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जानिए क्या है प्लाज्मा थेरेपी, कोरोना के इलाज में कितना है कारगर, जानें इससे जुड़ी सभी जानकारियां

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: April 26, 2020 17:14 IST

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कोरोना वायरस का अब तक कोई स्थायी इलाज नहीं है। हालांकि शोधकर्ता पूरी हिम्मत के साथ कोरोना का इलाज खोजने में जुटे हैं।   बिजनेस इनसाइडर की एक रिपोर्ट के अनुसार, इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) ने हाल ही में कोरोना वायरस के लिए प्लाज्मा ट्रीटमेंट (plasma treatment) के क्लिनिकल ट्रायल के लिए मंजूरी दी है। शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि इस थेरेपी से गंभीर रूप से बीमार रोगियों को ठीक करने में मदद मिलेगी। दिल्ली समेत देश के कई राज्यों में मरीज़ों पर प्लाज्मा का ट्रायल शुरू किया गया है। आपके मन में भी ये सवाल आया होगा कि आखिर ये प्लाज्मा थेरेपी है क्या है इसके जरिए कैसे मरीजों को ठीक किया जा सकता है, चलिए जानते हैं
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इन परीक्षण में कोविड-19 की चपेट से बाहर आए मरीजों के रक्त से प्लाज्मा निकालकर बीमार रोगियों को ठीक करने के लिए दिया जाता है। उन लोगों में पहले से ही एंटीबॉडी मौजूद हैं जो वायरस को दूर भगाते हैं। उनका उपयोग दूसरे रोगी के लिए भी किया जा सकता है। शोधों से पता चलता है कि यह संक्रमित की प्रतिरक्षा प्रणाली को बढ़ावा देने में मदद कर सकता है।
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उन्होंने बताया कि ठीक हुए मरीज और प्लाज्मा लेने के बीच कम से कम 28 दिनों का अंतराल होना चाहिए. हम ठीक हुए रोगियों की सूची बनाकरउनसे  संपर्क करेंगे और प्लाज्मा डोनेट करने के लिए उनकी काउंसलिंग करेंगे। फिर इकट्ठे हुए प्लाज्मा को विभिन्न क्लीनिकों में वितरित किया जा सकता है।
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ब्लड प्लाज्मा थेरेपी से कोरोना वायरस के मरीज 3 से 7 दिनों के भीतर सही हो जा रहे हैं। यह खुलासा त्रिवेंद्रम स्थित चित्रा तिरुनल इंस्टीट्यूट फॉर मेडिकल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी में प्रोफेसर हेड डॉक्टर देवाशीष गुप्ता ने किया है।  इंडियन एक्सप्रेसको दिए एक इंटरव्यू में बताया कि एक डोनर प्लाज्मा का इस्तेमाल करके दो से पांच मरीजों को ठीक किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि एक मरीज को ठीक करने के लिए लगभग 200-250 मिली प्लाज्मा की आवश्यकता होती है। अध्ययनों के आधार पर अमेरिका और चीन में देखा गया है इस थेरेपी से तीन या सात दिन में मरीज सही हो जाता है।
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डॉक्टर ने बताया कि जिन मरीजों को प्लाज्मा दिया जा सकता है उनके लिए भी दिशा-निर्देश हैं। सामान्य तौर पर वायरस से गंभीर रूप से प्रभावित और श्वसन संक्रमण से पीड़ित मरीजों को प्लाज्मा दिया जा सकता है।
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विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी इस थेरेपी को बेहतर माना है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार, प्लाज्मा थेरेपी का उपयोग एक 'बहुत ही मान्य' दृष्टिकोण है, लेकिन परिणाम को अधिकतम करने के लिए समय महत्वपूर्ण है। यह थेरेपी रेबीज और डिप्थीरिया जैसे इन्फेक्शन के खिलाफ प्रभावी साबित हुआ है।
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हालांकि प्लाज्मा ट्रीटमेंट का नकारात्मक पक्ष यह है कि यह थेरेपी महंगी और सीमित है। एक ठीक हुए मरीज से एक दान से उपचार की केवल दो खुराक मिल सकती है।
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अमेरिका और इंग्लैंड में इसे लेकर इसका परीक्षण शुरू हो चुका है, वहीं चीन दावा कर रहा है कि उसने इस प्लाज्मा थैरेपी से मरीजों को ठीक किया है। फरवरी के मध्य में चीन के 20 ऐसे नागरिकों ने अपने प्लाज्मा दान किए जो कोविड-19 से ठीक हो चुके थे। वुहान में उनके इन प्लाज्मा का उपयोग कई मरीजों पर किया गया, जिन्हें उपचार में मदद भी मिली। ये 20 लोग ऐसे डॉक्टर व नर्से थीं जो वायरस की चपेट में आई थीं।
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भारत में कोरोना वायरस से पीड़ित मरीजों के उपचार के लिए प्लाज्मा थेरेपी का इस्तेमाल शुरू हो चुका है। कुछ दिन पहले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजिवाल ने जानकारी दी थी कि एलएनजेपी में चार मरीजों पर प्लाज्मा थेरेपी का परीक्षण सफल रहा और उन्होंने ठीक हुए मरीजों से प्लाज्मा डोनेट करने की भी मांग की थी। इसके अलावा केरल और कर्नाटक सही कई राज्यों में इस थेरेपी का इस्तेमाल शुरू किया जा सकता है। 
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