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ईरान के सुप्रीम लीडर रहे खामेनेई का यूपी के कितूर गांव से रहा है नाता, उनकी मौत के बाद यूपी में हाई अलर्ट

By राजेंद्र कुमार | Updated: March 1, 2026 18:25 IST

खामेनेई के निधन की सूचना के बाद से बाराबंकी जिले में सिरौलीगौसपुर के किंतूर गांव में गम और गुस्सा है. अयातुल्ला अली खामेनेई का बाराबंकी के किंतूर गांव से नाता रहा है. किंतूर गांव लखनऊ से करीब 70 किलोमीटर दूरी पर बसा है. 

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लखनऊ: इस्राइल के हमले में ईरान के सर्वोच्च लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद उत्तर प्रदेश में हाई अलर्ट लागू कर दिया गया है. ईरान और खाड़ी देशों पर हमले और युद्ध के हालात के मद्देनजर सभी जिलों को अतिरिक्त सतर्कता बरतने का निर्देश दिए गए हैं. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने रविवार सुबह मीटिंग में विशेष एहतियात बरतने को कहा है। इसके बाद सभी जिलों को दोबारा आगाह किया गया है. 

लखनऊ समेत कई जिलों में हो रहे प्रदर्शन पर भी पुलिस के पैनी नजर है. ईरान के सुप्रीम लीडर की मौत की सूचना मिलने के बाद आल इंडिया शिया पर्सनल ला बोर्ड की ओर से तीन दिनों के शोक के ऐलान के किया गया है. शिया धर्म गुरु मौलाना यासूब अब्बास ने भी कहा कि खामेनेई की हत्या के विरोध में हम सभी तीन दिनों तक काले कपड़े पहनें. वही खामेनेई के निधन की सूचना के बाद से बाराबंकी जिले में सिरौलीगौसपुर के किंतूर गांव में गम और गुस्सा है. अयातुल्ला अली खामेनेई का बाराबंकी के किंतूर गांव से नाता रहा है. किंतूर गांव लखनऊ से करीब 70 किलोमीटर दूरी पर बसा है. 

किंतूर गांव में लोग मना रहे शोक : 

किंतूर गांव के रहने वाले लोगों का कहना है कि ईरान में वर्ष 1979 के दौरान हुई इस्लामिक क्रांति के नेता रुहोल्लाह अयातुल्ला खामेनेई के पूर्वजों का संबंध इसी गांव से रहा है. खुमैनी का खानदान वर्षों पहले यहां से ईरान गए थे, लेकिन उनकी जड़ें आज भी अवधी की इस माटी से जुड़ी मानी जाती हैं. 

खामेनेई परिवार के जानकार सैयद निहाल अहमद काजमी के अनुसार, 17वीं और 18वीं सदी में ईरान में हुए सत्ता संघर्ष के कारण ईरान के शिया विद्वान वहां से भागकर भारत आ गए. भारत में लखनऊ, बाराबंकी और हैदराबाद जैसे शहरों में तब शिया नवाबों का बड़ा प्रभाव था. बाराबंकी का किंटूर गांव उस दौर में शिया विद्वानों का केंद्र हुआ करता था. 

ईरान से भागे शिया विद्वान लखनऊ, बाराबंकी और हैदराबाद में रहने लगे. कहा जाता है कि खामेनेई के परदादा सैयद अहमद मुसावी 19वीं सदी की शुरुआत में किंटूर गांव में ही पैदा हुए थे. 1834 में सैयद मुसावी धार्मिक यात्रा के लिए इराक गए और वहां से ईरान पहुंचे. वहां उन्होंने 3 निकाह किए. तीन बेगमों से उनके 5 औलादें हुईं और खामेनेई का खानदान आगे बढ़ा. 

ईरान में सैयद मुसावी खुमैनी शहर में जाकर बस गए. इसी शहर के नाम पर आगे चलकर परिवार को ‘खुमैनी’ कहा जाने लगा. सैयद निहाल अहमद के मुताबिक खामेनेई का परिवार मूल रूप से ईरानी है लेकिन भारत की पहचान को पूरे परिवार ने बड़े गर्व से अपनाया है. यही कारण है कि खामेनेई पर भारतीय होने का तंज आज भी कसा जाता है. 

बहरहाल, किंटूर गांव में आज भी खामेनेई के रिश्तेदार रहते हैं. यहीं वजह है कि किंतूर गांव अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत को लेकर लोग गमजदा हैं. किंतूर गांव में कभी ‘खुमैनी’ या ‘मुसवी’ खानदान के करीब 550 घर हुआ करते थे, जिन्हें ‘सैयदवाड़ा’ के नाम से जाना जाता था. समय के साथ अधिकांश परिवार अन्य स्थानों पर बस गए और अब यहां पांच से सात घर ही बचे हैं. आज भी इस वंश का नाम किंतूर गांव में सम्मान के साथ लिया जाता है. 

गांव के लोगों का कहना है कि लखनऊ में करामत हुसैन मुस्लिम गर्ल्स डिग्री कालेज की स्थापना में भी इस परिवार की भूमिका रही है. किंतूर में रहने वाले आदिल काजमी का कहना है कि  बताया कि अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत की सूचना मिलने पर गांव के लोग गमजदा हो गए. गांव में रह रहे लोग ईरान के सुप्रीम लीडर की मौत का गमजदा होकर शोक मना रहे हैं. 

टॅग्स :अयातुल्ला अली खामेनेईउत्तर प्रदेश समाचारईरान
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