लखनऊः उत्तर प्रदेश में यह नया साल शुरू होते ही सियासी सरगर्मी बढ़ गई है. इसकी कई वजहें हैं. इस साल राज्य में पंचायत चुनाव होना है. इसके अलावा इसी साल विधान परिषद की स्नातक एवं शिक्षक क्षेत्र की 11 सीटों और राज्यसभा की दस सीटों पर चुनाव होना है. इन तीन चुनावों के साथ ही जल्दी ही योगी सरकार के मंत्रिमंडल का दूसरा विस्तार होना है. इसके चलते भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के खेमें के नेता अभी से जोड़ तोड़ में जुट गए हैं. पार्टी के तमाम नेता अपना-अपना बायोडेटा लेकर लखनऊ से दिल्ली का सीनियर नेताओं को नए साल की बधाई देने के बहाने दौड़ लगा रहे हैं.
भाजपा विधायकों द्वारा की जा रही इस ज़ोर आजमाइश को देख अब ये कहा जा रहा है कि अगले साल राज्य में होने वाले विधानसभा चुनावों के पहले राज्यसभा चुनावों में भाजपा विधायकों की निष्ठा की परीक्षा होगी. जो विधायक इस परीक्षा में पास होगा उसका टिकट विधानसभा चुनाव में सुरक्षित होगा.
विधानसभा में सीटों का गणित
इस तरह की चर्चा बेवजह नहीं है. राज्य में यूपी कोटे की 10 सीटें 25 नवंबर को खाली हो रही हैं. इस दस सीटों में आठ सदस्य भाजपा के हैं. जबकि समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के पास एक-एक सीट है. राज्यसभा की रिक्त होने वाली दस सीटों के लिए अक्टूबर-नवंबर में चुनाव होंगे. यूपी विधानसभा की 403 सीटों में से अभी दो सीटें रिक्त हैं.
इस सीटों पर राज्यसभा चुनावों के पहले उपचुनाव होना है. विधानसभा की दो रिक्त सीटों पर होने वाले उप चुनावों में किस पार्टी की जीत होगी यह तो भविष्य के गर्त में हैं. लेकिन मौजूदा संख्या बल को आधार बनाया जाए तो राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए 37 विधायकों के वोट की जरूरत होगी. भाजपा और उसके सहयोगी दलों की मौजूदा संख्या 290 है.
सपा से नाता तोड़ने वाले तीन विधायक असंबद्ध है. इन्हे भाजपा के उम्मीदवार के पक्ष में वोट देने के चलते असंबद्ध किया गया है. ऐसे में यह तीनों विधायक भाजपा के पक्ष में ही वोट करेंगे. इसके अलावा रघुराज प्रताप सिंह की जनसत्ता दल के दो विधायकों के वोट भी भाजपा को मिलेंगे. बसपा का वोट भी बीते राज्यसभा चुनाव में भाजपा को मिला था,
इसलिए यह माना जा रहा है कि इस बार भी बसपा का वोट भाजपा के उम्मीदवार को मिलेगा. इस वोट गणित के हिसाब से भाजपा के आठ उम्मीदवार को चुनाव जीतने के लिए 296 वोटों की जरूरत होगी और उसके पास 295 वोट अभी हैं. यानी के वोट की कमी अभी भाजपा खेमे में है.
इसलिए यह कहा जा रहा है कि सीएम योगी को भाजपा और सहयोगी दलों के सभी विधायकों को वोट हासिल करने के लिए अपने राजनीतिक कौशल को दिखाना होगा. वही भाजपा विधायकों को अपनी निष्ठा की परीक्षा देनी होगी तभी पार्टी के आठ सदस्य राज्यसभा में पहुंचेने में सफल होंगे. पार्टी के जो नेता इस निष्ठा परीक्षा में खरे साबित नहीं होंगे, उन्हे विधानसभा के चुनाव लड़ने का मौका नहीं मिलेगा.
सपा इन्हे राज्यसभा भेजेगी
भाजपा नेताओं को जहां यह सभा करना होगा, वही सपा के दो सदस्य आसानी से राज्य सभा में पहुंचेंगे. इसकी वजह है सपा के पर्याप्त विधायकों का होना. सपा के पास 103 विधायक हैं. चूंकि एक सदस्य को चुनाव जीतने के लिए 37 वोट ही चाहिए इस लिए सपा के दो सदस्य आसानी से राज्यसभा में पहुंच जाएंगे.
बताया जा रहा है कि सपा मुखिया अखिलेश यादव प्रोफेसर राम गोपाल यादव और प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव आलोक रंजन को उम्मीदवार बनाएंगे. आलोक रंजन को बीते राज्यसभा चुनाव में सपा ने चुनाव मैदान में उतारा था, लेकिन पार्टी के पांच विधायकों द्वारा क्रॉस वोटिंग किए जाने के कारण वह चुनाव जीतने से रह गए थे.
लेकिन इस बार आसानी से सपा के यह दोनों उम्मीदवार आसानी से चुनाव जीत कर राज्यसभा पहुंच जाएंगे. भाजपा के आठ उम्मीदवार आसानी से चुनाव जीत कर राज्यसभा ना पहुंचे, इसके लिए अखिलेश यादव इस बार एक तीसरा उम्मीदवार भी मैदान में उतारेगे ताकि चुनाव में वोटिंग हो.
इस सदस्यों का खत्म हो रहा कार्यकाल
इस साल 25 नवंबर को भाजपा के बृजलाल, दिनेश शर्मा, गीता शाक्य, हरदीप पुरी, सीमा द्विवेदी, नीरज शेखर, अरुण सिंह, बीएल वर्मा और सपा के प्रोफेसर रामगोपाल और बसपा के रामजी गौतम का कार्यकाल खत्म हो रहा है. इनमें से सपा के प्रोफेसर रामगोपाल और भाजपा के हरदीप सिंह तथा अरुण सिंह को फिर से राज्यसभा भेजे जाने की चर्चा है. बाकी के भाजपा नेता राज्यसभा जाने के लिए अपनी जोड़ तोड़ करने में जुट गए हैं.