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कृष्ण प्रताप सिंह का ब्लॉग: लॉकडाउन के बाद की चुनौतियों पर करें विचार

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: April 28, 2020 14:56 IST

कोरोना के बाद की दुनिया बहुत हद तक बदलने जा रही है। संभव है कि भूमंडलीकरण के बजाय संरक्षणवाद की राह पर दुनिया चल पड़े। ऐसे में भारत के सामने भी अपने और दूसरे देशों के संरक्षणवाद में संतुलन स्थापित करने की चुनौती होगी।

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लगता है कि यह न सिर्फ हमारे देश बल्किसारी दुनिया भर के लिए बुरी खबरों का दौर है. कोरोना से जो विषम विश्वयुद्ध छिड़ा हुआ है, विश्व स्वास्थ्य संगठन तक को उसके जल्दी खत्म होने के आसार नहीं नजर आ रहे. उसका कहना है कि कहर बरपा रहा यह वायरस इतना शातिर है कि आसानी से काबू में नहीं आने वाला और उससे लंबी लड़ाई के लिए तैयार रहना होगा. 

दूसरी ओर दुनिया उससे कुछ महीनों के संघर्ष में ही हांफती नजर आने लगी है और लॉकडाउन व ‘सामाजिक दूरी’ आदि के जो उपाय किए जा रहे हैं, उनकी बाबत आशंका जताई जा रही है कि वे चंद दिनों में ही भुखमरी की महामारी को भी न्यौता देने लगेंगे. संयुक्त राष्ट्र की मानें तो कोरोना के हाहाकार में भूख की इस महामारी की अनसुनी की गई तो यह विडंबना कहीं ज्यादा रुला सकती है कि लोगों को कोरोना वायरस से अगर बचा भी लिया जाए तो भुखमरी से बचाना मुश्किल हो जाए.

कोरोना के बाद की दुनिया भूमंडलीकरण के बजाय संरक्षणवाद की राह पर चल सकती है. ऐसे में हर देश की तरह भारत के सामने भी अपने और दूसरे देशों के संरक्षणवाद में संतुलन स्थापित करने की चुनौती होगी, लेकिन कोरोना-कोरोना के शोर में देश की सरकार का अभी इस चुनौती की ओर ध्यान ही नहीं है, जबकि हालात चीख-चीख कर कह रहे हैं कि उसे अभी से उससे निपटने की तैयारी शुरू कर देनी चाहिए.  

ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक मौजूदा साल के मध्य तक भारतीय रुपया छह प्रतिशत तक और लुढ़क सकता है. कच्चे तेल की कीमतों में अप्रत्याशित गिरावट से उसको कुछ राहत मिल सकती है, लेकिन जोखिम बढ़ने पर पूंजी बाजार से निकासी का प्रभाव अधिक गहरा होगा. तब उससे निपटने के लिए सारी निगाहें भारतीय रिजर्व बैंक की ओर होंगी, लेकिन स्थिति को संभालने में वह पहले ही कई बड़े फैसले कर चुका है और आगे अपने रिजर्व को खत्म करने का जोखिम शायद ही मोल ले. 

ऐसे में रास्ता तो एकमात्न यही है कि सरकार अभी से लॉकडाउन के बाद की चुनौतियों को लेकर गंभीर रवैया अपनाए और अर्थव्यवस्था की दिक्कतें दूर करने की पर्याप्त तैयारियां रखे, निर्यात केंद्रित क्षेत्नों की वृद्धि के लिए नीतिगत स्तर की बाधाओं को दूर करे, आयात पर निर्भरता घटाए और मित्नवत नीतियों से विदेशी निवेश को आकर्षित करने की पहल करे.

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