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वशिष्ठ नारायण सिंह: नासा में अपोलो की लॉन्चिंग से ठीक पहले जब 31 कंप्यूटर बंद हो गये तो दुनिया ने देखा उनका कमाल

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: November 15, 2019 09:07 IST

तकरीबन 40 वर्ष से मानिसक बीमारी सिज़ोफ्रेनिया से पीडि़त वशिष्ठ नारायण सिंह ने पटना के एक अपार्टमेंट में गुमनामी का जीवन बिताया. लेकिन किताब, कॉपी और एक पेंसिल उनकी सबसे अच्छी दोस्त रही.

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ठळक मुद्देतकरीबन 40 वर्ष से मानिसक बीमारी सिज़ोफ्रेनिया से पीडि़त थे वशिष्ठ नारायण सिंह एक बच्चे की तरह किताब, कॉपी और एक पेंसिल उनकी सबसे अच्छी दोस्त रहीनासा में अपोलो की लॉन्चिंग से पहले अपने कैलकुलेशन से सभी को कर दिया था हैरान

वशिष्ठ नारायाण सिंह के निधन से देश ने एक महान गणितज्ञ खो दिया. हालांकि उनका अधिकतर जीवन गुमनामी में ही बीता. वशिष्ठ नारायण सिंह का जीवन काफी उतार-चढ़ाव से भरा रहा. नासा में काम करने से लेकर गुमनाम होने तक काफी दिलचस्प है. अंत समय तक साथ रहे उनके भाई अयोध्या सिंह बताते हैं कि अमेरीका से वो अपने साथ 10 बक्से किताबें लाए थे, जिन्हें वो पढ़ा करते थे. बाकी किसी छोटे बच्चे की तरह ही उनके लिए तीन-चार दिन में एक बार कॉपी, पेंसिल लानी पड़ती थी.

वशिष्ठ नारायण सिंह 40 वर्षों से सिज़ोफ्रेनिया से पीडि़त थे

तकरीबन 40 वर्ष से मानिसक बीमारी सिज़ोफ्रेनिया से पीडि़त वशिष्ठ नारायण सिंह ने पटना के एक अपार्टमेंट में गुमनामी का जीवन बिताया. लेकिन किताब, कॉपी और एक पेंसिल उनकी सबसे अच्छी दोस्त रही. वे दिनभर हाथ में पेंसिल लेकर यूं ही पूरे घर में चक्कर काटते, कभी अख़बार, कभी कॉपी, कभी दीवार, कभी घर की रेलिंग, जहां भी उनका मन करता, वहां कुछ लिखते, कुछ बुदबुदाते जाते. वे अपने जवानी में 'वैज्ञानिक जी' के नाम से मशहूर थे.

आइंस्टीन को दी थी चुनौती

वशिष्ठ नारायण सिंह ने आंइस्टीन के 'सापेक्ष सिद्धांत' को चुनौती दी थी. उनके बारे में मशहूर है कि नासा में अपोलो की लॉन्चिंग से पहले जब 31 कम्प्यूटर कुछ समय के लिए बंद हो गए तो कम्प्यूटर ठीक होने पर उनका और कम्प्यूटर्स का कैलकुलेशन एक था. पटना साइंस कॉलेज में बतौर छात्र गलत पढ़ाने पर वह अपने गणति के अध्यापक को टोक देते थे. कॉलेज के प्रिंसिपल को जब पता चला तो उनकी अलग से परीक्षा ली गई, जिसमें उन्होंने सारे अकादमिक रिकार्ड तोड़ दिए.

प्रतिभा की पहचान

पांच भाई-बहनों के परिवार में आर्थिक तंगी हमेशा डेरा जमाए रहती थी. लेकिन इससे उनकी प्रतिभा पर ग्रहण नहीं लगा. वशिष्ठ नारायण सिंह जब पटना साइंस कॉलेज में पढ़ते थे तभी कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जॉन कैली की नजर उन पर पड़ी. कैली ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और 1965 में वशिष्ठ नारायण अमेरिका चले गए. वर्ष 1969 में उन्होंने कैलिफोर्निया यूनिविर्सटी से पीएचडी की और वॉशिंगटन विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर बन गए. नासा में भी काम किया लेकिन मन नहीं लगा और भारत लौट आए.

बीमारी और सदमा

1973 में उनकी शादी वंदना रानी सिंह से हुई. घरवाले बताते हैं कि यही वह वक्त था जब वशिष्ठ जी के असामान्य व्यवहार के बारे में लोगों को पता चला. उनकी भाभी प्रभावती बताती हैं, 'छोटी-छोटी बातों पर बहुत ग़ुस्सा हो जाना, कमरा बंद करके दिन-दिन भर पढ़ते रहना, रात भर जागना उनके व्यवहार में शामिल था. वह कुछ दवाइयां भी खाते थे लेकिन वे किस बीमीरी की थीं, इस सवाल को टाल दिया करते थे.' इस असामान्य व्यवहार से वंदना भी जल्द परेशान हो गईं और तलाक ले लिया. यह वशिष्ठ नारायण के लिए बड़ा झटका था.

काम से भी थे परेशान

वशिष्ठ नारायण आईएसआई कोलकाता में अपने सहयोगियों के बर्ताव से भी परेशान थे. भाई अयोध्या सिंह कहते हैं, 'भैया (वशिष्ठ जी) बताते थे कि कई प्रोफेसर्स ने उनके शोध को अपने नाम से छपवा लिया और यह बात उनको बहुत परेशान करती थी.' वर्ष 1974 में उन्हें पहला दौरा पड़ा, जिसके बाद शुरू हुआ उनका इलाज. जब बात नहीं बनी तो 1976 में उन्हें रांची में भर्ती कराया गया. घरवालों के मुताबिक इलाज अगर ठीक से चलता तो उनके ठीक होने की संभावना थी. परिवार लेकिन गरीब था और सरकार की ओर से मदद नहीं मिली. 1987 में वशिष्ठ नारायण अपने गांव लौट आए. हालांकि 1989 में अचानक गायब हो गए. साल 1993 में वह बेहद दयनीय हालत में डोरीगंज, सारण में पाए गए.

रद्दी हो जाएगा सब

आर्मी से सेवानिवृत्त डॉ. वशिष्ठ के भाई अयोध्या सिंह बताते हैं, 'उस वक्त तत्कालीन रक्षा मंत्री के हस्तक्षेप के बाद मेरा बेंगलुरु तबादला किया गया जहां भैया का इलाज हुआ. लेकिन फिर मेरा तबादला कर दिया गया और इलाज नहीं हो सका.' वशिष्ठ का परिवार उनके इलाज को लेकर अब नाउम्मीद हो चुका था. घर में किताबों से भरे बक्से, दीवारों पर वशिष्ठ बाबू की लिखी हुई बातें, उनकी लिखी कॉपियां उनको डराती थीं. डर इस बात का था कि क्या वशिष्ठ बाबू के बाद ये सब रद्दी की तरह बिक जाएगा.

जैसी कि उनकी भाभी प्रभावती कहती भी हैं, 'देश में मिनिस्टर का कुत्ता बीमार पड़ जाए तो डॉक्टरों की लाइन लग जाती है. लेकिन अब हमें इनके इलाज की नहीं किताबों की चिंता है.'

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