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अब NPR की जंग: महाराष्ट्र की नई तिकड़म एनपीआर को राज्य केवल टाल सकते हैं अनदेखा नहीं कर सकते

By हरीश गुप्ता | Updated: January 17, 2020 04:51 IST

आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, केंद्रशासित प्रदेशों पुड्डुचेरी और लद्दाख ने अपने इलाकों में एनपीआर के लिए कोई तारीख अधिसूचित नहीं की है. पंजाब का अलग रुख पंजाब ने सबसे अलग रुख अपनाते हुए कहा है कि राज्य विधानसभा में चर्चा के बाद ही वह एनपीआर के बारे में कोई फैसला लेगा. उल्लेखनीय है कि ओडिशा में एनपीआर की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है.

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ठळक मुद्देनागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) को लेकर बवाल अभी शांत भी नहीं हुआ एनपीआर को लेकर जंग छिड़ने के आसार बन गए हैं

नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) को लेकर बवाल अभी शांत भी नहीं हुआ कि अब केंद्र और राज्यों के बीच राष्ट्रीय जनसंख्या पंजी (एनपीआर) को लेकर जंग छिड़ने के आसार बन गए हैं. एनपीआर का काम 1 अप्रैल से शुरू होना है. तीन राज्यों की तिकड़़म महाराष्ट्र सहित तमिलनाडु और राजस्थान ने विरोध का नया तरीका इजाद करते हुए केंद्र से पूछा है कि क्या एनपीआर के आंकड़े उनके साथ साझा किए जाएंगे?

इन राज्यों के मुताबिक इससे उन्हें राज्य की कल्याणकारी योजनाओं का लाभ 'असली' जरुरतमंदों तक पहुंचाने में मदद मिलेगी. केंद्र के सकारात्मक जवाब नहीं देने से वह आराम से चुप्पी साधकर बैठ गए हैं. बंगाल-केरल का विरोध प. बंगाल और केरल ने आधिकारिक तौर पर मुखर विरोध करते हुए केंद्र से एनपीआर को रोक देने को कहा है.

आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, केंद्रशासित प्रदेशों पुड्डुचेरी और लद्दाख ने अपने इलाकों में एनपीआर के लिए कोई तारीख अधिसूचित नहीं की है. पंजाब का अलग रुख पंजाब ने सबसे अलग रुख अपनाते हुए कहा है कि राज्य विधानसभा में चर्चा के बाद ही वह एनपीआर के बारे में कोई फैसला लेगा. उल्लेखनीय है कि ओडिशा में एनपीआर की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है.

राज्य सरकार ने एनपीआर के लिए जरुरी तमाम मापदंडों को हरी झंडी दे दी है. केंद्र जल्दी में नहीं केंद्र सरकार को भी राज्यों पर दबाव बनाने की कोई जल्दी नहीं है, क्योंकि वह पिछली जुलाई में ही एनपीआर के क्रियान्वयन की अधिसूचना जारी कर चुकी है. संप्रग सरकार ने आधार लांच किए जाने के कारण 2010 में यह काम रोक दिया था, जिसे राजग सरकार ने 2015 में दोबारा शुरू किया था.

सूची तैयार राजग सरकार ने आधार, मतदाता पहचान पत्र, राशन कार्ड और अन्य जानकारियों के आधार पर 2015-16 में 119 करोड़ सामान्य नागरिकों की सूची तैयार की थी. इस बात को लेकर विवाद हो सकता है कि पूरी जानकारी देना अनिवार्य है या नहीं. एनपीआर मैन्युअल 2020-21 में साफ उल्लेख है कि यह कवायद समयबद्ध है और इसका जानबूझकर विरोध करने वालों को मुकदमे का सामना करना पड़ सकता है. हालांकि इस मामले राज्य सरकारों की घबराहट देरी का सबब बन सकती है.

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