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अभिव्यक्ति का शाश्वत माध्यम रहा है रंगमंच

By योगेश कुमार गोयल | Updated: March 27, 2026 07:18 IST

आज के डिजिटल युग में सिनेमा और वेब सीरीज के बावजूद रंगमंच अपनी पहचान बनाए हुए है. तकनीकी प्रगति और डिजिटल मनोरंजन के बढ़ते प्रभाव के बावजूद रंगमंच की प्रासंगिकता बनी हुई है.

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रंगमंच सदियों से मानव संस्कृति का अभिन्न अंग रहा है, जिसमें समय के साथ अनेक परिवर्तन हुए हैं. विभिन्न परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों के अनुसार रंगमंच का विकास हुआ, जो कई चरणों से गुजरते हुए विभिन्न रूपों में बंट गया. रंगमंच मनोरंजन का सबसे पुराना माध्यम है, जो समाज की भावनाओं, विचारों और संस्कृति को दर्शाता है. ‘रंगमंच’ शब्द ‘रंग’ और ‘मंच’ दो शब्दों से मिलकर बना है. ‘रंग’ शब्द इसलिए क्योंकि दृश्य को आकर्षक बनाने के लिए दीवारों, छतों और पर्दों पर तरह-तरह की चित्रकारी होती है और अभिनेताओं की वेशभूषा तथा साज-सज्जा में भी भिन्न-भिन्न रंगों का इस्तेमाल किया जाता है और ‘मंच’ शब्द इसलिए क्योंकि रंगमंच का तल दर्शकों की सुविधा के लिए फर्श से कुछ ऊंचा उठा होता है.

दर्शकों के बैठने के स्थान को रंगमंच और प्रेक्षागार सहित समूचे भवन को प्रेक्षागृह, रंगशाला या नाट्यशाला कहते हैं जबकि पश्चिमी देशों में इसे ‘थिएटर’ या ‘ऑपेरा’ नाम दिया गया. हर साल 27 मार्च को रंगमंच की कला को बढ़ावा देने और इस क्षेत्र से जुड़े कलाकारों, निर्देशकों, लेखकों और तकनीशियनों को सम्मान देने के लिए ‘विश्‍व रंगमंच दिवस’ मनाया जाता है, जिसकी शुरुआत 1961 में हुई थी. अंतर्राष्ट्रीय रंगमंच संस्थान (आईटीआई) ने यूनेस्को के सहयोग से 27 मार्च को विश्‍व रंगमंच दिवस के रूप में घोषित किया था, जिसे मनाने का मुख्य उद्देश्य रंगमंच कला के महत्व को समझाना, दुनिया भर में रंगमंच की महत्ता को बढ़ावा देना और नाट्य कला को संरक्षित करना है.

भारत में रंगमंच की परंपरा अत्यंत पुरानी और समृद्ध है, जो वेदों, पुराणों और संस्कृत नाटकों से लेकर आधुनिक नाट्य रूपों तक विस्तारित है. भारतीय रंगमंच की जड़ें धार्मिक अनुष्ठानों, लोकनाट्यों और शास्त्रीय नाटकों में गहरी जमी हुई हैं. भारत में रंगमंच की शुरुआत भरतमुनि के ‘नाट्यशास्त्र’ से मानी जाती है, जिसे संस्कृत नाटक का आधार और रंगमंच का पहला विस्तृत ग्रंथ माना जाता है, जिसमें अभिनय, नृत्य, संगीत, वेशभूषा, रंगमंचीय संरचना व नाट्यशैली के बारे में विस्तार से बताया गया है.

भारत में आधुनिक रंगमंच का विकास पारसी थिएटर, सामाजिक नाटक और राजनीतिक नाटकों के रूप में हुआ. मध्यकाल में लोकनाट्य परंपरा अधिक विकसित हुई. भक्ति आंदोलन के प्रभाव से भक्ति और धार्मिक नाटकों का उदय हुआ. उस दौरान भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अनेक लोकनाट्य शैलियां उभरीं, जैसे उत्तर भारत में रामलीला व नौटंकी, महाराष्ट्र में तमाशा, गुजरात व राजस्थान में भवाई, पश्चिम बंगाल में जात्रा, कर्नाटक में यक्षगान, आंध्र प्रदेश में वीर नाट्यम, केरल में कथकली, तमिलनाडु में तेरुक्कूत्तु आदि.  

आज रंगमंच न केवल मनोरंजन का साधन है बल्कि यह सामाजिक चेतना जगाने और सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने का माध्यम भी है. आज के डिजिटल युग में सिनेमा और वेब सीरीज के बावजूद रंगमंच अपनी पहचान बनाए हुए है. तकनीकी प्रगति और डिजिटल मनोरंजन के बढ़ते प्रभाव के बावजूद रंगमंच की प्रासंगिकता बनी हुई है. रंगमंच केवल अतीत की धरोहर नहीं बल्कि भविष्य की आवश्यकता भी है. यह कला, समाज और संस्कृति को जोड़ने का एक अनूठा साधन है. तकनीकी बदलावों के साथ तालमेल बिठाकर रंगमंच आने वाले समय में और प्रभावशाली रूप में उभर सकता है.

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