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अभय कुमार दुबे का ब्लॉग: लॉकडाउन की बैलेंस शीट को समझें

By अभय कुमार दुबे | Updated: May 6, 2020 11:11 IST

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक भारत में हर साल 440000  लोग टीबी से मर जाते हैं. इसी तरह बहुत सारे लोग मलेरिया के शिकार हो जाते हैं. चूंकि पूरी की पूरी स्वास्थ्य प्रणाली (जो पहले से ही कमजोर और अव्यवस्थित थी) कोरोना की तरफ झुकी हुई है, इसलिए न तो टीबी के मरीजों का ख्याल रखा जा रहा है और न ही मलेरिया नियंत्रण कार्यक्रम गति पकड़ पा रहा है. इसी तरह अस्पतालों में संक्रमण के भय से वे मरीज नहीं आ रहे हैं जो आम तौर पर आते थे. उनकी जान को खतरा बढ़ गया है. कैंसर से होने वाली मौतों में भी बढ़ोत्तरी देखी जा रही है.

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देश में लॉकडाउन उठाने का सिलसिला शुरू हो गया है. कोरोना से संबंधित इस रणनीतिक परिवर्तन के केंद्र में देश के कुछ सबसे बड़े कॉर्पोरेट सरबराहों के ताजे विचार हैं. इनमें इन्फोसिस के संस्थापक और अत्यंत सम्मानित नारायण मूर्ति के एक कथन पर गौर करना आवश्यक है. नारायण मूर्ति का कहना है कि साल भर में देश भर में विभिन्न कारणों से (कोरोना से अलग) प्रतिवर्ष करीब नब्बे लाख लोगों की मृत्यु हो जाती है. यानी तेईस हजार से ज्यादा लोग प्रतिदिन धरती छोड़ जाते हैं.

उन्होंने इसका मतलब यह निकाला है कि पिछले दो महीने में कोरोना से मरे एक हजार से कुछ ज्यादा लोग इसकी तुलना में कुछ नहीं ठहरते. यानी, इस महामारी में हो रही मौतों से हमें घबराहट का शिकार नहीं होना चाहिए.

नारायणमूर्ति ने चेतावनी दी है कि अगर घरबंदी जल्दी ही खत्म नहीं की गई तो कोरोना के मुकाबले भूख से मरने वालों की संख्या कई गुना होगी. सीधे तौर पर वे कह रहे हैं कि लॉकडाउन से हम कम जानें बचाएंगे, लेकिन उसके कारण कहीं ज्यादा जानें जाएंगी. इस मानीखेज अवलोकन में वरिष्ठ अर्थशास्त्री दीपक नैयर का एक विश्लेषण भी जोड़ लेना चाहिए. प्रोफेसर नैयर का अंदाजा है कि हमारे देश में ‘हर्ड इम्युनिटी’ एक स्तर पर पहले से ही है.

अगर यह न होती तो मुंबई की धारावी में और गरीबों के भीड़ भरे इलाकों (जहां एक-एक घर में छह से दस लोग तक रहते हैं) में कोरोना के कारण लाशों के अंबार लग जाते. लेकिन, ऐसा कुछ नहीं हुआ. गरीबों को जहां भी मौका मिला है, वे काम पर जा रहे हैं. सफाई मजदूर, चौकीदार और अन्य श्रमिक रोज काम कर रहे हैं. क्या ये अमृत पीकर आए हैं? नहीं. इनके भीतर पहले से एक ऐसी रोग-प्रतिरोधक क्षमता है कि संक्रमितों की संख्या में इनका प्रतिशत निहायत ही मामूली है. अर्थात हर्ड इम्युनिटी के लिए हमें अपनी आबादी का साठ प्रतिशत संक्रमित करवाने की जरूरत नहीं है.

हाल ही में हमारे जमाने के जाने-माने आर्थिक पत्रकार स्वामीनाथन अय्यर ने वैश्विक परिप्रेक्ष्य में एक विश्लेषण के माध्यम से बताने का प्रयास किया है कि लॉकडाउन जानें कम बचा रहा है और उसकी वजह से जानें ज्यादा जा रही हैं. यह स्थिति न केवल भारत में है, बल्कि सारी दुनिया में है.

स्वामीनाथन ने ‘एक्सेस डेथ्स’ यानी सामान्य तौर पर होने वाली मौतों से अधिक  के आंकड़े पेश किए हैं. उनका कहना है कि लॉकडाउन की वजह से यातायात और कार्यस्थल पर होने वाली मौतों की संख्या न के बराबर रह गई है. इसी तरह अपराधियों के हाथों मारे जाने वाले लोगों की संख्या भी बहुत कम हो गई है. इस लिहाज से गैर-कोरोना मौतों की संख्या में कमी आनी चाहिए थी. लेकिन हुआ उल्टा है. गैर-कोरोना मौतों की संख्या पहले से बढ़ी है. येल विश्वविद्यालय द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार मार्च-अप्रैल में अतिरिक्त मौतों की संख्या 15,400 निकली, जिनमें वायरस से मरे लोग केवल 53 फीसदी थे. यानी, गैर-कोरोना मौतों का प्रतिशत 47 फीसदी निकला.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक भारत में हर साल 440000  लोग टीबी से मर जाते हैं. इसी तरह बहुत सारे लोग मलेरिया के शिकार हो जाते हैं. चूंकि पूरी की पूरी स्वास्थ्य प्रणाली (जो पहले से ही कमजोर और अव्यवस्थित थी) कोरोना की तरफ झुकी हुई है, इसलिए न तो टीबी के मरीजों का ख्याल रखा जा रहा है और न ही मलेरिया नियंत्रण कार्यक्रम गति पकड़ पा रहा है. इसी तरह अस्पतालों में संक्रमण के भय से वे मरीज नहीं आ रहे हैं जो आम तौर पर आते थे. उनकी जान को खतरा बढ़ गया है. कैंसर से होने वाली मौतों में भी बढ़ोत्तरी देखी जा रही है. बड़े अस्पतालों की हालत यह है कि वहां आईसीयू खाली पड़े हैं और इमरजेंसी वाले ऑपरेशनों के अलावा सभी अन्य ऑपरेशन रोक दिए गए हैं. यह स्थिति भी अतिरिक्त मौतों को बढ़ावा देने वाली है.

नारायण मूर्ति ने जो कहा है, उसका अगर ध्यान नहीं रखा गया तो भूख से होने वाली मौतों की बहुत बड़ी संख्या सामने आने वाली है. भारत के पूर्व मुख्य सांख्यिकीविद प्रणव सेन के अनुसार भारत में कुल साढ़े छह करोड़ उद्यम हैं, जिनमें से केवल चालीस लाख औपचारिक रूप से रजिस्टर्ड हैं. बाकी सभी अनौपचारिक क्षेत्र में काम कर रहे हैं. लॉकडाउन इन सभी को अंतिम सांसें लेने के लिए मजबूर कर रहा है. अगर इन्हें वक्त रहते न बचाया गया तो करोड़ों का रोजगार जाएगा (12 करोड़ का तो जा ही चुका है), अनगिनत लोग मरेंगे, कुल घरेलू उत्पाद नकारात्मक होकर उत्पादन-उपभोग-आमदनी का चक्र कम से कम दस साल के लिए भंग हो जाएगा.

अमेरिका ने अपने कुल घरेलू उत्पाद का दस फीसदी और जापान ने बीस फीसदी का पुनर्वास पैकेज देकर अपनी अर्थव्यवस्थाओं में जान फूंकने की कोशिश की है. भारत ने अभी तक जो दिया है वह केवल 0.8 फीसदी ही है. इससे कुछ नहीं होगा. यह तो तपते तवे पर एक बूंद की तरह भी नहीं है. हमारे पास ज्यादा समय भी नहीं है. महीने भर में ही सारे निर्णय लेने हैं, लॉकडाउन खोलना है, पैकेज देना है और कोरोना के खिलाफ जरूरी सतर्कता बरतते हुए जन-जीवन को सामान्य हालत में लाना है. 

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