भारत में अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर के इस बयान की बड़ी चर्चा हो रही है कि अमेरिका के नेतृत्व वाली रणनीतिक पहल, पैक्स सिलिका में शामिल होने के लिए भारत को आमंत्रित किया जाएगा. लेकिन सबसे महत्वपूर्ण सवाल है कि भारत को संस्थापक सदस्य क्यों नहीं बनाया गया? सबसे पहले तो समझिए कि ये पैक्स सिलिका है क्या? इस समय दुनिया में सिलिकॉन सप्लाई चेन पर चीन का कब्जा है. उसके पास रेयर अर्थ मिनरल्स हैं. चीन ने पिछले दिनों सप्लाई चेन को जरा सा बाधित किया तो अमेरिका हिल गया. अब अमेरिका को लगता है कि चीन का विकल्प तैयार करना बहुत जरूरी है जो उसके काम आए. पैक्स सिलिका वस्तुत: एक नेटवर्क की तरह होगा, जिसमें चिप बनाने की टेक्नोलॉजी, मशीन, मैन्युफैक्चरिंग, निवेश, रिसर्च एंड डेवलपमेंट यानी सब कुछ शामिल होगा.
यानी यह सिलिका पैक सीधे तौर पर चीन की नकेल कसने की कोशिश है. पैक्स सिलिका का गठन पिछले ही महीने यानी दिसंबर 2025 में किया गया था और पहले पैक्स सिलिका समिट में जापान, दक्षिण कोरिया, सिंगापुर, नीदरलैंड, यूनाइटेड किंगडम, इजराइल, संयुक्त अरब अमीरात और ऑस्ट्रेलिया के स्टेकहोल्डर्स शामिल हुए थे.
आमंत्रित अतिथियों के रूप में ताइवान, यूरोपीय संघ, कनाडा भी शामिल हुए थे. क्या उस वक्त भारत को भी इसमें शामिल नहीं किया जा सकता था? निश्चय ही किया जा सकता था लेकिन भारत को अमेरिका अपने साथ बनाए भी रखना चाहता है और शायद बहुत ज्यादा तवज्जो भी नहीं देना चाहता.
अब जब दोनों देशों के बीच खटास चरम पर है तब अमेरिका को लगा होगा कि भारत जैसे विशाल देश को इसमें शामिल किया जाना चाहिए क्योंकि ये बात तो अमेरिका को भी पता है कि भारत के पास भले ही रेयर अर्थ मिनरल्स जैसी महत्वपूर्ण चीज न हो लेकिन भारत के पास बौद्धिक गुणवत्ता है और उसकी जरूरत पैक्स सिलिका को पड़ सकती है.
अमेरिका का दूसरा मकसद भारत को चीन से दूर रखने का भी है. उसे यह डर भी सताता है कि भारत कहीं चीन के साथ न हो जाए! हालांकि ऐसा होने की संभावना फिलहाल नहीं दिखाई देती लेकिन वैश्विक राजनीति में कभी भी कुछ भी हो सकता है. भारत के नजरिये से देखें तो पैक्स सिलिका जैसी सप्लाई चेन में शामिल होना निश्चय ही फायदेमंद होगा लेकिन भारत को बहुत स्पष्ट रूप से अमेरिका और पैक्स सिलिका के दूसरे सदस्य देशों से यह पूछना चाहिए कि इसमें भारत की भूमिका क्या होगी और हितों की रक्षा कैसे होगी?
हितों का सवाल इसलिए पूछना जरूरी है क्योंकि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प एक ओर तो भारत की महानता का बखान करते हैं, मोदी के साथ खुद की दोस्ती के कसीदे काढ़ते हैं और दूसरी ओर टैरिफ हमला भी करते हैं. यह दोहरा रवैया कैसे चल सकता है?
भारत को स्पष्ट करना चाहिए कि हितों के पारस्परिक सम्मान पर ही रिश्ते आगे बढ़ते हैं या मजबूत होते हैं. ऐसा तो बिल्कुल ही नहीं हो सकता है कि अमेरिका यह चाहे कि भारत उसे फायदा पहुंचाए लेकिन वह भारत के हितों पर कुठाराघात करता रहे! भारत को आंखों में आंखें डाल कर सवाल पूछना चाहिए.