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छत्रपति संभाजीनगर भाजपाः अपनों पर ही भरोसा करना महंगा पड़ गया

By Amitabh Shrivastava | Updated: January 3, 2026 05:56 IST

Chhatrapati Sambhajinagar BJP: नागपुर, नासिक और पुणे भी कम नहीं रहे. पहले अनेक स्थानों पर महागठबंधन की धज्जियां उड़ीं और बाद में आपस में जूतम-पैजार दिखी.

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ठळक मुद्देकार्यकर्ताओं के नाराजगी भरे शब्द, अपशब्द से लेकर आरोप तक सुने जाते हैं.महानगर पालिका चुनाव के नामांकन भरे जाने के बाद यह भाजपा की सार्वजनिक स्थिति बन पड़ी है.कहा जा सकता है कि भाजपा का सबसे अधिक तमाशा छत्रपति संभाजीनगर में हुआ.

Chhatrapati Sambhajinagar BJP: हाल ही में छत्रपति संभाजीनगर के भारतीय जनता पार्टी(भाजपा) के शहर अध्यक्ष किशोर शितोले एक नाराज महिला कार्यकर्ता को मनाने के वीडियो में यह कहते सुने जाते हैं कि पार्टी में राष्ट्र सर्वप्रथम, पार्टी द्वितीय और अंत में हम हैं. इस तरह की गतिविधियों से पार्टी की छवि खराब होती है. वहीं दूसरी ओर अनेक वीडियो में भाजपा कार्यकर्ता राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले के चुनावी सर्वेक्षण का हवाला देते हुए सुने जाते हैं. कुछ जगह पार्टी के कार्यकर्ताओं के नाराजगी भरे शब्द, अपशब्द से लेकर आरोप तक सुने जाते हैं.

नगर परिषद चुनावों में जीत की खुशियों के बाद महानगर पालिका चुनाव के नामांकन भरे जाने के बाद यह भाजपा की सार्वजनिक स्थिति बन पड़ी है. नौबत यहां तक आई है कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को हस्तक्षेप कर कुछ नेताओं को कार्यकर्ताओं को समझाने भेजना पड़ा है. यह कहा जा सकता है कि भाजपा का सबसे अधिक तमाशा छत्रपति संभाजीनगर में हुआ,

लेकिन नागपुर, नासिक और पुणे भी कम नहीं रहे. पहले अनेक स्थानों पर महागठबंधन की धज्जियां उड़ीं और बाद में आपस में जूतम-पैजार दिखी. कहा और माना जा रहा है कि काफी दिनों के ‘होम वर्क’ के बाद भाजपा आलाकमान ने मनपा चुनाव स्थानीय नेताओं के जिम्मे छोड़ा था. उसके पश्चात आरंभिक तैयारियों में टिकट मांगने वालों के मेले ने उम्मीदवारों की तलाश की चिंता छोड़ दी.

किंतु जब निर्णायक समय आया तो संकट का समाधान न स्थानीय नेताओं को मिला, न कार्यकर्ताओं को पार्टी का घोष वाक्य याद रहा. पिछली अनेक चुनावी परिपाटी के अनुसार मनपा चुनावों में भी भाजपा ने आगंतुकों के लिए अपने दरवाजे खोले. किसी भी दल के नेता-कार्यकर्ता को शामिल करना बढ़ती दलीय ताकत का पैमाना माना गया.

इस कार्य में अनेक निवर्तमान नगरसेवकों को पार्टी में शामिल किया गया. इस बीच, लंबे समय से कार्यरत कार्यकर्ताओं को भी अवसर देने का आश्वासन दिया गया. चुनाव लंबे समय से स्थानीय निकायों के लंबित थे. इस दौरान लोकसभा, विधानसभा और विधान परिषद तक के चुनाव हुए. कार्यकर्ताओं ने एक उम्मीद में अपना योगदान दिया.

कुछ हद तक उनकी महत्वाकांक्षाएं भी जगीं. परंतु जब स्थानीय निकाय के चुनाव आए तो जीत के दबाव ने केवल सफलता की संभावना को देखा. इस स्थिति को संभालने में जिस प्रकार की कुशलता की आवश्यकता थी, वह नहीं दिखी. केंद्रीय और प्रदेश स्तर तक के नेताओं ने अपने-अपने गृह जिलों को संभाला. निकाय अनुसार किसी को प्रभार नहीं दिया गया.

पार्टी अध्यक्ष रवींद्र चव्हाण दौरे करते रहे, लेकिन चुनाव के पास आते ही वह मुंबई और कोंकण के लिए सीमित हो गए. मंत्री बावनकुले ने अनेक स्थानों का दौरा कर गठबंधन के लिए प्रयास किया, किंतु उन्हें भी नागपुर में ही केंद्रित होना पड़ा. चुनाव की प्रक्रिया जिस तरह आगे बढ़ी और उसमें स्थानीय नेताओं का हस्तक्षेप साफ दिखने लगा था.

जिससे उनके करीबी लोगों की आशाएं पल्लवित हुईं. किंतु परदे के पीछे अपना-पराया का खेल नामांकन के दौरान समझ में आया और नाराजगी इस कदर बढ़ी कि नेताओं को मुंह छिपाना पड़ा. पुलिस बंदोबस्त में आना-जाना पड़ा. पार्टी को यह उम्मीद नहीं थी कि टिकट बांटने के नाम पर उसकी इस कदर छीछालेदर हो जाएगी.

केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी, मुरलीधर माहोलकर, राज्य के मंत्री बावनकुले के अलावा गिरीश महाजन, अतुल सावे, राज्यसभा सदस्य अशोक चव्हाण और भागवत कराड़ को सरेआम पक्षपात के आरोपों का सामना करना पड़ेगा. हालांकि इसके ठीक पहले महागठबंधन टूटने के नाम पर शिवसेना के शिंदे गुट के नेताओं की आलोचना सुननी पड़ी थी.

अहंकार के आरोप लगे थे. यह वही शब्द था जो महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख ने भाजपा के लिए ईवीएम का ‘अहंकार’ उपयोग में लाया था. दरअसल स्थानीय नेताओं को पार्टी और निजी प्रभाव को बढ़ता दिखाने के लिए अपने समर्थकों को जुटाना आवश्यक लग रहा था. यदि एक नेता कुछ नेताओं और कार्यकर्ताओं को पार्टी में ला रहा था,

तो उसे यह लग रहा था कि संगठन में वरिष्ठ स्तर पर उसका प्रभाव अधिक पड़ेगा. चूंकि संगठन स्थानीय नेताओं पर अधिक भरोसा कर रहा था, इसलिए उसे अंदाजा नहीं था कि यह विश्वास महंगा पड़ेगा. यह समीकरण दोतरफा नुकसानदायक साबित होगा. अतीत में महाराष्ट्र में संगठनात्मक शक्ति के नाम पर पहले कांग्रेस, फिर शिवसेना को जाना जाता था.

हालांकि शिवसेना ग्रामीण भागों में कमजोर थी, लेकिन उसके अपने शक्ति केंद्र मजबूत थे. बीते सालों में कांग्रेस के कमजोर  होने और शिवसेना के पतन से दोनों के कार्यकर्ताओं की फौज ने या तो पाला बदल लिया या फिर वे अपने आप तक सीमित हो गए. इस स्थिति में नए कार्यकर्ता और भूले-भटके नेता भाजपा को खूब मिले.

जिनसे उसे मजबूती का अहसास हुआ. वास्तविकता कुछ उतनी सीधी नहीं थी, जितनी समझी जा रही थी. भाजपा में आलाकमान के आदेश या फैसलों के खिलाफ आवाज उठाना अनुशासन के खिलाफ माना जाता रहा है, मगर ‘मेगा भरती’ ने भाजपा के संस्कारी नेताओं के अलावा भी एक अलग पीढ़ी तैयार कर दी. जिसकी पार्टी में आने पर अपनी महत्वाकांक्षा थी.

उसे समझने में नेताओं ने देर लगाई और विपरीत परिणाम सामने हैं. स्थितियां यहां तक हैं कि मतदाताओं के मन की बात समझने वाले अपने कार्यकर्ताओं का मन समझने में विफल साबित हो रहे हैं. अनुशासन तो बहुत दूर नेताओं, मंत्रियों और सांसदों के मुंह पर अपशब्द, जातिवाद के आरोप लगाए जा रहे हैं.

कार्यालयों में तोड़-फोड़ से लेकर नेताओं के सामने उनकी तस्वीरों को तोड़ना तथा गाड़ियों पर काला रंग डालना आदि काम खुलकर किए जा रहे हैं. अब प्रदेश नेतृत्व से लेकर स्थानीय नेतृत्व तक समस्या यही है कि जिन्हें पहले चुनाव लड़ने के लिए समझाया गया था, अब उन्हें चुनाव न लड़ने के लिए कैसे समझाया जाए.

यह पार्टी की दु:खद स्थिति है. जिसके लिए जिम्मेदार स्थानीय नेतृत्व ही है. उसने दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बनने में अपना भीतरी विश्व इतना जटिल बना लिया है कि उसे सुलझाने तथा अनुशासित बनाने में कुछ चुनावों का और इंतजार करना पड़ेगा.

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