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ब्लॉग: लोकतंत्र की कीमत पर न बदलें न्याय संहिता

By कपिल सिब्बल | Updated: August 30, 2023 11:04 IST

भारत सरकार ने देश की आपराधिक न्याय प्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन करने के लिए तीन नए विधेयक पेश किए हैं। इन विधेयकों में भारतीय न्याय संहिता, 2023, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 और भारतीय साक्ष्य संहिता, 2023 शामिल हैं।

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ठळक मुद्देसरकार ने औपनिवेशिक युग के आपराधिक कानूनों को बदलने के लिए एक नए कानून का प्रस्ताव किया है।इस कानून को गोपनीय और गैर-पारदर्शी तरीके से बनाया गया था।कानून के कुछ प्रावधानों की आलोचना की गई है, क्योंकि वे लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए खतरनाक हैं।

नई दिल्ली: देश की आपराधिक न्याय प्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन करने की इच्छा हालांकि स्वागतयोग्य है, लेकिन यह कुछ हद तक एक पहेली जैसा है क्योंकि सरकार ने एक ऐसा रास्ता चुना है जो गोपनीय और गैर-पारदर्शी है.

आपराधिक न्याय प्रणाली में आमूलचूल बदलाव के सुझाव के लिए पैनल गठित हुआ था

अब यह समझ में आ गया है कि हमारी आपराधिक न्याय प्रणाली में आमूलचूल बदलाव का सुझाव देने के लिए मई 2020 में गृह मंत्रालय द्वारा एक पांच सदस्यीय पैनल का गठन किया गया था. जाहिर है, उस पैनल ने औपनिवेशिक युग के आपराधिक कानूनों को स्थानीय रूप देने के इरादे से विभिन्न पहलुओं पर विस्तृत विश्लेषण किया. 

यह आश्चर्य की बात है कि भाजपा के अलावा किसी अन्य राजनीतिक दल को और जनता को ऐसी किसी कवायद की जानकारी नहीं थी. न ही कानूनी बिरादरी, शायद सबसे महत्वपूर्ण हितधारक, को इस प्रक्रिया में सुना गया. इसलिए हमें उक्त समिति द्वारा की गई सिफारिशों की प्रकृति और उनमें से किसे सरकार द्वारा स्वीकार किया गया, इसके बारे में कोई जानकारी नहीं है, क्योंकि ये अभी भी सार्वजनिक नहीं है.

ब्रिटिश शासन में कैसे होती थी गिरफ्तारी

विधेयकों को पेश करने का यह गुप्त तरीका लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए अभिशाप है और 1.4 अरब लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाली सरकार को शोभा नहीं देता. यदि इरादा औपनिवेशिक युग के आपराधिक कानूनों को खत्म करने का है तो शुरुआती बिंदु एक ऐसी प्रणाली स्थापित करना होना चाहिए था जहां जांच अधिकारी राजनीतिक प्रतिष्ठान के साथ मिलकर काम करने के बजाय स्वतंत्र रूप से अपना काम करें.

दंड प्रक्रिया संहिता के तहत प्रावधान, जो एक पुलिस अधिकारी को संदेह के आधार पर गिरफ्तार करने की अनुमति देते हैं, औपनिवेशिक युग की मानसिकता के केंद्र में थे. ब्रिटिश कब्जे के प्रति भारत के लोगों के बढ़ते विरोध को दबाने के लिए, बिना किसी सबूत के, केवल संदेह के आधार पर बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां की जाती थीं. 

कब होनी चाहिए गिरफ्तारी

गिरफ्तारी की शक्ति बहुत बड़ी है जिसका प्रयोग अत्यधिक सावधानी के साथ किया जाना चाहिए और केवल तभी किया जाना चाहिए जब पुलिस स्टेशन के प्रभारी अधिकारी के पास दोषी होने का प्रथम दृष्टया कोई सबूत हो. दुनिया के अन्य लोकतांत्रिक न्यायक्षेत्रों में, किसी व्यक्ति को उसकी स्वतंत्रता से तभी वंचित किया जाता है, जब पुलिस अधिकारी के पास प्रथम दृष्टया सबूत उपलब्ध हो. 

जब किसी व्यक्ति को गिरफ्तार किया जाता है तो पुलिस अधिकारी को आवश्यक पारगमन समय को छोड़कर, 24 घंटे के भीतर हिरासत में लिए गए व्यक्ति को न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करना होता है. इस प्रक्रिया के दौरान मजिस्ट्रेट को पुलिस हिरासत की आवश्यकता के बारे में सूचित किया जाता है. इसके बाद मजिस्ट्रेट पुलिस अधिकारी को तय दिनों की हिरासत की अनुमति देता है.

पुलिस अधिकारी के साथ अब प्रवर्तन अधिकारी भी ऐसे कर रहे है गिरफ्तारी

यदि सरकार कानून में आमूलचूल परिवर्तन करना चाहती है तो शुरुआती बिंदु संशोधित कानून में उस प्रावधान को शामिल करना होना चाहिए था, जो पुलिस अधिकारी को केवल संदेह के आधार पर नहीं, बल्कि प्रथम दृष्टया दोषी होने के सबूत के आधार पर गिरफ्तार करने की शक्ति देता. 

अब हम जो देख रहे हैं वह यह है कि न केवल पुलिस अधिकारी बल्कि प्रवर्तन अधिकारी भी बिना सबूत और यहां तक कि संदेह के बिना भी गिरफ्तार करने की शक्ति का प्रयोग कर रहे हैं.

क्या है भारतीय न्याय संहिता 2023

भारतीय न्याय संहिता, 2023 (बीएनएस), उन व्यापक मुद्दों को नजरअंदाज करने का विकल्प चुनती है, जो उपनिवेशवाद के परिणाम हैं. बीएनएस के सबसे प्रतिगामी प्रावधान लोकसेवकों द्वारा किए गए अपराधों से संबंधित हैं. 

बीएनएस की धारा 254 के तहत, यदि कोई लोकसेवक एक रिकॉर्ड तैयार करता है जिसके बारे में वह जानता है कि वह गलत है और इसलिए जनता को नुकसान या कोई चोट पहुंचाता है, या ऐसे रिकॉर्ड के माध्यम से किसी संपत्ति को जब्ती या अन्य आरोप से बचाने का इरादा रखता है जिसके लिए वह उत्तरदायी है तो कानून के अनुसार, लोकसेवक को तीन साल की सजा हो सकती है.

क्या है भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 255

इससे भी अधिक गंभीर बात धारा 255 है, जो न्यायाधीशों के लोक सेवक होने पर लागू होती है. इसलिए, यदि कोई न्यायाधीश न्यायिक कार्यवाही के किसी भी चरण में कोई रिपोर्ट, आदेश या फैसला सुनाता है, जिसके बारे में वह जानता है कि वह कानून के विपरीत है, तो उसे सात साल तक की कैद की सजा हो सकती है. 

मेरा मानना है कि न्यायाधीश द्वारा दिया गया प्रत्येक निर्णय इस धारणा पर होता है कि यह कानून के अनुरूप है. मुझे लगता है कि अब कार्यपालिका यह तय करेगी कि क्या ऐसा आदेश या निर्णय कानून के विपरीत है और न्यायाधीश को भ्रष्ट या दुर्भावनापूर्ण उद्देश्य के लिए जिम्मेदार ठहरा सकती है. इन परिस्थितियों में, विशेषकर निचली न्यायपालिका में, कौन सा न्यायाधीश सरकार के विरुद्ध निर्णय देगा?

ये है न्यायपालिका के लिए संदेश

न्यायपालिका के लिए संदेश यह है कि अब अनुकूल होकर चलने का समय आ गया है. यहां तक कि पुलिस अधिकारी जो लोगों को कैद करते हैं, उन पर भी मुकदमा चलाया जा सकता है यदि ऐसा कारावास कानून के विपरीत है. इससे यह सुनिश्चित होगा कि पुलिस अधिकारी सत्ता में बैठे लोगों के इशारे पर काम करें. 

यदि ये प्रावधान लागू होते हैं, तो हमारी आपराधिक न्याय प्रणाली राजनीतिक वर्ग के अधीन हो जाएगी. हालांकि गृह मंत्री ने कहा कि राजद्रोह को अपराध के रूप में दंड संहिता (1860) से हटा दिया गया है, लेकिन अपने नए अवतार में यह कहीं अधिक खतरनाक है. नए प्रावधान भारत सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने की परिभाषा का विस्तार करते हैं. 

धारा 150 में क्या कहा गया है

धारा 150 में कहा गया है कि जो कोई भी बोले गए या लिखे हुए शब्दों या संकेतों द्वारा या उक्त धारा में बताए गए किसी अन्य तरीके से किसी विध्वंसक गतिविधि में शामिल होता है या भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालता है, उसे उम्र कैद हो सकती है. ऐसे प्रावधान भी हैं जो सार्वजनिक स्थानों पर विरोध प्रदर्शनों को रोकेंगे और प्रदर्शनकारियों को शरण देने वालों पर मुकदमा चलाया जाएगा.

ऐसे कानून मैकाले की दंड संहिता में सुधार करने की बजाय संहिता से भी अधिक प्रतिगामी हैं. दरअसल, ये कानून बताते हैं कि वर्तमान सत्ता प्रतिष्ठान खुद को भारत में शासकों की नई नस्ल मानता है, जो हमेशा के लिए यहां रहने की उम्मीद करते हैं. मुझे उम्मीद है कि देश यह सुनिश्चित करने के लिए खड़ा होगा कि हम एक लोकतांत्रिक राष्ट्र बने रहें. 

टॅग्स :भारतIPCकोर्टIndian Constituent Assembly
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