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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, तो पत्नी आजीवन संपत्ति की पूर्ण रूप से मालकिन नहीं हो सकती, जानें मामला

By भाषा | Updated: February 2, 2022 14:33 IST

न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश की पीठ ने 1968 की एक वसीयत के एक मामले में यह आदेश पारित किया।

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ठळक मुद्देपीठ ने उच्च न्यायालय के आदेश को दरकिनार करते हुए यह फैसला सुनाया।तुलसी राम ने 15 अप्रैल 1968 को उक्त वसीयत लिखी थी।17 नवंबर 1969 को निधन हो गया था। 

नई दिल्लीः उच्चतम न्यायलय ने कहा कि अगर कोई हिंदू पुरुष, जो खुद से अर्जित की गई संपत्ति का मालिक है, यदि वह वसीयत में अपनी पत्नी को सीमित हिस्सेदारी देता है तो इसे संपत्ति पर पूर्ण अधिकार नहीं माना जाएगा, बशर्ते वह अपनी पत्नी की देखभाल और अन्य शर्तें पूरी करता हो।

न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश की पीठ ने 1968 की एक वसीयत के एक मामले में यह आदेश पारित किया। पीठ ने उच्च न्यायालय के आदेश को दरकिनार करते हुए यह फैसला सुनाया। हरियाणा के एक व्यक्ति तुलसी राम ने 15 अप्रैल 1968 को उक्त वसीयत लिखी थी, जिसका 17 नवंबर 1969 को निधन हो गया था। 

बिना पुष्टि के मृत्यु पूर्व दिये गए बयान के आधार पर हो सकती है दोषसिद्धि : न्यायालय

उच्चतम न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक फैसले को खारिज करते हुए कहा कि दोषसिद्धि बिना पुष्टि के केवल मृत्यु पूर्व दिये गए बयान के आधार पर हो सकती है। मामले में उच्च न्यायालय ने आग लगाकर एक महिला को मार डालने के आरोपी उसके ससुर और एक अन्य रिश्तेदार को बरी कर दिया था।

शीर्ष अदालत ने महिला के मृत्यु से पहले के बयान पर भरोसा करते हुए, जो एक मजिस्ट्रेट द्वारा दर्ज किया गया था, निचली अदालत के फैसले को सही ठहराया, जिसने दोनों आरोपियों को दोषी ठहराया था और आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। न्यायमूर्ति एम आर शाह और न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना की पीठ ने कहा कि मजिस्ट्रेट द्वारा दर्ज किये गये मृत्यु पूर्व बयान पर संदेह करने का कोई कारण नहीं है, जिसमें महिला ने विशेष रूप से कहा था कि आरोपियों ने पैसे की मांग को लेकर विवाद के कारण उसे आग लगा दी।

इसने कहा कि मजिस्ट्रेट द्वारा दर्ज किये गए मृत्यु पूर्व बयान पर भरोसा न करने के लिए उच्च न्यायालय द्वारा दिया गया तर्क उचित नहीं है और इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालय के मई 2020 के आदेश को चुनौती देने वाली उत्तर प्रदेश सरकार की एक अपील पर फैसला सुनाया।

पीठ ने कहा, "हमें 22 दिसंबर, 2011 को मजिस्ट्रेट द्वारा दर्ज किये गए मृत्यु से पहले के बयान पर संदेह करने का कोई कारण नहीं दिखता है, जिसमें महिला ने विशेष रूप से कहा था कि पैसे की मांग को लेकर विवाद के कारण आरोपियों ने मिट्टी का तेल छिड़ककर उसे आग लगा दी।"

न्यायालय ने कहा कि अगर अदालत संतुष्ट है कि मृत्यु से पहले दिया गया बयान सही और स्वैच्छिक है, तो वह बिना पुष्टि के उसे सजा का आधार बना सकती है। पुलिस के मुताबिक, घटना 20 दिसंबर 2011 को मथुरा जिले में हुई थी और इसके बाद नौ जनवरी 2012 को महिला की मौत हो गई थी।

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