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#KuchhPositiveKarteHain:'साइकिल दीदी' जिसने बिहार के इस एक समुदाय के लिए दे दिया अपना जीवन

By ऐश्वर्य अवस्थी | Updated: August 3, 2018 15:04 IST

गरीब और पिछड़ी जाति की महिलाओं के लिए विद्यालयों की चेन खड़ी करने वाली सुधा किसी पहचान की आज मोहताज नहीं है।

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बिहार के बच्चों की 'साइकिल दीदी' यानी 'नारी गुंजन' की अध्यक्ष पद्मश्री सुधा वर्गीज  को भला कौन नहीं जानता। दूसरों के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाली सुधा वर्गीज के बारे में जो भी कहा जाए वो शायद कम होगा। गरीब और पिछड़ी जाति की महिलाओं के लिए विद्यालयों की चेन खड़ी करने वाली सुधा किसी पहचान की आज मोहताज नहीं है। पिछले तीस वर्षों से भारत के बिहार  में वह वर्गीज दलितो के लिए काम कर रही है। सुधा की कहानी काफी प्रेरणादायक है, जिन्होनें पिछड़े वर्ग के उत्थान के लिए अपनी पूरी जिन्दगी समर्पित कर दी। बच्चे इन्हें प्यार से ‘साइकिल दीदी’ कहते हैं। दरअसल सुधा को प्रेम से साईकल दीदी बुलाया जाता है क्योंकि वह साईकल पर सफर करती है।

सुधा की शुरुआत

केरल में जन्मी सुधा 1965 में बिहार में आईं और फिर कभी वापस नहीं गईं। प्यार से साइकिल दीदी के नाम से मशहूर सुधा ने शुरूआत से ही मुसहार दलित समुदाय की सेवा कर रही हैं। सुधा का मुख्य लक्ष्य है इस समुदाय की जीवनी सुधारना और भेदभाव से इन्हें बचाना है। साल 1987 मे सुधा ने नारी गुंजन एनजीओ की शुरूआत बिहार से की। जिसके बाद उन्होंने 'नारी गुंजन' एनजीओ के जरिए एक टीम बनाई और तब से वह बिहार के इसी मुसहर समुदाय की महिलाओं को पिछले तीन दशक से शिक्षा प्रदान करने में जुटी हुई हैं। उनके सामाजिक और लोकतांत्रिक अधिकारों के बारे में भी उन्हें समझा-सिखा रही हैं।

महिलाओं के लिए कर रही हैं काम

इस संगठन ने मुसहार समुदाय की बच्चियों के लिए कई विद्यालय भी खोले हैं। सुधा वर्गीज मूलतः केरल की रहने वाली हैं। वह शुरू से ही मुसहर समुदाय के उद्धार में जुटी रही हैं। वह कहती हैं कि जब वह केरल से बिहार आई थीं, उस वक्त उन्हें जातीय भेदभाव के बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं था। जब मुसहर समुदाय की हालत को उन्होंने करीब से जाना-समझा तो तय किया कि अब वह आजीवन उनके साथ ही उनके गांवों में उनके मिट्टी के घरों में रहकर उनके अधिकारों के लिए संघर्ष करेंगी। ये संगठन हर तरह के लोगों की मदद अलग अलग रूपों में कर रहा है।

बढ़े कदम

देश सरकार की ओर से ‘आईकन ऑफ बिहार’ एवं मलयालम मनोरमा ग्रुप की ओर से भी सम्मानित एजुकेशन में स्नातक एवं एलएलबी सुधा वर्गीज ने 1980 के दशक में 'नारी गुंजन' एनजीओ का गठन किया था। 2005 में इनके एनजीओ ने दानापुर में 'प्रेरणा' नाम के विद्यालय की स्थापना की, जिसमें बच्चे रह भी सकते थे। इसके बाद सुधा वर्गीज ने कई और शिक्षण संस्थानों की स्थापना की। इन विद्यालयों में हजारों में छात्राएं पढ़ रही हैं।

इसके बाद उन्होंने'नारी गुंजन' की ओर से अपने कदम बढ़ाए और उनके लिए कोचिंग की भी व्यवस्थाएं हैं। नारी सशक्तीकरण को ध्यान में रखते हुए इन छात्राओं को नृत्य, कराटे, चित्रकला आदि के शारीरिक अभ्यास भी कराए जाते हैं। सुधा वर्गीज मुसहर और दलित समुदायों की सिर्फ लड़कियों ही नहीं, लड़कों को भी समाज की मुख्यधारा से जोड़े में जुटी हुई हैं। बिहार में इस समुदाय के लड़कों की 'नारी गुंजन' एक दर्जन से अधिक क्रिकेट टीम गठित कर चुका है। 'नारी गुंजन सरगम बैंड' देवदासी समुदाय की महिलाओं को बैंड बजाने में प्रशिक्षित कर रहा है। इस बैंड में केवल महिलाएं काम करती हैं।

एनजीओ नारी गुंजन महिलओं की पीरियड्स की समस्या के लिए भी काम करता है। वह कम दाम मे सेनेटरी नैपकिन भी महिलाओं को उपलब्ध करवाता है। पहले महिलाएं पीरियड्स मे राख और कपड़े या बोरे का इस्तेमाल करती थी जो उनकी सेहत के लिए हानिकारक था।

पुरस्कारों से सम्मानित

खुद बिहार शिक्षा दिवस के अवसर पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सुधा वर्गीज के योगदान के लिए मौलाना अबुल कलाम आजाद पुरस्कार से सम्मानित कर चुके हैं। आज पद्मश्री सुधा वर्गीज किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं।   उन्हें भारत सरकार से पद्मश्री अवार्ड मिला है, बिहार सरकार द्वारा उन्हें आईकन ऑफ बिहार का सम्मान दिया गया है। मसुहार समुदाय के हक के लडने के लिए सुधा को मालायाल मनोरम ग्रुप की ओर से भी सम्मानित किया जा चुका है।

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