कुमार सिद्धार्थ
स्वच्छ हवा आज दुनिया की सबसे बुनियादी जरूरतों में शामिल है, लेकिन वैश्विक वित्तीय व्यवस्था इसे अब भी प्राथमिकता नहीं मानती. क्लीन एयर फंड की ताजा वैश्विक रिपोर्ट एक बार फिर इस कड़वी सच्चाई को सामने लाती है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति और विकास एजेंसियां स्वच्छ हवा के लिए बड़े-बड़े वादे तो जरूर करती हैं, लेकिन उनका धन उन्हीं परियोजनाओं में जा रहा है, जो हवा को और जहरीला बना रहा है. यह स्थिति केवल नीतिगत विफलता नहीं, बल्कि एक ऐसे वैश्विक अन्याय का उदाहरण है, जिसका सबसे भारी बोझ तीसरी दुनिया के देशों, खासकर भारत को उठाना पड़ रहा है.
रिपोर्ट के मुताबिक 2023–24 के दौरान दुनिया की सरकारों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने जीवाश्म ईंधन को लंबे समय तक बनाए रखने वाली परियोजनाओं में वित्तीय राशि 80 फीसदी बढ़ाकर 9.5 अरब डॉलर कर दी. इसके उलट, स्वच्छ हवा और वायु गुणवत्ता सुधार के लिए दी जाने वाली सहायता घटकर 3.7 अरब डॉलर रह गई, जो कुल वैश्विक विकास सहायता का महज एक फीसदी ही है.
यह आंकड़ा बताता है कि विकास वित्त और मानव स्वास्थ्य के बीच की खाई कितनी गहरी होती जा रही है.हर साल होने वाले अंतरराष्ट्रीय शिखर सम्मेलन, चाहे वे जलवायु पर हों या स्वास्थ्य पर, स्वच्छ हवा को मानव अधिकार के रूप में स्वीकार करते हैं. लेकिन जब बजट आवंटन की बात आती है तो वही सरकारें और संस्थाएं पीछे हट जाती हैं.
ऐसा लगता है कि वैश्विक निर्णय लेने वाली संस्थाएं प्रदूषण से होने वाली मौतों और बीमारियों की वास्तविक कीमत को समझने के बजाय आर्थिक और कारोबारी हितों को ज्यादा महत्व दे रही हैं. स्थिति और गंभीर तब हो जाती है जब दुनिया की सबसे बड़ी विकास एजेंसी यूएसएड के बंद होने और विश्व बैंक पर जीवाश्म ईंधन ऋण बढ़ाने के दबाव जैसी घटनाएं सामने आती हैं.
इन फैसलों ने स्वच्छ हवा के लिए चल रहे वैश्विक प्रयासों की रीढ़ कमजोर कर दी है. क्लीन एयर फंड की मुख्य कार्यकारी जेन बर्स्टन की चेतावनी इस संदर्भ में बेहद अहम है कि अगर दिशा नहीं बदली गई तो आने वाले वर्षों में करोड़ों और लोग जहरीली हवा के कारण जान गंवाएंगे. आज वायु प्रदूषण दुनिया भर में हर साल लगभग 57 लाख लोगों की जान ले रहा है.
यह संख्या 2040 तक 62 लाख तक पहुंच सकती है. रिपोर्ट यह भी दिखाती है कि स्वच्छ हवा के लिए उपलब्ध सीमित वित्तीय अनुदान का वितरण बेहद असमान है. 2023 में फिलीपींस, बांग्लादेश और चीन को वायु गुणवत्ता सुधार के लिए 65 फीसदी बाहरी फंडिंग मिली, जबकि उप-सहारा अफ्रीका की फंडिंग 91 फीसदी घटकर केवल 1.18 करोड़ डॉलर रह गई.
यानी जिन इलाकों में स्वास्थ्य ढांचा सबसे कमजोर है, वहीं मदद सबसे कम पहुंच रही है. भारत इस वैश्विक असमानता का सबसे बड़ा उदाहरण है. दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों की सूची में भारत के शहर लगातार ऊपर बने हुए हैं. दिल्ली, पटना, लखनऊ, कानपुर, धनबाद, गाजियाबाद- ये नाम अब केवल शहर नहीं, बल्कि वैश्विक प्रदूषण चेतावनी बन चुके हैं.
सर्दियों के महीनों में उत्तर भारत का बड़ा हिस्सा गैस चेंबर में बदल जाता है, जहां बच्चों, बुजुर्गों और बीमार लोगों के लिए सांस लेना तक मुश्किल हो जाता है. इसके बावजूद भारत को स्वच्छ हवा के लिए अंतरराष्ट्रीय फंडिंग में प्राथमिकता नहीं मिलती. न तो वायु प्रदूषण पर शोध के लिए पर्याप्त सहयोग मिलता है,
न ही स्थानीय समाधान विकसित करने के लिए दीर्घकालिक निवेश. जबकि भारत की स्थिति यह है कि यहां वायु प्रदूषण से हर साल करीब 95 अरब डॉलर की आर्थिक क्षति होती है. यह नुकसान केवल अस्पतालों के बढ़ते खर्च में नहीं दिखता, बल्कि काम के दिनों की हानि, स्कूल न जा पाने वाले बच्चों, घटती उत्पादकता और जीवन की गिरती गुणवत्ता के रूप में सामने आता है.