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संपादकीयः हिंदी के प्रति अपनी दुर्भावना को खत्म करें दक्षिण के राज्य, संस्कृति का मूल आधार हैं भाषाएं

By लोकमत समाचार सम्पादकीय | Updated: November 15, 2022 15:01 IST

गृह मंत्री शाह ने राज्यों से प्रादेशिक भाषाओं में उच्च शिक्षा प्रदान करने का आह्वान करके देश की सभी भाषाओं के विकास का मार्ग प्रशस्त किया है। अब आवश्यकता यह है कि व्यवस्था के सर्वोच्च स्तर से अंग्रेजी को हटाकर हिंदी को लाया जाए...

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देश के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति डी।वाई। चंद्रचूड़ ने बिल्कुल सही कहा है कि अंग्रेजी बोलना कोई योग्यता का पैमाना नहीं है। हाल ही में एक आयोजन के दौरान प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि हमारे समाज में योग्यता की पारंपरिक परिभाषा सांस्कृतिक रूढ़ियों का परिणाम है। दरअसल, अंग्रेजों से आजादी हासिल करने के बाद भी हमारे समाज के उच्च तबके में और व्यवस्था के सर्वोच्च स्तर पर अंग्रेजी का लगभग एकाधिकार रहा है जिसके कारण ऐसा माहौल बन गया है कि अंग्रेजी बोलने को योग्यता का पैमाना मान लिया जाता है। संतोष की बात है कि वर्तमान मोदी सरकार इस धारणा को ध्वस्त करने की दिशा में काम कर रही है। 

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का हालिया बयान इसी का उदाहरण है जिसमें उन्होंने तमिलनाडु सरकार से आग्रह किया है कि वह मेडिकल और इंजीनियरिंग की पढ़ाई तमिल भाषा में शुरू करे, क्योंकि यह तमिल माध्यम के स्कूलों के छात्रों को आसानी से समझ में आएगी। इससे वे अपनी भाषाओं में अनुसंधान और विकास कर सकते हैं और मेडिकल साइंस में योगदान कर सकते हैं। इसके पहले भी कई मौकों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शाह ने हिंदी सहित देश की क्षेत्रीय भाषाओं की वकालत की है। 

दरअसल, मातृभाषा किसी भी संस्कृति का मूल आधार होती है। मातृभाषा के बजाय जब हम अंग्रेजी भाषा में किसी बच्चे को शिक्षा देते हैं तो वह अपनी जड़ों से कट जाता है। निश्चित रूप से एक भाषा के रूप में अंग्रेजी का अपना महत्व है और वैश्विक जानकारी हासिल करने का वह एक महत्वपूर्ण माध्यम है। लेकिन शिक्षा के माध्यम के रूप में छात्रों पर उसको थोपने से उनकी मौलिक सोच अवरुद्ध हो जाती है। दुर्भाग्य से अंग्रेजी की जगह हिंदी को अपनाने पर जोर दिए जाने से दक्षिण के राज्यों को लगता रहा कि उनके ऊपर हिंदी को लादने की कोशिश की जा रही है। अब केंद्र सरकार ने स्थानीय भाषाओं को प्रोत्साहन देने की पहल करके दक्षिण के राज्यों को अवसर दिया है कि वे हिंदी के प्रति अपनी दुर्भावना को खत्म करें, ताकि हिंदी को देश के विभिन्न प्रांतों के बीच संपर्क भाषा के रूप में स्थापित किया जा सके। 

वैसे भी मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की सरकारों ने मेडिकल और इंजीनियरिंग की पढ़ाई हिंदी में भी करवाने की घोषणा कर हिंदी के परिदृश्य को और व्यापक करने की पहल शुरू कर दी है। दुनिया के कई देश अंग्रेजी के बजाय अपनी स्थानीय भाषाओं में ही उच्च शिक्षा प्रदान करते हैं। इसलिए कोई कारण नहीं है कि हम भी इस काम में सफल न हों। हां, शुरुआत में तो कुछ दिक्कतें आएंगी ही, लेकिन उनके डर से हमें कदम वापस नहीं खींचना है बल्कि बाधाओं से पार पाते हुए आगे बढ़ना है। गृह मंत्री शाह ने राज्यों से प्रादेशिक भाषाओं में उच्च शिक्षा प्रदान करने का आह्वान करके देश की सभी भाषाओं के विकास का मार्ग प्रशस्त किया है। अब आवश्यकता यह है कि व्यवस्था के सर्वोच्च स्तर से अंग्रेजी को हटाकर हिंदी को लाया जाए और सभी राज्य इसमें सहयोग दें, क्योंकि हिंदी के साथ प्रादेशिक भाषाएं जो सहजता और सामीप्य महसूस कर सकती हैं वे अंग्रेजी के साथ कभी नहीं कर सकतीं।

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