यूपी में मदरसों की पढ़ाई से दूर हो रहा मुस्लिम समाज, बीते दस वर्षों से मदरसा बोर्ड की परीक्षाओं में घटे विद्यार्थी
By राजेंद्र कुमार | Updated: January 10, 2026 18:24 IST2026-01-10T18:24:53+5:302026-01-10T18:24:53+5:30
उप्र मदरसा शिक्षा परिषद के अधिकारियों के अनुसार, प्रदेश के मदरसों में पढ़ने वाले छात्रों की संख्या में पिछले कुछ वर्षों में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है. जिसके चलते मदरसा बोर्ड की परीक्षाओं (मुंशी-मौलवी, आलिम आदि) में बैठने वाले परीक्षार्थियों की संख्या में हर वर्ष कमी होती जा रही है.

यूपी में मदरसों की पढ़ाई से दूर हो रहा मुस्लिम समाज, बीते दस वर्षों से मदरसा बोर्ड की परीक्षाओं में घटे विद्यार्थी
लखनऊ: उत्तर प्रदेश में मुस्लिम समाज का मदरसों की पढ़ाई से मोह भंग हो रहा है. इस वजह से राज्य में मदरसों में पढ़ने वाले बच्चों (छात्रों) की संख्या कम हो रही है. वही दूसरी तरफ मदरसे भी बंद हो हो रहे हैं. उप्र मदरसा शिक्षा परिषद के अधिकारियों के अनुसार, प्रदेश के मदरसों में पढ़ने वाले छात्रों की संख्या में पिछले कुछ वर्षों में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है. जिसके चलते मदरसा बोर्ड की परीक्षाओं (मुंशी-मौलवी, आलिम आदि) में बैठने वाले परीक्षार्थियों की संख्या में हर वर्ष कमी होती जा रही है.
दस वर्ष पहले जहां इन परीक्षाओं में चार लाख से अधिक विद्यार्थी शामिल होते थे, यह संख्या घटकर अब 80 हजार के करीब पहुंच गई है. यानी दस वर्षों में मदरसों से पढ़ कर मुंशी-मौलवी, आलिम आदि की परीक्षाओं में शामिल होने वाले विद्यार्थियों की संख्या में 80% की कमी हो गई है. यह सिलसिला जारी रहा तो धीरे-धीरे लोग मदरसों में अपने बच्चों को पढ़ाने नहीं भेजेंगे. इस तरह की चर्चा अब मुस्लिम समाज में होने लगी है.
यूपी में मदरसों की संख्या
उत्तर प्रदेश में ऐसी चर्चा तब हो रही है, जबकि राज्य में 13,329 मान्यता प्राप्त मदरसे और 560 अनुदानित मदरसे हैं. मान्यता प्राप्त मदरसे में पढ़ने वाले छात्रों की संख्या 12,35,400 लाख लाख है. इन मदरसों में 9,979 प्राथमिक व उच्च प्राथमिक स्तर (कक्षा 1 से 8) और 3,350 माध्यमिक व उच्चतर माध्यमिक स्तर (कक्षा 9 से 12) के हैं. जबकि 560 अनुदानित मदरसों में 2,31,806 छात्र पंजीकृत हैं. इन मदरसों में शिक्षकों की नियुक्ति मदरसा प्रबंधन स्वयं करता है.
अनुदानित मदरसों में कार्यरत शिक्षकों और शिक्षणेत्तर कर्मचारियों की कुल संख्या क्रमशः 9889 और 8367 है. कुल मिलकर मुस्लिम छात्र और छात्राओं की पढ़ाई की इस व्यवस्था से मुस्लिम समाज दूरी बनाने लगा है. अब मुस्लिम समाज भी अपने बेटे और बेटी को शहर के बेहतर अंग्रेजी स्कूल पढ़ाने में रुचि लेने लगा है. इस कारण से मदरसों में छात्रों की संख्या कम होती जा रही है. और अब तो मदरसा बोर्ड की परीक्षाओं में मदरसों से पढ़े विद्यार्थियों की संख्या हर वर्ष कम होती जा रही है.
हर वर्ष घटी संख्या
उप्र मदरसा शिक्षा परिषद के रिकॉर्ड के मुताबिक, वर्ष 2016 में मदरसा बोर्ड की परीक्षाओं में 4,22,667 विद्यार्थी शामिल हुए थे. वर्ष 2017 में यह संख्या घटकर 3,71,052 हो गई. फिर वर्ष 2018 में इसमें करीब एक लाख छात्रों की कमी दर्ज की गई और यह संख्या 2,70,755 रह गई. वर्ष 2019 में यह संख्या 2,06,337 और वर्ष 2020 में यह 1,82,259 रह गई. वर्ष 2021 में छात्रों की संख्या में कोई विशेष फर्क नहीं दिखा, लेकिन, वर्ष 2022 में यह संख्या 1,63,999 हुई और 2025 में यह संख्या घट कर 88,082 हजार में सिमट गई.
मदरसा शिक्षा परिषद के अधिकारियों के अनुसार जालौन जिले के अनुदानित मदरसों में सिर्फ एक छात्र की ओर से वर्ष 2025 में परीक्षा के लिए आवेदन किया गया था. जबकि,अलीगढ़ से छह, एटा, बागपत और इटावा से आठ-आठ छात्रों में आवेदन किया गया. सबसे ज्यादा 644 छात्रों ने प्रयागराज से आवेदन किया था और दूसरे नंबर पर 636 आवेदनों के साथ मऊ और 497 छात्रों के साथ आजमगढ़ के मदरसे तीसरे नंबर पर रहा था. सिद्धार्थनगर से 478 और लखनऊ से 477 छात्रों ने 2025 में परीक्षाओं के लिए आवेदन किया था.
आखिर इसकी वजह क्या है ? इस बारे में नाम ना छापने की शर्त पर परिषद के बड़े अधिकारियों का कहना है कि प्रदेश सरकार ने मदरसों और मदरसों की डिग्री पर तमाम तरह पाबंदी लगाई है. इसके अलावा राज्य में मदरसों पर आए दिन पुलिस जांच आदि करने पहुंच जाती है. शिक्षकों की तैनाती को लेकर भी मदरसों के संचालकों से सरकार ही पूछताछ बढ़ी है. ऐसी ही तमाम वजहों के चलते मुस्लिम समाज की अपने बच्चों को मदरसों में पढ़ाने की रुचि घटी है.
इस कारण से अब मदरसा बोर्ड की परीक्षाओं में अब मदरसों से पढ़े छात्र घटते जा रहे हैं. देर सवेर इसका असर राज्य में चल रहे मदरसों पर पड़ेगा. वहां पढ़ने वाले बच्चे नहीं आएंगे और उन्हे पढ़ाने वाले शिक्षक भी नहीं मिलेंगे. इसका खामियाजा गरीब मुस्लिम परिवार के बच्चों को भुगतना पड़ेगा क्योंकि मुस्लिम समाज के सक्षम लोग तो अपने बच्चों को अच्छे अंग्रेजी स्कूलों पढ़ा लेंगे लेकिन गरीब मुस्लिम बच्चे यह संभव नहीं होगा और उन्हे मदरसों में आना पढ़ेगा, जहां पढ़ाने वाले शिक्षक कम होंगे.