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आलोक मेहता का ब्लॉग: अपने गिरेबान में मानव अधिकार देखें पश्चिमी देश

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: March 7, 2020 06:08 IST

हम पुराने नस्लीय भेदभाव के बजाय ताजा स्थिति पर ही ध्यान दिलाना चाहेंगे. अमेरिका की असलियत के तथ्य देख लीजिए. संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका में सारे नियम कानूनों के बावजूद मानव अधिकारों की स्थिति बहुत खराब है.

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ब्रिटेन, अमेरिका सहित कुछ पश्चिमी देश इन दिनों भारत की संसद से पारित नागरिकता देने संबंधी उदार कानून पर प्रश्नचिह्न लगाते हुए मानव अधिकारों का मुद्दा उठा रहे हैं. इस कानून में किसी की नागरिकता छीनने या दुनिया के किसी भी देश के व्यक्ति को सामान्य नियम कानून के अनुसार नागरिकता मिलने से रोकने का प्रावधान नहीं है. फिर भी संपन्न सर्वशक्तिमान तथा भारत से मित्नता के दावे करने वाले देश अधूरे ज्ञान अथवा पूर्वाग्रहों से भारत विरोधी अभियान चला रहे हैं और संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में भी पाकिस्तानी अभियान को थोड़ी हवा दे रहे हैं. अमेरिका के थिंक टैंक फ्रीडम हाउस और ब्रिटेन के कुछ सांसदों ने भारत में नरसंहार जैसे गंभीर बेबुनियाद आरोप लगा दिए.

आश्चर्य यह है कि मानव अधिकारों के ऐसे पैरोकार अपने घर आंगन और सही अर्थो में अपने गिरेबान में ही दिख रहे मानव अधिकारों के उल्लंघन व ज्यादतियों को नहीं देख रहे या देखकर भी अनजान रहना चाहते हैं. हम पुराने नस्लीय भेदभाव के बजाय ताजा स्थिति पर ही ध्यान दिलाना चाहेंगे. अमेरिका की असलियत के तथ्य देख लीजिए. संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका में सारे नियम कानूनों के बावजूद मानव अधिकारों की स्थिति बहुत खराब है.

आपराधिक मामलों में कैदियों की संख्या 57 लाख है और भेदभाव के कारण अश्वेत महिलाओं की संख्या श्वेत की तुलना में दुगुनी तथा अश्वेत पुरुषों की संख्या तो छह गुनी है. अदालत में निर्णय होने से पहले ही नहीं कई मामलों में तो केवल कॉर्पोरेट कंपनियों की शिकायत पर मामले दर्ज कर आप्रवासी योग्य अधिकारी या इंजीनियर को साल साल भर के लिए नजरबंद कर देते हैं. वहां के 29 राज्यों में मृत्यु दंड का प्रावधान है और कानूनी प्रक्रिया जल्दी पूरी करके मौत की सजा हो रही है.

वर्ष 2019 में सात राज्यों में 20 कैदियों को मृत्यु दंड की कार्रवाई हो गई. बहुत कम लोग याद रखते हैं कि सर्वाधिक संपन्न देश में अब भी आधिकारिक रूप से चार करोड़ लोग गरीब हैं. गरीबों को स्वास्थ्य बीमा तथा अन्य सुविधाओं में बढ़ोत्तरी नहीं करके कमी की जा रही है. अश्वेत और हिस्पैनिक समुदाय के लोगों को वर्षो तक न्यूनतम सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़ा है. आज तक कोई महिला राष्ट्रपति नहीं बन सकी है. इस  साल अमेरिका ने शरणार्थी के रूप में प्रवेश किए करीब पचपन हजार लोगों को देश से वापस भेज दिया. मैक्सिको सीमा पर दीवार बनाने के साथ विदेशियों के प्रवेश और नागरिकता देने संबंधी कानून कड़े होते जा रहे हैं.

ब्रिटेन में लेबर पार्टी के नेता भारत को लेकर रुदन कर रहे हैं, लेकिन यूरोपीय समुदाय से अलग होने के अंतिम निर्णय के बाद तो पड़ोसी पूर्वी यूरोपीय देशों के सामान्य श्रमिकों/कर्मचारियों को देश से निकलना होगा. उन्हें तो शरण भी नहीं मिलेगी. ब्रिटेन में बड़े धनी अपराधी पूंजी लगाकर रह सकते हैं, लेकिन वहां लाखों रुपया खर्च कर पढ़ने वाले युवा तत्काल देश से बाहर जाने के लिए बाध्य हैं, क्योंकि तत्काल नौकरी ही नहीं होती.

यही नहीं पाकिस्तान से सहायता पाने वाले आतंकी संबंधों वाले लोगों और संगठनों के कारण आतंक तथा हिंसा की घटनाओं से निदरेष सामान्य नागरिकों की जान हाल के वर्षो में जाती रही और अब भी खतरे हैं. खालिस्तानी या अन्य आतंकी संगठनों को रियायत देकर अमेरिका और ब्रिटेन ने सामान्य नागरिकों के हितों की अनदेखी ही तो की है.

यूरोपीय देश जर्मनी में एकीकरण से पहले पूर्वी देश के कम्युनिस्ट संपर्क से शंका होने पर रातोंरात गिरफ्तारी हो जाती थी और महीनों तक किसी परिजन तक को पता नहीं चलता था. भारत में तो पाकिस्तान और चीन से तनाव के दौर में भी लोगों का आना-जाना, फोन पर संपर्क बना रहता है. शादियां होती रही हैं. पराकाष्ठा तो यह रही है कि पाकिस्तान तथा कई अन्य देशों में सैनिक राष्ट्रपति/शासक के राज में निरंतर जुल्म होने पर भी अमेरिका और ब्रिटेन उनसे संबंध रखकर हरसंभव सहायता देते रहे हैं. तब उन्हें मानव अधिकारों की याद नहीं आती.

खाड़ी के देशों में महिलाओं और श्रमिकों के अधिकारों का उल्लंघन होने के अलावा ज्यादतियों के हजारों प्रकरण होते हैं लेकिन अमेरिका या अन्य पश्चिमी देश उनसे आर्थिक संबंध बनाए रखने के लिए चुप्पी साध लेते हैं.

मीडिया के मामले में हाल के वर्षो में राष्ट्रपति ट्रम्प ने सीएनएन को कितना बदनाम और किनारे किया है. भारत के किसी सर्वोच्च नेता ने कभी किसी वरिष्ठ  पत्नकार को सार्वजनिक रूप से इतना बेइज्जत नहीं किया है. इसमें कोई शक नहीं कि पश्चिम का मीडिया आज तक भारत की कमियों तथा समस्याओं को पूर्वाग्रही व अतिरंजित ढंग से प्रस्तुत करता रहा है.

बहरहाल जरूरत इस बात की है कि भारत के संबंध में सही जानकारी दुनिया को मिले एवं सही मुद्दों पर अंतर्राष्ट्रीय मानवीय हितों की रक्षा की जाए. प्रधानमंत्नी नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्नी जयशंकर ने हाल के महीनों में विभिन्न देशों के शीर्ष नेताओं को सही तथ्यों से अवगत भी कराया है. दुनिया के देशों के राजनयिक, नेता, व्यापारी, शिक्षाविद, अर्थशास्त्नी भारत आते हैं और रहते भी हैं. उन्हें भी भारत के विरुद्ध दुष्प्रचार को रोकने में सहयोग करना चाहिए. 

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