Excise policy case: दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश स्वर्ण कांता शर्मा ने अरविंद केजरीवाल की याचिका खारिज कर दी

By रुस्तम राणा | Updated: April 20, 2026 21:01 IST2026-04-20T21:01:19+5:302026-04-20T21:01:19+5:30

जस्टिस शर्मा ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि इसमें किए गए दावों के समर्थन में कोई सबूत नहीं है और ये दावे सिर्फ़ उन आरोपों पर आधारित हैं जो उनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हैं।

Excise policy case Delhi HC judge Swarana Kanta Sharma rejects Arvind Kejriwal's recusal plea | Excise policy case: दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश स्वर्ण कांता शर्मा ने अरविंद केजरीवाल की याचिका खारिज कर दी

Excise policy case: दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश स्वर्ण कांता शर्मा ने अरविंद केजरीवाल की याचिका खारिज कर दी

नई दिल्ली: दिल्ली हाई कोर्ट ने अरविंद केजरीवाल और अन्य लोगों की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें दिल्ली आबकारी नीति मामले की सुनवाई से जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा को हटाने की मांग की गई थी। जस्टिस शर्मा ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि इसमें किए गए दावों के समर्थन में कोई सबूत नहीं है और ये दावे सिर्फ़ उन आरोपों पर आधारित हैं जो उनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हैं।

फ़ैसला सुनाते हुए उन्होंने कहा, “जब मैंने यह फ़ैसला लिखना शुरू किया, तो कोर्टरूम में सन्नाटा छा गया था। जो बचा था, वह था एक जज होने का दायित्व, जिसने भारत के संविधान की शपथ ली है - यानी भारत की। मुझे एहसास हुआ कि एक जज के तौर पर मेरी चुप्पी की ही परीक्षा हो रही थी, और अब सवाल जज की निष्पक्षता और खुद संस्था की निष्पक्षता को लेकर था।”

जज ने स्थिति को ‘कैच-22’ बताया

आदेश सुनाते हुए जस्टिस शर्मा ने इस स्थिति को कोर्ट के लिए एक मुश्किल स्थिति बताया। “अब, यह खुद को सुनवाई से अलग करने (recusal) के मामले में एक ‘कैच-22’ वाली स्थिति है। इस मामले में, मुझे ऐसी स्थिति में डाल दिया गया है कि चाहे मैं खुद को सुनवाई से अलग करूँ या न करूँ, सवाल तो उठेंगे ही। याचिकाकर्ता (केजरीवाल) ने अपने लिए एक ऐसी स्थिति बना ली है जिसमें हर हाल में उसी की जीत होगी।”

उन्होंने समझाया कि अगर वह खुद को सुनवाई से अलग कर लेतीं, तो इससे यह संकेत मिल सकता था कि आरोपों में कुछ सच्चाई है; वहीं अगर वह मामले की सुनवाई जारी रखतीं, तो इससे उनकी आलोचना हो सकती थी।

अदालत ने कहा - पक्षपात का कोई सबूत नहीं

अदालत ने साफ कर दिया कि पक्षपात के आरोपों के लिए ठोस सबूत होने चाहिए, सिर्फ़ शक काफ़ी नहीं है। कोर्ट ने कहा, “किसी मुक़दमेबाज़ की आम बेचैनी या यह डर कि शायद यह अदालत उसे राहत न दे, उस ऊँचे मापदंड से बहुत नीचे होना चाहिए जो किसी जज के खुद को केस से अलग करने (recuse) के लिए ज़रूरी है।” जज ने ज़ोर देकर कहा कि फ़ैसले सिर्फ़ लोगों की सोच या अंदाज़ों पर आधारित नहीं हो सकते, बल्कि उन्हें पूरी तरह से क़ानून और तथ्यों पर आधारित होना चाहिए।

परिवार से जुड़े आरोपों पर कड़ा जवाब

याचिका में उठाया गया एक अहम मुद्दा जज के बच्चों की पेशेवर भूमिकाओं से जुड़ा था। कड़ा जवाब देते हुए अदालत ने कहा कि उसके परिवार के सदस्यों और इस केस के बीच कोई संबंध नहीं है।

“अगर किसी राजनेता की पत्नी राजनेता बन सकती है, अगर किसी राजनेता के बच्चे राजनेता बन सकते हैं, तो यह कैसे कहा जा सकता है कि किसी जज के बच्चे क़ानून के पेशे में नहीं आ सकते? इसका मतलब तो यह होगा कि जजों के परिवार के मौलिक अधिकार छीन लिए जाएँ।”

अदालत ने आगे कहा कि किसी भी मुक़दमेबाज़ को यह सवाल उठाने का कोई हक़ नहीं है कि कोई जज का परिवार अपनी ज़िंदगी कैसे जीता है। “कोई भी मुक़दमेबाज़ यह तय नहीं कर सकता कि किसी जज के बच्चे या परिवार के सदस्य अपनी ज़िंदगी कैसे जिएँगे।”

अदालत ने बिना सबूत के न्यायपालिका पर हमला करने के ख़िलाफ़ चेतावनी दी

जस्टिस शर्मा ने बिना जाँच-पड़ताल के ऐसे दावे करने के ख़िलाफ़ भी आगाह किया जिनसे इस संस्था को नुकसान पहुँच सकता है। “इस बात का कोई सबूत न होने पर कि किसी जज के बच्चों ने अदालत के पद का दुरुपयोग किया है, ऐसे किसी भी आरोप की कानाफूसी भी नहीं की जा सकती।”

उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि भले ही परिवार के सदस्य सरकारी लीगल पैनल का हिस्सा हों, लेकिन इससे अपने-आप कोई टकराव पैदा नहीं होता, जब तक कि उसका सीधा संबंध मामले से न हो। कोर्ट ने साफ़ किया कि वकील राजनीतिक पार्टियों का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं, लेकिन फ़ैसले सिर्फ़ मेरिट के आधार पर ही दिए जाते हैं।

“बार के कुछ सदस्य शायद किसी राजनीतिक पार्टी का प्रतिनिधित्व कर रहे हों, लेकिन जब वे कोर्ट के सामने पेश होते हैं, तो उनके मामलों का फ़ैसला मेरिट के आधार पर होता है, न कि राजनीतिक जुड़ाव के आधार पर।” कोर्ट ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि कोई भी मुक़दमेबाज़ राजनीतिक आधार पर बार और बेंच के बीच के रिश्ते को कमज़ोर नहीं कर सकता।

न्यायिक स्वतंत्रता पर संदेश

एक कड़े संदेश में, कोर्ट ने कहा कि बिना सबूत के ऐसी दलीलों को मंज़ूरी देने से न्याय व्यवस्था को नुकसान पहुँच सकता है। “कोई भी जज किसी मुक़दमेबाज़ की महज़ धारणा के आधार पर अपने न्यायिक काम को नहीं छोड़ सकता।”

जज ने यह चेतावनी भी दी कि ऐसी गुज़ारिशों को स्वीकार करने से एक गलत मिसाल कायम हो सकती है और कोर्ट दबाव के प्रति कमज़ोर पड़ सकते हैं।

Web Title: Excise policy case Delhi HC judge Swarana Kanta Sharma rejects Arvind Kejriwal's recusal plea

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