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एआईएमआईएमः हैदराबाद में मनी खुशी, मुंबई से मिला गम

By Amitabh Shrivastava | Updated: February 21, 2026 05:25 IST

मगर रद्द होने की बात सुनते ही एआईएमआईएम के प्रदेशाध्यक्ष इम्तियाज जलील ने उसे राज्य सरकार का मुसलमानों के लिए रमजान का तोहफा बता दिया.

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ठळक मुद्देयानी 12 साल बीतने तक उसकी चिंता किसी को नहीं थी.अल्पसंख्यक समुदाय की चिंताओं पर संघर्ष करते नहीं मिले.मुस्लिम हितों को हाशिए पर लाने में कोई कसर नहीं छोड़ी.

बीते रविवार की ही बात है, जब ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) हैदराबाद में महाराष्ट्र में हुए स्थानीय निकायों के चुनावों में मिली सफलता का जश्न मना रही थी और जैसे ही उनके नेताओं की वापसी हुई, खबर यह आ गई कि राज्य में पांच प्रतिशत मुस्लिम आरक्षण से जुड़ा अध्यादेश रद्द हो गया है. हालांकि उसे वर्ष 2014 में कांग्रेस की सरकार ने जारी किया था, जिसे मुंबई उच्च न्यायालय में चुनौती दिए जाने के बाद स्थगन मिल गया था. बाद में अध्यादेश की अवधि समाप्त हो गई थी. यानी 12 साल बीतने तक उसकी चिंता किसी को नहीं थी.

मगर रद्द होने की बात सुनते ही एआईएमआईएम के प्रदेशाध्यक्ष इम्तियाज जलील ने उसे राज्य सरकार का मुसलमानों के लिए रमजान का तोहफा बता दिया. असलियत यह भी है कि एक दशक की अवधि में मुसलमानों के वोटों की राजनीति करने वाले संसद से विधानसभा तक पार्टी लाइन से इतर अल्पसंख्यक समुदाय की चिंताओं पर संघर्ष करते नहीं मिले.

नौबत यहां तक आई कि एआईएमआईएम ने मसीहा बनने की कोशिश तो की, लेकिन उसे राजनीतिक परिदृश्य में अलग-थलग कर देखा गया. बाकी दलों ने अपने हथियार डालकर तमाशा देखा. इसी कमजोरी को भगवा दलों ने न केवल भुनाया, बल्कि मुस्लिम हितों को हाशिए पर लाने में कोई कसर नहीं छोड़ी.

संसद से लेकर विधानसभा तक महाराष्ट्र के मुस्लिमों का प्रतिनिधित्व देखा जाए तो राज्यसभा में ही दो सांसद इमरान प्रतापगढ़ी और फौजिया खान नजर आते हैं. विधानसभा में दस मुस्लिम विधायक हैं, जो कांग्रेस, राकांपा, समाजवादी पार्टी और एआईएमआईएम का प्रतिनिधित्व करते हैं. राज्य में मुस्लिमों की आबादी करीब 12 प्रतिशत यानी सवा करोड़ मानी जाती है.

मगर वर्ष 2019 के विधानसभा चुनाव के मुकाबले एक भी सीट का अंतर नहीं आया. यद्यपि राज्य की कई सीटों पर मुस्लिम मतदाताओं की संख्या 30 प्रतिशत और कुछ सीटों पर 50 प्रतिशत है. स्पष्ट है कि राज्य स्तर पर प्रतिनिधित्व कमजोर है. उधर, हाल के महानगर पालिका चुनाव में 125 वार्डों में एआईएमआईएम की जीत चर्चा में है.

उसने 13 मनपा में जीत हासिल की है, जो पिछली बार जीते 56 वार्डों से कहीं अधिक है. एआईएमआईएम ने राज्य में पहली बार वर्ष 2012 के नांदेड़ मनपा चुनावों में चुनावी सफलता दर्ज की थी. इस लिहाज से सियासी तौर पर राज्य में पार्टी के पास व्यापक समर्थन है. इसी तरह उसका वर्ष 2014 में विधानसभा में प्रवेश और वर्ष 2019 में लोकसभा तक पहुंच के बाद भी राज्य के मुस्लिमों की चिंताएं वही पुरानी हैं.

यदि इतिहास पर नजर दौड़ाई जाए तो राज्य में कांग्रेस ही मुस्लिमों की सबसे बड़ी रहनुमा रही है. उसने एक तरफ जहां अनेक पदों पर मुसलमानों को नेतृत्व का अवसर दिया, वहीं अल्पसंख्यक वर्ग की आवश्यकताओं से निपटने के लिए सरकारी प्रावधान किए. कांग्रेस के बाद राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी(राकांपा) ने भी मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाए.

इस बीच, समाजवादी पार्टी भी किसी हद तक समुदाय का सोच-विचार करती रही. किंतु कांग्रेस के सत्ता से दूर होने के बाद भगवा दलों के आने से सारे समीकरण तहस-नहस हो गए. उनसे मुकाबले के लिए एआईएमआईएम ने कोशिश की, लेकिन वह चुनावी दायरे के बाहर मोर्चा नहीं खोल पाई.

उसके नेता संसद में अमेरिका से लेकर लद्दाख और राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल तक के राज्यों की चिंता करते हैं. मणिपुर का भी वे जिक्र करते हैं. मगर वे राज्य में मुस्लिमों के सूरतेहाल के लिए कोई मोर्चा खोलते नहीं दिखते हैं. चुनाव के बाद जश्न और जलसे ही अधिक होते हैं. संघर्ष और शिकायतें कम ही होती हैं. दूसरी ओर भगवा दलों का एक समूह लगातार मुस्लिमों पर हमले बोलता है.

राज्य के हर कोने में एक नेता अनर्गल प्रलाप करता रहता है. उसे सरकार की शह मिलती है. बार-बार सरकारी योजनाओं में कटौती या फिर किसी घटना-बयान पर भगवा दलों के शीर्ष नेताओं का शामिल होना मुस्लिमों की सरकार से अपेक्षा भंग करता है. एआईएमआईएम अपनी खुशियां मनाने हैदराबाद जाती है, लेकिन उसे मुंबई से मिले गम से समुदाय को बाहर निकालने का रास्ता नजर नहीं आता है.

जिससे मुस्लिमों की समस्याओं का निराकरण दूर की सोच बन कर रह जाती है. एआईएमआईएम नेता असदुद्दीन ओवैसी अपनी जनसंख्या के अनुरूप प्रतिनिधित्व चाहते हैं, लेकिन इस बारे में वह सभी दलों के मुस्लिम नेताओं में सर्वसम्मति तैयार नहीं कर पाते हैं. उनकी बात भाषणों और साक्षात्कारों में सुनी जाती है. वह खुलकर मुस्लिम एकजुटता के लिए संघर्ष नहीं करते हैं.

वह अल्पसंख्यकों के लिए बजट कम होने की बात करते हैं, लेकिन उस पर सरकारी पक्ष बजट के अलग-अलग क्षेत्रों में बंटवारे पर उत्तर नहीं देते हैं. वह मुस्लिमों के साथ अत्याचार के मुद्दों को उठाते हैं, लेकिन किसी की कानूनी लड़ाई नहीं लड़ते हैं. यही स्थिति मुस्लिमों को चुनाव के बाद समाधान नहीं देती है. वह चुनाव बाद कहीं न कहीं ठगा महसूस करता है.

आजादी के 75 साल बीत जाने के बाद राज्य का औसत मुसलमान मुश्किलों के दौर से गुजर रहा है. शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार उसके सामने बड़े संकट हैं. हाल के दिनों में मुस्लिम लड़कियों ने अनेक क्षेत्रों में उपलब्धि दर्ज की है, लेकिन उन्हें भी आवश्यक सहयोग और सहायता नहीं मिल रही है. लेकिन राजनीति की बिसात पर नई-नई स्थितियां उभर रही हैं.

मुसलमानों के हितचिंतक उनके मतों के सहारे आगे बढ़ रहे हैं, किंतु अपने समुदाय को हर हाल में न्याय दिलाने के लिए कमर नहीं कस रहे. वह अपनी सीमाओं-समझौतों से अपना दामन बचा रहे हैं. यदि  उन्होंने जिम्मेदारी ली है तो उसे पूरा करना उनका फर्ज बनता है. उन्हें चुनाव ही नहीं, बल्कि हर मोर्चे पर मुकाबले के लिए तैयार होना होगा.

शायर दुष्यंत कुमार के शेर से मुस्लिम मतों की प्रत्यक्ष राजनीति के लिए यही कहा जाएगा-

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए.

जीत-हार के जश्न और जलसे कहीं भी और कितने भी हों, राज्य के मुस्लिमों की परिस्थितियां बदलनी चाहिए.

टॅग्स :ऑल इंडिया मजलिस -ए -इत्तेहादुल मुस्लिमीनअसदुद्दीन ओवैसीमुंबईहैदराबाद
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