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तालिबान ने ‘आम माफी’ की घोषणा की, महिलाओं से सरकार में शामिल होने का आह्वान

By भाषा | Updated: August 17, 2021 18:35 IST

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काबुल, 17 अगस्त (एपी) तालिबान ने मंगलवार को पूरे अफगानिस्तान में ‘आम माफी’ की घोषणा की और महिलाओं से उसकी सरकार में शामिल होने का आह्वान किया। इसके साथ ही तालिबान ने लोगों की आशंका दूर करने की कोशिश है, जो एक दिन पहले उसके शासन से बचने के लिए काबुल छोड़कर भागने की कोशिश करते दिखे थे और जिसकी वजह से हवाई अड्डे पर अफरा-तफरी का माहौल पैदा होने के बाद कई लोग मारे गए थे। अफगानिस्तान पर कब्जा करने वाला और कई शहरों को बिना लड़ाई जीतने वाला तालिबान वर्ष 1990 के क्रूर शासन के उलट खुद को अधिक उदार दिखाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन कई अफगान अब भी आशंकित हैं। पुरानी पीढ़ी तालिबान की अति रूढ़िवादी सोच को याद कर रही है, जब 11 सितंबर 2001 को न्यूयॉर्क पर हमले के बाद अफगानिस्तान पर अमेरिकी कार्रवाई से पहले सजा के तौर पर पत्थर से मारने और सार्वजनिक तौर पर फांसी की सजा दी जाती थी। काबुल में उत्पीड़न या लड़ाई की बड़ी घटना अब तक दर्ज नहीं की गई है और तालिबान गश्त कर रहा है। तालिबान द्वारा जेलों पर कब्जा कर कैदियों को छुड़ाने एवं हथियारों को लूटने की घटना के बाद कई शहरी घरों में मौजूद हैं, लेकिन भयभीत हैं। कई महिलाओं ने आशंका जताई है कि अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण के दौरान महिलाओं को और अधिकार देने का पश्चिमी प्रयोग तालिबान के शासन में कायम नहीं रहेगा।जर्मनी ने इस बीच अफगानिस्तान के विकास के लिए दी जाने वाली मदद तालिबान के कब्जे के बाद रोक दी है। इस तरह की मदद अफगानिस्तान के लिए अहम है। माना जा रहा है कि तालिबान द्वारा अपनी नरम छवि पेश करने की एक वजह धन की निरंतर प्राप्ति सुनिश्चित करने का प्रयास हो सकती है। तालिबान के सांस्कृतिक आयोग के सदस्य इनामुल्ला समानगनी ने आम माफी का वादा किया है। यह पहली बार है जब तालिबान की ओर से संघीय स्तर पर शासन को लेकर टिप्पणी की गई है। समानगनी की टिप्पणी अस्पष्ट है। हालांकि, अब भी तालिबान पदच्युत की गई सरकार के नेताओं से बातचीत कर रहा है और अबतक सत्ता हस्तांतरण के किसी औपचारिक समझौते की घोषणा नहीं की गई है। समानगनी ने कहा, ‘‘ इस्लामिक अमीरात अफगानिस्तान ने पूरे सम्मान और ईमानदारी से पूरे अफगानिस्तान के लिए आम माफी की घोषणा की है, खासतौर पर उन लोगों के लिए जो विपक्ष में हैं या जिन्होंने वर्षों तक और हाल तक कब्जा करने वालों (अमेरिका) का साथ दिया था।’’ अन्य तालिबानी नेताओं ने कहा कि वे उन लोगों से बदला नहीं लेना चाहते हैं जो पूर्ववर्ती सरकार या विदेशों में कार्यरत थे। हालांकि, काबुल में कुछ लोगों ने आरोप लगाया कि तालिबान लड़ाकों ने उन लोगों की सूची बनाई है जो सरकार का सहयोग कर रहे थे और चाहते हैं कि वे सामने आएं। समानगनी ने 40 साल से अधिक समय से चल रहे अफगानिस्तान संकट में महिलाओं को ‘मुख्य रूप से पीड़ित’ करार दिया। उसने कहा, ‘‘ इस्लामिक अमीरात अफगानिस्तान महिलाओं को और पीड़ित नहीं बनाना चाहता।’’ समानगनी ने कहा, ‘‘ इस्लामिक अमीरात अफगानिस्तान महिलाओं को इस्लामी कानून और हमारे मूल्यों के तहत काम करने और पढ़ने का माहौल देने और विभिन्न ढांचों (सरकार के) में उपस्थिति को तैयार है।’’ यह बयान तालिबान की पिछली सरकार की नीति से हटने का संकेत माना जा रहा है जिसमें महिलाओं को घरों में सीमित कर दिया गया था। समानगनी ने हालांकि, यह नहीं बताया कि उनके लिए शरिया या इस्लामी कानून का क्या मतलब है। उन्होंने कहा कि ‘‘ सभी ओर के लोग’ सरकार में शामिल होंगे। तालिबान ने अपनी नयी छवि पेश करने की कोशिश की जिसके तहत निजी टीवी चैनल टोलो की महिला प्रोस्तोता ने तालिबान अधिकारी का मंगलवार को कैमरे के सामने साक्षात्कार लिया, जिसकी पहले कल्पना तक नहीं की जा सकती थी। वहीं , हिजाब पहनी महिलाओं ने काबुल में संक्षिप्त प्रदर्शन किया, इस दौरान उनके हाथों में तख्तियां थी जिसमें मांग की गई थी कि तालिबान महिलाओं को सार्वजनिक जीवन‘ से खत्म नहीं करे।’’ संयुक्त राष्ट्र में मानवाधिकार मामलों के उच्चायुक्त के प्रवक्ता रुपर्ट कोलविले ने तालिबान शासन की प्रतिबद्धता और भय को रेखांकित किया। उन्होंने कहा, ‘‘ ऐसे वादों का सम्मान किए जाने की जरूरत होगी और कुछ समय के लिए- पूर्व के इतिहास के मद्देनजर- इन घोषणाओं का आशंकाओं के साथ स्वागत किया गया है। गत दो दशक में मानवाधिकार के मोर्चे पर कई कठिन जीत हुई। सभी अफगानों के अधिकारों की रक्षा करनी होगी।’’जर्मनी ने अफगानिस्तान के विकास के लिए दी जाने वाली मदद स्थगित कर दी है। एक अनुमान के तहत जर्मनी इस साल मदद के रूप में अफगानिस्तान को 29.4 करोड़ डॉलर की सहायता देता। जर्मन संवाद एजेंसी डीपीए ने बताया कि अफगानिस्तान एक देश के तौर पर बर्लिन से सबसे अधिक विकास के लिए सहायता प्राप्त करता है। इसके अलावा सुरक्षा सेवा एवं मानवीय सहायता के रूप में अलग से मदद दी जाती है। स्वीडन के विकास सहायता मंत्री पेर ओल्लसन फ्रिड ने इस बीच डेगेन्स नइहतर नामक अखबार को दिए साक्षात्कार में कहा उनकी सरकार अफगानिस्तान को दी जाने वाली मदद की गति धीमी करेगी जबकि ब्रिटेन ने सहायता बढ़ाने की प्रतिबद्धता जताई है। ब्रिटिश विदेशमंत्री डोमिनिक राब ने कहा कि मानवीय सहायता 10 प्रतिशत तक बढ़ सकती है। उन्होंने कहा कि विकास और मानवीय कार्यों के लिए दी जाने वारी राशि को पुनर्गठित किया जाएगा और पूर्व में सुरक्षा के लिए निर्धारित कोई राशि तालिबान को नहीं मिलेगी। उन्होंने कहा कि तालिबान शासन कैसे करेगा इस शर्त पर सहायता नहीं होगी। अफगानिस्तान से निकलने के एकमात्र रास्ते काबुल हवाई अड्डे को मंगलवार को अमेरिकी सैनिकों की निगरानी में केवल सैन्य निकासी विमानों के लिए खोला गया। सोमवार को हजारों की संख्या में लोग देश छोड़ने के लिए हवाई अड्डे पर पहुंच गए थे जिसके बाद विमानों का परिचालन बंद कर दिया गया था, इस अफरा-तफरी में सात लोगों की मौत हुई थी। इस बीच, मंगलवार को नाटो के अफगानिस्तान में वरिष्ठ असैन्य प्रतिनिधि स्टीफेनो पोंटेकार्वो ने वीडियो पोस्ट किया है जिसमें दिख रहा है कि हवाई अड्डे की उड़ान पट्टी खाली है और अमेरिकी सैनिक तैनात हैं। तस्वीर में चेन से बनी सुरक्षा दीवार के पीछे सेना के मालवाहक विमान को देखा जा सकता है। उन्होंने ट्वीट किया, ‘‘रनवे खुल गया है। मैं विमानों को उड़ान भरते और उतरते देख रहा हूं।’’ फ्लाइट ट्रैकिंग डेटा के मुताबिक रात में अमेरिकी नौसेना कमान का केसी-130जे हरक्युलिस विमान काबुल हवाई अड्डे पर उतरा और इसके बाद कतर स्थित अमेरिकी ठिकाने अल उदेद के लिए रवाना हो गया। यह अमेरिकी सेना के मध्य कमान का मुख्यालय है। ब्रिटिश सेना का मालवाहक विमान दुबई से काबुल के लिए रवाना हुआ है। हालांकि, ऐसा लगता है कि अब भी स्थिति तनावपूर्ण है। अमेरिकी दूतावास काबुल हवाई अड्डे से काम कर रहा है। अमेरिका ने आह्वान किया है कि अमेरिकी देश छोड़ने के लिए ऑनलाइन पंजीकरण कराएं लेकिन बिना संपर्क किए हवाई अड्डे पर नहीं आए। वहीं, जर्मनी के विदेश मंत्रालय ने कहा कि पहला जर्मन सैन्य परिवहन विमान काबुल उतरा है लेकिन दोबारा उड़ान भरने से पहले वह केवल सात लोगों को ही विमान में सवार करा सका। मंत्रालय ने कहा, ‘‘ हवाई अड्डे पर अफरा-तफरी के माहौल और पिछली रात से रास्तों पर हो रही गोलीबारी की वजह से जर्मन सेना की सुरक्षा के बिना जर्मन नागरिकों और अन्य का हवाई अड्डे तक पहुंचना संभव नहीं था।

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