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डॉ विजय दर्डा का ब्लॉग: नेतृत्व की एक प्रेरणादायी कहानी

By विजय दर्डा | Updated: October 2, 2023 06:56 IST

अपने इस कॉलम में मैं आम तौर पर किसी व्यक्ति विशेष के बारे में कभी नहीं लिखता हूं। लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो लीक से अलग हटकर सोचते हैं और सफलता की नई इबारत रचते हैं। ऐसे ही एक शख्स हैं संजीव मेहता, वे नेतृत्व की एक प्रेरणादायी कहानी हैं। इसीलिए मैंने इस कॉलम के लिए उन्हें चुना।

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ठळक मुद्देसंजीव मेहता कॉर्पोरेट जगत में नई सोच और नई इबारत लिखने वाली शख्सियत हैंवे हिंदुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड (एचयूएल) के पूर्व अध्यक्ष/सीईओ और प्रबंध निदेशक रहे हैंसंजीव की सोच मूल्यों से प्रेरित रही है, व्यवसाय के हर कदम पर वो आम आदमी के बारे में सोचते हैं

अपने इस कॉलम में मैं आम तौर पर किसी व्यक्ति विशेष के बारे में कभी नहीं लिखता हूं। विदेश मंत्री एस जयशंकर तथा राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल इसके अपवाद हैं, जिनके व्यक्तित्व पर मैंने इस कॉलम में लिखा। कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो लीक से अलग हटकर सोचते हैं और सफलता की नई इबारत रचते हैं।

ऐसे ही एक शख्स हैं संजीव मेहता, वे नेतृत्व की एक प्रेरणादायी कहानी हैं। इसीलिए मैंने इस कॉलम के लिए उन्हें चुना। कॉर्पोरेट जगत में संजीव मेहता नई सोच और नई इबारत लिखने वाली शख्सियत के रूप में वैश्विक स्तर पर पहचाने जाते हैं। वे हिंदुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड (एचयूएल) के पूर्व अध्यक्ष/सीईओ और प्रबंध निदेशक तथा यूनिलीवर, दक्षिण एशिया के अध्यक्ष की महत्वपूर्ण भूमिका में रहे हैं लेकिन इससे जुड़ा महत्वपूर्ण परिचय यह है कि वे व्यवसाय के हर कदम पर आम आदमी के बारे में सोचते हैं।

उनकी सोच हमेशा नई और मूल्यों से प्रेरित रही है। हमेशा सोचते रहते हैं कि उत्पाद बेहतर और आम आदमी की जेब के अनुकूल कैसे हो क्योंकि वे कानपुर के एक साधारण परिवार में जन्मे और आम आदमी की जरूरतों को समझते हैं। सफलता के शिखर तक की यात्रा असाधारण नेतृत्व कौशल, दूरदर्शिता और प्रतिबद्धता का प्रमाण है।

कौन अंदाजा लगा सकता था कि 1983 में यूनियन कार्बाइड में सेल्स मैनेजर के रूप में अपनी यात्रा शुरू करने वाला यह शख्स अपनी दक्षता का लोहा पूरी दुनिया में मनवाएगा। साल 1992 में वे हिंदुस्तान यूनिलीवर के साथ जुड़े और उनकी कर्मठता और इनोवेशन की तलाश की प्रवृत्ति ने उन्हें कंपनी के भारतीय कारोबार का नेतृत्वकर्ता बना दिया।

उन्होंने न केवल भारत बल्कि संयुक्त अरब अमीरात, बांग्लादेश, मिस्र और फिलीपींस में भी कंपनी के अंतरराष्ट्रीय पदों पर काम किया, एचयूएल के दक्षिण एशिया मुखिया के तौर पर उनके पास भारत के अलावा बांग्लादेश, श्रीलंका, पाकिस्तान, नेपाल और दूसरे देशों की जिम्मेदारी थी।

संजीव मेहता ने एचयूएल को नई दिशा दी। उन्होंने मूल मंत्र दिया कि जो भारत के लिए अनुकूल है वही एचयूएल के लिए अनुकूल है। उन्होंने ग्राहक के सामने उत्पादों की उपलब्धता पर खास तौर पर ध्यान दिया। मैन्युअली ऑर्डर को शिखर नाम के एप्प पर ले आए, जो डिस्ट्रीब्यूशन पहले दो सप्ताह में होता था वह एक दिन में होने लगा।

इस एप्प पर अभी 12 लाख से भी ज्यादा रिटेलर्स व्यवहार कर रहे हैं। उन्हें पता था कि ग्राहक को लगातार कुछ नया चाहिए। बाजार में बने रहना है तो लगातार कुछ नया करना पड़ेगा। इसलिए इनोवेशन हब बनाया। उत्पाद में इतनी विविधता ला दी कि ग्राहक एक बार पास आए तो दूर जा ही न पाए।

उदाहरण के लिए उन्होंने शैंपू के बड़े पैक पर बचत का ज्यादा ऑफर दिया तो शैंपू के पाउच की कीमत इतनी कम रखी कि राह चलता व्यक्ति भी इसे खरीद ले। एचयूएल के पास 50 से ज्यादा ब्रांड हैं। उनके कार्यकाल में कनखजूरा नाम से एक एफएम रेडियो प्रोग्राम भी शुरू हुआ जो बहुत सफल है।

संजीव मेहता चेन्नई की बस्तियों में गए और महिलाओं से पूछा कि वे कौन सा तेल इस्तेमाल करती हैं? महिलाओं ने इंदुलेखा तेल का नाम लिया और कहा कि इससे बाल घने, काले और मजबूत रहते हैं। संजीव ने साथियों से कहा कि अब और रिसर्च की जरूरत नहीं है। तेल के इस इंदुलेखा ब्रांड को एचयूएल ने खरीद लिया। संजीव मेहता ने जीएसके यानी ग्लैक्सोस्मिथक्लीन कंज्युमर हेल्थ को भी एचयूएल का हिस्सा बनाकर बड़ा काम कर दिखाया।

कॉर्पोरेट क्षेत्र में कामयाबी के उनके कई किस्से हैं लेकिन उन्होंने सामाजिक क्षेत्र में भी कई ऐसे काम किए जो उन्हें दूसरे कॉर्पोरेट दिग्गजों से अलग खड़ा करते हैं। जब देश में फॉरेन एक्सचेंज क्राइसिस था तब उन्होंने इस बात पर ध्यान केंद्रित किया कि क्या-क्या स्थानीय स्तर पर ही उपलब्ध किया जा सकता है। ऐसा करके उन्होंने फॉरेन एक्सचेंज की काफी बचत की। उन्होंने तकनीक के माध्यम से अपने संयंत्रों में पानी की खपत में 50 प्रतिशत की कमी की।

लोकमत के साथ मिलकर एचयूएल ने रिन ब्रांड को माध्यम बनाकर महाराष्ट्र में जल संरक्षण का बड़ा और अभिनव अभियान चलाया। करीब 1.3 ट्रिलियन लीटर पानी की बचत हुई। यह अभियान बाद में पूरे देश में चलाया गया। इस अभियान से इतने पानी की बचत हुई जितना दो साल में भारत पीता है।

जल संरक्षण पर रिसर्च के दौरान उन्होंने महसूस किया कि पानी की सर्वाधिक खपत शौचालय, हाथ धोने, नहाने और कपड़ा धोने में होती है। उन्होंने सार्वजनिक सुविधा सेंटर बनाने के लिए सरकार और बीएमसी से अनुमति मांगी लेकिन इसमें एक साल से भी ज्यादा लग गया। अंतत: घाटकोपर में पहला सुविधा सेंटर  बना। अब तक 12 सुविधा सेंटर बन चुके हैं और हर रोज 40 हजार लोग उसका उपयोग कर रहे हैं।

दिलचस्प बात  यह है कि वहां उपयोग में लाए जाने वाले पानी को शुद्ध करके फिर से उपयोग किया जाता है। अब सरकार एचयूएल से कह रही है कि और सुविधा सेंटर खोलें। कोविड ने जब दस्तक दी तो धारावी की तंग बस्तियों में साबुन बांटना शुरू किया ताकि लोग हाथ धोएं और महामारी को रोका जा सके।

उन्होंने वक्त से पहले अंदाजा लगा लिया कि कोविड पैर पसार रहा है तो 70 हजार कोविड टेस्ट किट मंगाकर महाराष्ट्र, गुजरात और मध्यप्रदेश को मुफ्त में बांटा। वह तब जब भारत सरकार केवल 1 लाख किट ही जुटा पाई थी। अपनी पैरेंट कंपनी के सीईओ के प्रभाव का उपयोग करके अमेरिका, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस से 5 हजार से ज्यादा ऑक्सीजन कांसंट्रेटर  मंगाए जिससे मरीजों की जान बचाने में मदद मिली।

संजीव मेहता सीए भी हैं। मशहूर वकील हरीश साल्वे के पिता पूर्व केंद्रीय मंत्री एनकेपी साल्वे नागपुर में एक सीए फर्म चलाते थे और यहीं पर संजीव मेहता ने अपनी आर्टिकलशिप की थी। एचयूएल और लोकमत के संबंध काफी पुराने हैं। मुझे याद आ रहा है कि डॉ. दत्ता सामंत ने मुंबई में बड़ी स्ट्राइक करवा दी तो एचयूएल का मुंबई प्लांट एक साल से ज्यादा बंद रहा।

कंपनी के तत्कालीन प्रमुख डॉ अशोक गांगुली ने उस समय के उद्योग मंत्री मेरे बाबूजी वरिष्ठ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्री जवाहरलाल दर्डा से मदद मांगी। बाबूजी ने उन्हें सलाह दी कि निर्माण केंद्रों का विकेंद्रीकरण कीजिए और  संवाद के लिए अंग्रेजी नहीं बल्कि स्थानीय भाषा का इस्तेमाल कीजिए।

बाबूजी की यह सलाह मान ली गई. बाबूजी ने उन्हें यवतमाल में रेडिमेड शेड उपलब्ध कराया जहां निर्माण कार्य शुरू हुआ। फिर खामगांव में जमीन दी, जहां आज पीयर्स सोप बनता है ओैर दुनिया भर में जाता है। बाबूजी की सलाह पर छिंदवाड़ा में भी कंपनी शुरू हुई। डॉ गांगुली बाद में मेरे साथ राज्यसभा में थे और बाबू जी की मदद का जिक्र भी करते थे।

ऐसी कंपनी को संजीव मेहता ने अपनी प्रतिभा से करीब 60 हजार करोड़ रुपए के टर्नओवर तक पहुंचा दिया। आज संसद में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की लड़ाई चल रही है। जबकि संजीव मेहता के नेतृत्व में एचयूएल काफी आगे निकल चुका है। एचयूएल में नेतृत्वकर्ता महिलाओं का प्रतिशत करीब 50 प्रतिशत जा पहुंचा है।

उन्होंने ट्रेनिंग पर खास ध्यान दिया। एचयूएल को एक यूनिवर्सिटी की तरह बना दिया जहां से निकले लोग आज दूसरी बड़ी कंपनियों में नेतृत्वकर्ता की भूमिका में हैं। सेवानिवृत्ति के बाद वे डैनोन और एयर इंडिया दोनों के लिए गैर-कार्यकारी बोर्ड सदस्य हैं। वास्तव में संजीव मेहता देश की अमूल्य धरोहर हैं।

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