लाइव न्यूज़ :

पहाड़ नहीं बचे तो टूटेगा मुसीबतों का पहाड़

By पंकज चतुर्वेदी | Updated: January 8, 2026 07:19 IST

ईस्ट इंडिया कंपनी तो यहां केवल पैसा कमाने आई थी और उसके लिए पेड़ ‘हरा सोना’ व पहाड़ महज खनिज के स्रोत थे.

Open in App

पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय ने जिस तरह अरावली को लेकर पूर्व में दिए गए अपने ही आदेश पर रोक लगाई, वह महज चार राज्यों में फैली इस पर्वत-शृंखला का सवाल नहीं, बल्कि प्रायः उपेक्षित रहने वाले पूरे देश के ‘पहाड़ पर्यावरण’ के संरक्षण का बड़ा कदम है. गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर को अरावली पर्वत की ऊंचाई 100 मीटर होने पर ही पहाड़ मानने और दो पहाड़ियों के बीच की दूरी 500 मीटर से अधिक होने पर उसे इस पहाड़ की शृंखला न मानने के आदेश दिए थे. पहाड़ केवल पर्यटन या खनन नहीं हैं, बल्कि धरती के अस्तित्व का महत्वपूर्ण अंग हैं.

फिर भी, बीते कुछ वर्षों में वायनाड की त्रासदी, महाराष्ट्र में ढहते पहाड़ों के बीच दबते गांव, उत्तराखंड से हिमाचल तक धंसते-उजड़ते पहाड़ हमें याद दिलाते हैं कि हमने धरती को तो मां मान लिया है, पर पहाड़ को पिता नहीं मानते.अभी कुछ सौ साल पहले तक पहाड़ और घने जंगल भारत के लोगों की संस्कृति व सह-अस्तित्व का मूलाधार थे. ईस्ट इंडिया कंपनी तो यहां केवल पैसा कमाने आई थी और उसके लिए पेड़ ‘हरा सोना’ व पहाड़ महज खनिज के स्रोत थे.

कंपनी ने पहाड़ उजाड़ने की जो शुरुआत की, वह आज तक थम नहीं रही है.  प्रकृति में जिस पहाड़ के निर्माण में लाखों साल लगते हैं, हमारा समाज उसे उन निर्माणों की सामग्री जुटाने के नाम पर तोड़ देता है, जो बमुश्किल सौ साल चलते हैं. पहाड़ केवल पत्थर के ढेर नहीं होते, बल्कि इलाके के जंगल, जल और वायु की दशा-दिशा तय करने के साध्य होते हैं.

ये देशभर की अधिकांश नदियों के उद्गम स्थल भी हैं.  चूंकि यहां विभिन्न खनिजों के भंडार भी उपलब्ध हैं, इसलिए मनुष्य ने पहाड़ों का जमकर शोषण किया. हिमालय के अलावा देश के जिन-जिन इलाकों में भूस्खलन हो रहा है, उनमें से अधिकांश क्षेत्र सह्याद्रि, पश्चिमी घाट या पूर्वी घाट पर्वतमाला के करीब हैं. इन सभी जगहों पर पहाड़ों पर बस्ती व खेत के लिए बेशुमार पेड़ काटे गए हैं.

जब मिट्टी पर पानी की बड़ी बूंदें सीधी गिरती हैं, तो अव्वल ये मिट्टी को काटती हैं और फिर बहती हुई मिट्टी करीबी जल निधि- नदी, जोहड़, तालाब को उथला करती है. इन दोनों से पहाड़ ऊपर से और धरातल से कमजोर होता है. यही नहीं, इन सभी क्षेत्रों में निर्माण और खनन के लिए शक्तिशाली विस्फोटकों का इस्तेमाल लंबे समय से हो रहा है.

अरावली विवाद के बहाने पूरे देश के पहाड़ों के बारे में सोचने, उनके अस्तित्व की अनिवार्यता और उनके साथ हो रही निर्ममता के प्रति संवेदनशील होने का हमें एक अवसर मिला है.

जिस तरह विकास के नाम पर पेड़ों को काटने को लेकर कानून सख्त हैं, जरूरत है कि अरावली के लिए गठित विशेषज्ञ समिति इस तरह के दिशा-निर्देश तैयार करे, ताकि पूरे देश के पहाड़ राहत महसूस कर सकें. इनसे भले ही हमें लगेगा कि पहाड़ों को राहत मिल रही है, लेकिन वास्तव में अंततः इससे लाभान्वित इंसान ही होगा.

टॅग्स :सुप्रीम कोर्टदिल्लीराजस्थान
Open in App

संबंधित खबरें

क्राइम अलर्टपत्नी की गला रेतकर हत्या और पति ने खुद को चाकू से वार कर आत्महत्या का किया प्रयास

क्राइम अलर्टराजस्थान सड़क हादसाः पुलिस उपनिरीक्षक सहित 4 लोगों की मौत, भरतपुर में तेज रफ्तार कार ने 3 को कुचला

भारतघायल हूं इसलिए घातक हूं?, राघव ने एक्स पर किया पोस्ट, मैं बोलना नहीं चाहता था, मगर चुप रहता तो बार-बार दोहराया गया झूठ भी सच लगने लगता, वीडियो

भारतअल्केमिस्ट एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी प्राइवेट लिमिटेड केस से अलग हुए सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन, आखिर कारण

भारतLPG Cylinder Update: सिलेंडर के लिए अब लंबी वेटिंग खत्म! दिल्ली में बस ID कार्ड दिखाओ और 5KG सिलेंडर पाओ

भारत अधिक खबरें

भारतबारामती विधानसभा उपचुनावः सीएम फडणवीस की बात नहीं मानी?, कांग्रेस ने उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार के खिलाफ आकाश मोरे को चुनाव मैदान में उतारा

भारतUP की महिला ने रचा इतिहास! 14 दिनों में साइकिल से एवरेस्ट बेस कैंप पहुंचने वाली पहली भारतीय महिला बनीं

भारतLadki Bahin Yojana Row: महाराष्ट्र में 71 लाख महिलाएं अयोग्य घोषित, विपक्ष ने किया दावा, सरकार की जवाबदेही पर उठाए सवाल

भारतयूपी बोर्ड ने 2026-27 के लिए कक्षा 9 से 12 तक NCERT और अधिकृत पुस्तकें अनिवार्य कीं

भारतपाकिस्तान के रक्षामंत्री ख्वाजा आसिफ के कोलकाता पर हमले की धमकी वाले बयान पर सोशल मीडिया पर 'धुरंधर' अंदाज़ में आई प्रतिक्रिया