूप होना चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य से, हमारे देश में नीतियों के आधार पर राजनीतिक दलों का बनना और चलना अब कतई आवश्यक नहीं रहा!

रीतियों-नीतियों को लेकर दावे जरूर किए जाते हैं, पर व्यवहार में ऐसा कुछ दिखाई नहीं देता। यदि ऐसा न होता तो नेताओं का आए दिन दल बदलना हमारी राजनीति का हिस्सा नहीं बनता। न किसी व्यक्ति को दल बदलते हुए कोई शर्म आती है और न ही किसी दल को किसी ऐसे व्यक्ति को अपने साथ जोड़ने में कोई संकोच होता है जिसे वह कल तक भ्रष्ट, अपराधी और न जाने क्या-क्या कहकर दुत्कारा करता था।

मतदाता किसी उम्मीदवार को वोट देते समय जिन दो बातों का मुख्य रूप से ख्याल रखता है, उनमें पहली व्यक्ति की वैयक्तिक ईमानदारी है और दूसरी उसके दल की रीति-नीति। दुर्भाग्य से, अब हमारी राजनीति में इन दोनों बातों का महत्व नहीं रह गया है- महत्व सिर्फ राजनीतिक स्वार्थ साधने का है।

हमारे नेता यह मानकर चलते हैं कि जनता की याददाश्त बहुत कमजोर होती है. आवश्यकता उनकी इस धारणा को गलत सिद्ध करने की है।  नेताओं द्वारा कही गई हर बात और किया गया हर काम जनता की अदालत में रखा जाना चाहिए. फैसला करने का अधिकार देश की जनता का है, इसलिए जनता का दायित्व बनता है कि वह नेतृत्व के आचरण पर कड़ी नजर रखे। पांच साल में एक बार वोट देना ही पर्याप्त नहीं है, इस बात का भी ध्यान रखना जरूरी है कि हमारे वोट से नेता बना व्यक्ति अपने वादों और दावों पर खरा उतर रहा है कि नहीं।

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