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जलवायु परिवर्तन से बिगड़ेगी अर्थव्यवस्था !

By पंकज चतुर्वेदी | Updated: March 19, 2025 06:38 IST

विशेषज्ञों का मानना है कि इन कीटों के कारण आगामी दिनों में चना, मटर और सरसों का उत्पादन 30 प्रतिशत तक घट सकता है.

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तमिलनाडु का धरमपुर रेशम के लिए मशहूर है. यहां हर साल लगभग 17 लाख टन रेशम कोकून की पैदावार होती है. पिछले कुछ हफ्तों में जिलेभर में कोहरे और खराब जलवायु परिस्थितियों ने ऐसा डेरा डाला कि कोकून की कीमत में भारी वृद्धि हो गई. फरवरी के दूसरे  हफ्ते में इसके दाम 857 रुपए प्रति किलोग्राम दर्ज  किए गए, जबकि इस समय औसत कीमत 520 रुपए से अधिक नहीं होती.

आमतौर पर इस समय इलाके का मौसम खुला रहता है लेकिन इस बार गहरे कोहरे और पाले से कोकून में नमी आ गई. इसके चलते अच्छी गुणवत्ता वाले रेशम का संकट दिखने लगा और दाम चढ़ गए. बदलते मौसम का असर शहतूत के पेड़ों पर भी देखा गया, विदित हो कि रेशम के कीड़ों का आहार शहतूत ही होता है. मंडी में आवक कम और दाम ज्यादा होने से  बुनकर भी परेशान हैं.

धर्मपुरी का रेशम तो एक छोटा सा उदाहरण है कि किस तरह समय से पहले गर्मी आने का व्यापक कुप्रभाव समाज पर पड़  रहा है. प्रवासी पक्षियों का पहले लौटना, सड़क के कुत्ते  और अन्य जानवरों के व्यवहार में अचानक उग्रता  आना और रबी की फसल की पौष्टिकता में कमी आना कुछ और ऐसे कुप्रभाव हैं जो जलवायु परिवर्तन के कारण हमारे यहां दिखने लगे हैं.

इस साल इतिहास में तीसरा सबसे गर्म जनवरी और फरवरी रहा. जनवरी में देश में बारिश 70% कम रही. पहाड़ी राज्यों में बारिश और बर्फबारी 80% तक कम रही. फरवरी के आखिरी हफ्ते में विदर्भ से लेकर तेलंगाना तक 40 की तरफ दौड़ते तापमान ने लू का एहसास करवा दिया. मार्च के दूसरे हफ्ते में ऐन होली पर बरसात और ओला वृष्टि ने फसल का नुकसान दुगुना कर दिया. उसके बाद फिर गर्मी तेवर दिखा रही है.

पर्याप्त ठंड न पड़ने, जाड़े में होने वाली बरसात के न आने और फरवरी में ही गर्मी का असर मध्य भारत के खेतों में रबी की फसल पर कीट के रूप में सामने आ रहा है. विशेष रूप से गेहूं में चंडवा, सरसों, मटर और चना की फसलों में माहू और इल्ली का प्रकोप बढ़ गया है, जिसके कारण इन फसलों में फूल गिरने लगे हैं और किसानों को भारी नुकसान हो रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि इन कीटों के कारण आगामी दिनों में चना, मटर और सरसों का उत्पादन 30 प्रतिशत तक घट सकता है. सब्जी भी इस गर्मी के प्रकोप से बची नहीं रही. मिर्च, टमाटर, बैंगन और भिंडी जैसी सब्जी की फसलों में भी माहू का प्रकोप बढ़ गया है.  

मौसम के बदलते मिजाज से आम लोगों की रोजी रोटी के साधन, व्यवहार और स्वास्थ्य तीनों प्रभावित हो रहे हैं. वैसे तो देश के हर राज्य ने जलवायु परिवर्तन से निपटने की दस वर्षीय कार्य योजनाएं बना रखी हैं लेकिन फिलहाल उनके क्रियान्वयन का असर कहीं जमीन पर दिखता नहीं है.

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