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दुनिया के लिए प्रेरक बनता भारत का चुनावी तंत्र 

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: January 22, 2026 07:36 IST

इस संगठन में सदस्य देशों के चुनाव आयोग या चुनाव कराने वाली संस्थाएं ही शामिल होती हैं, लिहाजा भारतीय चुनाव आयोग इस संस्था का सदस्य है.

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उमेश चतुर्वेदीस्वाधीनता के बाद जिस लोकतांत्रिक व्यवस्था को हमने अपनाया, वह हमारी अपनी नहीं, पश्चिम से आयातित है. दिलचस्प है कि आज यही व्यवस्था दुनियाभर में शासन की बेहतर प्रणाली के रूप में स्वीकार्य है. इसकी बुनियाद में इंग्लैंड की सन् 1215 में हुई मैग्नाकार्टा की संधि है. आज का लोकतंत्र इसी संधि से निकले कानूनों और परंपराओं से विकसित हुआ है. जबकि भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था के मूल में भारतीय दिलों की पारंपरिक लोकतांत्रिक सोच है. दुर्भाग्य से भारतीय लोकतांत्रिक प्रणाली की महत्ता को दुनिया हाल तक स्वीकार करने से हिचकती रही है.

ऐसे माहौल में अंतरराष्ट्रीय लोकतांत्रिक एवं चुनावी सहायता संस्थान की अगुआई भारत को मिलना मामूली बात नहीं है. अंग्रेजी में इस संस्थान को इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर डेमोक्रेटिक एंड इलेक्टोरल असिस्टेंस यानी आईडीईए के नाम से जाना जाता है.

यह इस बात का प्रतीक है कि भारतीय लोकतंत्र की अहमियत वैश्विक स्तर पर स्वीकार्य हो रही है. वैश्विक लोकतांत्रिक परिदृश्य के लिहाज से भारत को मिली अगुआई ऐतिहासिक है. 1995 में 14 देशों द्वारा स्थापित इस संगठन के सदस्य देशों की संख्या अब 37 हो चुकी है.

अमेरिका और जापान स्थायी पर्यवेक्षक के तौर पर इस संगठन में शामिल हो चुके हैं. करीब आठ अरब जनसंख्या वाली दुनिया के करीब दो अरब बीस करोड़ पंजीकृत मतदाता इसी संगठन के सदस्य देशों के पास हैं, जिसमें भारत की हिस्सेदारी 99 करोड़ 10 लाख से ज्यादा है.

आंकड़ों से साफ है कि सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश भारत है. इस लिहाज से देखें तो भारत की अध्यक्षता उसके लिए औपचारिक दायित्व से कहीं ज्यादा वैचारिक नेतृत्व का अवसर हो सकती है. इस संगठन में सदस्य देशों के चुनाव आयोग या चुनाव कराने वाली संस्थाएं ही शामिल होती हैं, लिहाजा भारतीय चुनाव आयोग इस संस्था का सदस्य है. जाहिर है कि इसी नाते अध्यक्षता भी आयोग के ही पास है.

भारतीय चुनावी प्रबंधन में बढ़ते नवाचार, डिजिटल चुनावी प्रबंधन पर जोर, दिव्यांग और दूरस्थ मतदाताओं तक बढ़ती पहुंच के लिए चुनाव आयोग की सोच ज्यादा जिम्मेदार है. चुनावी साक्षरता बढ़ाने को लेकर चुनाव आयोग ने जितने प्रयोग किए हैं, वैसा उदाहरण कहीं और नहीं दिखता. विपक्षी सवालों के बावजूद चुनावों में अगर मतदाता भागीदारी बढ़ी है, तो माना जा सकता है कि चुनाव आयोग के प्रति भरोसा कम नहीं हुआ है.

इस लिहाज से देखें तो भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था की पहुंच पुस्तकालयों और विमर्श के संस्थागत मंचों की बजाय बूथ और अंतिम व्यक्ति तक बढ़ी है. इस संदर्भ में चुनाव आयोग की अध्यक्षता में 21 से 23 जनवरी के बीच आईडीईए देशों के चुनाव प्रमुखों और अधिकारियों की हो रही बैठक बेहद अहम हो जाती है. माना जा रहा है कि आयोग से दुनियाभर के अधिकारी जानना चाहेंगे कि मतदाताओं की भारी संख्या के बावजूद आयोग उन तक कैसे पहुंचता है और चुनाव प्रणाली की पवित्रता कैसे बरकरार है.

टॅग्स :भारतचुनाव आयोग
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