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डर, डराना, डर जाना और कभी न डरना

By विजय दर्डा | Updated: November 17, 2025 05:21 IST

तू पानी के पास मत जा, तू आग से दूर हट, तू पेड़ पर मत चढ़, कुश्ती मत लड़, हाथ-पैर टूट जाएंगे, क्रिकेट ठीक से खेलना, कहीं बॉल न लग जाए! तू ये मत कर, तू वो मत कर!

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ठळक मुद्देराजनीतिक दल के मन में हार का डर समाया हुआ है! डर न जाने कितने तरह के होते हैं.किसी को स्कूल में अंग्रेजी न आने का डर तो किसी को गणित का डर! समझ में आ जाएगा कि डर का पहला पाठ हम सब अपने घर में ही पढ़ते हैं.

आज के मेरे कॉलम का विषय दार्शनिक सोच-विचार का परिणाम है. मैं दर्शन शास्त्र पढ़ता रहता हूं और भीतर से थोड़ा-बहुत दार्शनिक भी हूं. तो मेरे मन में खयाल आया कि आज आपसे एक ऐसे विषय पर बात करूं जो हमारे जीवन का सबसे अहम हिस्सा है लेकिन हम ठीक से इसकी पड़ताल नहीं करते कि डर हमारे भीतर कहां से आ जाता है.

अभी देखिए तो बिहार में चुनाव हो गए हैं और महाराष्ट्र में स्थानीय निकाय चुनाव का बिगुल बज गया है. हर राजनीतिक दल के मन में हार का डर समाया हुआ है! डर न जाने कितने तरह के होते हैं. किसी को स्कूल में अंग्रेजी न आने का डर तो किसी को गणित का डर! किसी को चोट लग जाने का डर तो किसी को आने वाले कल का डर!

किसी को खोने का डर तो किसी को पाकर खोने का डर! यदि आप आकलन करें तो सहज ही समझ में आ जाएगा कि डर का पहला पाठ हम सब अपने घर में ही पढ़ते हैं. तू पानी के पास मत जा, तू आग से दूर हट, तू पेड़ पर मत चढ़, कुश्ती मत लड़, हाथ-पैर टूट जाएंगे, क्रिकेट ठीक से खेलना, कहीं बॉल न लग जाए! तू ये मत कर, तू वो मत कर!

माता-पिता इतनी सारी हिदायतें देते हैं कि बच्चे के भीतर एक अज्ञात भय चुपके से समाता चला जाता है. इसलिए यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि डर की शुरुआत घर से होती है. हमारे बचपन में रोपा गया डर हमारी जवानी से लेकर मरते दम तक कायम रहता है. यही डर हम अगली पीढ़ी में रोप देते हैं. इस तरह क्रमिक सिलसिला चलता रहता है.

हमारा सामाजिक जीवन डर के साये में रहता है. यहां तक कि केवल हार का ही डर नहीं होता है, जीत का भी डर होता है कि कहीं यह हमसे छिन न जाए! हालात ऐसे हैं कि हर कोई एक-दूसरे को डराता रहता है. पति-पत्नी भी एक-दूसरे को डराने से बाज नहीं आते.विदेशों में मैं देखता हूं कि दो साल के बच्चे को तैरना सिखाने के लिए माता-पिता बच्चे को स्विमिंग पूल में निडर होकर फेंक देते हैं.

क्या हमारे यहां ऐसा होता है? नहीं होता है क्योंकि हम खुद डरे हुए होते हैं. विदेश के वो बच्चे बचपन में ही निडरता का पाठ पढ़ने के कारण ही जंगलों और पहाड़ों की अकेले ही खाक छानते फिरते हैं. एडवेंचरस हो जाते हैं. माउंट एवरेस्ट फतह करने का जज्बा हो या फिर समुद्र में गोते लगाने का मामला हो, बचपन में निडरता का पाठ पढ़ने वाले बच्चे हमेशा ही आगे रहते हैं.

हमारे यहां भी ऋषि-मुनि और साधु-संत घने जंगलों और पहाड़ की कंदराओं में जाकर साधना करते थे क्योंकि वो निडर होते थे लेकिन आज निडरता धूमिल हो रही है. यदि हमारे देश को मजबूत बनाना है तो हमें निडर और अनुशासित बनना होगा. जब मैं अपने बचपन को याद करता हूं तो 1960-62 का वह दृश्य याद आता है जब यवतमाल में थानेदार जंग बहादुर सिंह हाफ पैंट पहने, तिरछी टोपी लगाए और हाथ में डंडा लिए निकलते थे तो सन्नाटा छा जाता था. जैसे जंगल में शेर निकला हो. वो अनुशासन आज कहां दिखाई देता है?

आप सोचिए कि मुझे अभी तक उनका नाम याद है. अब तो लोगों को एस.पी. तक के नाम याद नहीं रहते क्योंकि उनकी ऐसी धमक नहीं रहती. प्रशासनिक धमक तभी रहती है जब उसमें डर शामिल होता है. पहले शिक्षक क्लास में आते थे तो डर पसर जाता था. उस डर में श्रद्धा शामिल होती थी क्योंकि तब शिक्षक सभी बच्चों को अपना बच्चा मानते थे.

यदि कोई बच्चा किसी विषय में कमजोर है तो मास्टर साहब उसे घर बुलाकर पढ़ाते थे. कोचिंग नाम की तब चीज नहीं थी. शिक्षकों के आचरण में पवित्रता थी. अब तो शिक्षकों के सामने बच्चे सिगरेट भी पी लेते हैं. तब डॉक्टर को लेकर यह डर नहीं था कि यह इलाज के नाम पर लूट लेगा. वे जो दवाई देते थे वह फाइनल होता था.

डॉक्टर परिवार का अंग हुआ करते थे. पहले ये भाव कहीं था ही नहीं कि बेटा तू चर्च में न जा. चर्च में जाएगा तो ईसाई हो जाएगा! बेटा तू मस्जिद में न जा! मस्जिद में जाएगा तो मुसलमान हो जाएगा. तू मंदिर में न जा! मंदिर में जाएगा तो हिंदू हो जाएगा. दुर्भाग्य से इस तरह के डर आज पैदा किए जा रहे हैं. जब इस तरह का डर पैदा किया जाता है तो घृणा पैदा होने लगती है.

यह सब बहुत डरावना लगता है. मैं देखता हूं कि धर्म को डर से जोड़ दिया गया है. परीक्षा हो या चुनाव, हर काम के लिए हम मन्नत मांगते हैं. डर का हाल यह है कि केवल हार का ही नहीं, जीत का डर भी होता है कि यह कहीं हमसे दूर न हो जाए. जरा सोचिए कि ध्यानचंद के पास जूते नहीं थे, पीटी उषा के पास साधन नहीं थे.

लेकिन उन्होंने कमाल कर दिया क्योंकि साधनों की कमी के डर को उन्होंने अपने निडरतापूर्ण जज्बे से जीत लिया था. छोटे कद के सचिन तेंदुलकर को लंबे कद के बॉलर्स ने डराने की कोशिश की थी लेकिन सचिन ने उनके छक्के छुड़ा दिए. हमारे सैनिक देश के लिए जान न्यौछावर कर देते हैं क्योंकि उनके  भीतर डर नहीं होता है.

सेना का प्रशिक्षण उन्हें निडर बना देता है. निडरता का पहला प्रशिक्षण घर से मिलना चाहिए. सायना नेहवाल की मां उषा रानी का जज्बा मुझे प्रेरणादायी लगता है कि उन्होंने किस तरह सायना में निडरता रोपी. और जरा गांधीजी की अहिंसक निडरता पर गौर करिए कि उन्होंने उस अंग्रेजी साम्राज्य को डरा दिया जिसके राज में सूरज नहीं डूबता था.

इसलिए मैं हर माता-पिता को सलाह देना चाहता हूं कि बच्चों के भीतर डर मत रोपिए! उन्हें निडर बनाइए. मैं हमेशा कहता हूं और इस सूत्र का पालन भी करता हूं कि लक्ष्य हासिल करना है तो अपने भीतर से डर को निकालो. काॅन्कर फियर, काॅन्कर ऑल! 

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