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लोहड़ी के लोक-गीत में छिपा है इसका इतिहास

By गुलनीत कौर | Updated: January 13, 2018 09:26 IST

एक डाकू की इस करामात के चलते मनाया जाता है लोहड़ी का जश्न।

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पंजाब और उत्तर भारत के कुछ राज्यों में लोहड़ी का त्यौहार बड़ी धूम धाम से मनाया जाता है। पंजाब में तो इसका अलग ही अंदाज देखने को मिलता है।रंग बिरंगे कपड़ों और फुल्कारियों में पंजाबी लड़कियां सजी होती हैं। पंजाबी लड़के भी कुरते पजामे और सुन्दर पगड़ियों में देखने को मिलते हैं। चारों ओर इसदिन जश्न का माहौल होता है।  लोहड़ी की शाम को बीच में आग जलाकर सभी आग के फेरे लेते हैं। आग में तिल, गुड़ डाला जाता है और यह प्रार्थना की जाती है कि इस जलती आग में उनके दुःख नष्ट भी जलकर नष्ट हो जाएं। लोहड़ी का ये त्यौहार खुशियों को दर्शाता है लेकिन क्या आप इस त्यौहार की कहानी जानते हैं? क्या जानते हैं कि लोहड़ी क्यों मनाते हैं? 

एक लोक प्रचलित कहानी के अनुसार सुंदरी और मुंदरी नाम की दो बहनें थीं। बचपन में ही पिता की मौत हो जाने के कारण ये दोनों अपने चाचा के पास आ गईं। लेकिन जालिम चाचा ने दोनों को एक जमींदार को बेचने की सोची। ये बात जैसे ही दुल्ला भट्टी नाम के डाकू को पता चली तो उसने चाचा के चंगुल से दोनों लड़कियों को छुड़ाया। दोनों को दुल्ला भट्टी ने अपने यहां शरण दी। उनका लालन पोषण किया। 

जब लड़कियां बड़ी हो गईं तो उसने दो अच्छे वर ढून्ढ कर उनकी शादी करने का सोचा। शादी बहुत जल्दी-जल्दी में की गई। दुल्ला भट्टी ने आग जलाई और उसी आग के आसपास फेरे लेते हुए दोनों लड़कियों की शादी कर दी गई। कहते हैं दूल्हा भट्टी के पास दोनों बहनों को देने के लिए कुछ नहीं था इसलिए उसने दोनों की झोली में गुड़ डाला और उन्हें विदा कर दिया। 

इसी कहानी को आधार मानते हुए आज लोहड़ी का त्यौहार बड़ी धूम धाम से मनाया जाता है। इसदिन पंजाब में पतंगबाजी करने का भी चलन है। लोहड़ी की शाम को भंगड़े और गिद्दे से खूब रौनक लगाई जाती है। लोहड़ी की कहानी पर एक गाना भी प्रचलित है:

सुंदर मुंदरिये होय ! तेरा कौन विचारा होय !दुल्ला भट्टी वाला होय ! दुल्ले धी व्याही होय !सेर शक्कर पाई होय ! कुड़ी दा लाल पटाका होय !कुड़ी दा सालू पाटा होय ! सालू कौन समेटे होय !चाचे चूरी कुटें होय ! जमींदारा लुट्टी होय !ज़मींदार सधाए होय ! बड़े भोले आये होय !एक भोला रह गया होय ! सिपाही पकड़ ले गया होय !सिपाही ने मरी ईट होय ! सानू दे दे लोहरी ते तेरी जीवे जोड़ी !भावें रो ते भावें पिट!”

टॅग्स :लोहड़ीमकर संक्रांति
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