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अभय कुमार दुबे का ब्लॉग: एनआरसी लागू करने के असीमित हैं खतरे

By अभय कुमार दुबे | Updated: February 13, 2020 08:47 IST

ध्यान रहे कि भारतीय समाज दस्तावेज-कुशल नहीं है. पिछली दो पीढ़ियों से पहले के लोगों के पास उनके जन्म-प्रमाणपत्र नहीं हैं. जिन क्षेत्रों में नियमित रूप से प्राकृतिक आपदाएं आती हैं, वहां भी लोगों के पास दस्तावेज नहीं होते हैं. खास बात यह है कि सरकार को इन समस्याओं का इल्म है फिर भी उसके मन में एनआरसी का मंसूबा कायम है. कोई न कोई मंत्री अपनी बातचीत या भाषण में यह कह ही देता है कि आखिर एनआरसी क्यों नहीं होना चाहिए.

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एक आरटीआई के जवाब में केंद्र सरकार ने बताया है कि पूरे देश के लिए नेशनल रजिस्टर फॉर सिटिजनशिप बनाने का फैसला अभी नहीं लिया गया है. हम चाहें तो इस जवाब पर ठंडी सांस ले सकते हैं. बेहतर होता कि सरकार और भी आगे बढ़ कर कहती कि भविष्य में भी एनआरसी लाने का कोई इरादा नहीं है. ऐसा न कह कर सरकार ने उन अंदेशों को जीवित रखा है जो एनआरसी के गर्भ से निकले हैं. ये अंदेशे केवल अल्पसंख्यकों, खासकर मुसलमानों से ही नहीं जुड़े हैं. इनका संबंध पूरे देश, उसकी समाज-व्यवस्था, उसकी राजनीति और  उसकी अर्थव्यवस्था से है.

विश्लेषण की शुरुआत असम से ही की जा सकती है जहां देश की जनता एनआरसी का ट्रेलर देख चुकी है और जहां नए नागरिकता कानून का जबर्दस्त विरोध चल रहा है. असम की आबादी भारत की आबादी का चालीसवां हिस्सा है. वहां एनआरसी लागू करने के लिए सरकार को 1600 करोड़ रुपए खर्च करने पड़े. जाहिर है कि जब पूरे देश में यह लागू किया जाएगा तो किसी भी तरह से 64000 करोड़ से कम खर्च नहीं होंगे.

कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर प्रियरंजन झा के मुताबिक यह रकम भारत के कुल शिक्षा-बजट का दो-तिहाई है. यह तो केवल आर्थिक मूल्य है जो भारत को मुट्ठी भर बांग्लादेशी घुसपैठियों को तलाश करने के लिए की गई इस कवायद के लिए चुकाना पड़ेगा. भूसे के ढेर से सुई खोजने जैसी इस कवायद से होने वाले दूसरे नुकसानों के बारे में अभी केवल मोटा-मोटा अंदाजा ही लगाया जा सकता है.

जैसे ही एनआरसी लागू होगा, वैसे ही सारे देश में प्रत्येक भारतीय को उन दस्तावेजों का बंदोबस्त करना होगा जिनकी जरूरत होगी. और, फिर बड़े पैमाने पर अधिकारी तंत्र की बन आएगी, घूसखोरी का बाजार गर्म होगा, अभूतपूर्व पैमाने पर फर्जीवाड़ा होगा और व्यवस्था संबंधी ऐसी अराजकता फैलेगी जिसका अनुमान अभी लगाया ही नहीं जा सकता.

ध्यान रहे कि भारतीय समाज दस्तावेज-कुशल नहीं है. पिछली दो पीढ़ियों से पहले के लोगों के पास उनके जन्म-प्रमाणपत्र नहीं हैं. जिन क्षेत्रों में नियमित रूप से प्राकृतिक आपदाएं आती हैं, वहां भी लोगों के पास दस्तावेज नहीं होते हैं. खास बात यह है कि सरकार को इन समस्याओं का इल्म है फिर भी उसके मन में एनआरसी का मंसूबा कायम है. कोई न कोई मंत्री अपनी बातचीत या भाषण में यह कह ही देता है कि आखिर एनआरसी क्यों नहीं होना चाहिए.

2003 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने मल्टीपरपज नेशनल आइडेंटिटी कार्ड (एमएनआईसी) बनाने का एक पायलट प्रोजेक्ट चलाने का फैसला किया था. 12 राज्यों और एक केंद्रशासित प्रदेश के तेरह जिलों की 31 लाख की आबादी को एमएनआईसी मुहैया कराने की कवायद भाजपा सरकार को हराने वाली कांग्रेस सरकार के गृह मंत्रालय ने 2006 में शुुरू की.

2009 में यह प्रोजेक्ट खत्म हुआ और तब तक 12 लाख एमएनआईसी बना कर बांटे गए. जिन अफसरों ने इस परियोजना को चलाया था, उनका कहना है कि नागरिकता का प्रश्न बहुत पेचीदा साबित हुआ, क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों के पास दस्तावेज थे ही नहीं जिनके आधार पर वे अपनी नागरिकता प्रमाणित कर पाते. खेतिहर मजदूरों, भूमिहीन मजदूरों, शादी के कारण अपना घर छोड़ कर ससुराल में रह रही स्त्रियों और काम की तलाश में दूसरे क्षेत्रों में गए लोगों के बहुत बड़े हिस्से के पास कागजात नहीं पाए गए. नतीजतन, एमएनआईसी प्रोजेक्ट को आगे न चलाने का निर्णय लिया गया. मेरा तो विचार यह है कि दस्तावेज न होने की समस्या केवल ग्रामीण क्षेत्रों में ही नहीं, कस्बाई और शहरी क्षेत्रों में भी पाई जाएगी.

अपने अल्पसंख्यक विरोधी किरदार के कारण भाजपा सरकार शायद इस तरह सोचती होगी कि अगर एनआरसी में कोई हिंदू फंसता है और उसकी नागरिकता पर सवालिया निशान लगता है तो उसे शरणार्थी का दर्जा देकर बिना किसी दस्तावेज के नागरिकता दी जा सकेगी. इसीलिए उसने पहले सीएए पारित किया है, ताकि असम की तरह एनआरसी में फंसे हिंदुओं को फास्टट्रैक शैली मेंं नागरिकता दी जा सके. जाहिर है कि इस रवैये के अनुसार सीएए और एनआरसी शर्ट और पैंट की तरह हैं. अगर एक को पहनना है तो दूसरे को भी पहनना होगा. इस लिहाज से अगर कोई पार्टी एनआरसी का विरोध करती है और सीएए के साथ है, तो वह या तो अपने आपको धोखा दे रही है या फिर दूसरों को.

नागरिकता संबंधी विवाद ने एक और समस्या को पैदा किया है. इसने जनगणना की प्रक्रिया को भी संदिग्ध बना दिया है. चूंकि लोगों के दिमाग में ऐसे किसी भी प्रश्न को लेकर संदेह पैदा हो गया है जिसके जरिये उनसे उनके बारे में प्रमाण मांगे जाएंगे, इसलिए दसवार्षिकी जनगणना करने वाले कर्मचारियों को भी सारे देश में मुश्किलों का सामना करना होगा. ऐसी खबरें आ रही हैं कि कई जगहों पर दूसरे मकसदों से जांच-पड़ताल करने वाले सरकारी कर्मचारियों के साथ लोगों ने बदसलूकी की है या उन्हें बंधक बना लिया है. अगर जनगणना ठीक से नहीं हो पाई, तो राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के हाथ बंध जाएंगे और भारतवासियों के बारे में मिलने वाली बहुमूल्य सूचनाओं से वंचित होने की नौबत आ जाएगी. यह एक ऐसा नुकसान होगा, जिसकी भरपाई करने में भारतीय राज्य को कई दशक भी लग सकते हैं.

टॅग्स :एनआरसी (राष्ट्रीय नागरिक पंजिका)इंडियामोदी सरकारभारतीय जनता पार्टी (बीजेपी)
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