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रैली में भीड़ जुटाने के लिए नेताओं को इस गांव में मिलते हैं लोग, जरूरत के मुताबिक अलग-अलग पैकेज भी उपलब्ध

By भाषा | Updated: May 9, 2019 09:33 IST

कुरुक्षेत्र लोकसभा क्षेत्रः ग्राहकों के लिए जरूरत के मुताबिक अलग-अलग पैकेज भी उपलब्ध हैं. कुल मिलाकर कहें तो चुनावी मौसम में नए तरह के व्यवसाय का जन्म हुआ है. पंजाब में सिख और हरियाणा के लिए जाट स्थानीय टैक्सी ऑपरेटर बिन्नी सिंघला ने कहा कि अगर पंजाब में कोई रैली होती है तो वे सिखों की व्यवस्था करते हैं.

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क्या आप राजनीतिक रैली कराने वाले हैं? क्या आपको भीड़ चाहिए? किस तरह का पैकेज चाहिए? कितने लोग चाहिए? किस जाति के चाहिए? पंजाब-हरियाणा सीमा पर स्थित गुल्हा चीका गांव में टैक्सी स्टैंड पर जाने वाले किसी भी व्यक्ति का सबसे पहले इन्हीं कुछ सवालों से सामना होता है. कुरुक्षेत्र लोकसभा क्षेत्र में इस टैक्सी स्टैंड पर कैब ऑपरेटरों ने कैब चलाना रोक दिया है. अभी वह रैलियों के लिए वाहनों और भीड़ की आपूर्ति कर रहे हैं.ग्राहकों के लिए जरूरत के मुताबिक अलग-अलग पैकेज भी उपलब्ध हैं. कुल मिलाकर कहें तो चुनावी मौसम में नए तरह के व्यवसाय का जन्म हुआ है. पंजाब में सिख और हरियाणा के लिए जाट स्थानीय टैक्सी ऑपरेटर बिन्नी सिंघला ने कहा कि अगर पंजाब में कोई रैली होती है तो वे सिखों की व्यवस्था करते हैं.हरियाणा में रैली हो तो जाटों की डिमांड होती है. हमारे पास अपनी कारें भी हैं और जरूरत के मुताबिक कमीशन पर भी लेते हैं. सिंघला के मुताबिक पंजाब और हरियाणा में रैली के लिए आम तौर पर 150-500 लोगों की मांग आती है. उन्होंने कहा कि हमने राजस्थान में दो रैलियों के लिए भी पैकेज भेजे हैं. हालाकि दूर के राज्यों तक हमारी अभी उतनी पहुंच नहीं है. पांच सीटों वाली एक कार 2500 रुपए में, सवारियों सहित इसकी कीमत 4500 रुपए पड़ती है.अलग तरह की भीड़ की जरूरत हो तो 6000 रुपए तक लिए जाते हैं. प्रति व्यक्ति 300 रुपए एक अन्य टैक्सी ऑपरेटर राकेश कपूर ने कहा कि हम रैलियों में जाने वाले लोगों को 300-300 रुपए देते हैं. रैली अगर शाम में हो तो लोगों को पार्टी उनके खाने-पीने आदि की व्यवस्था करती है. अगर वे इंतजाम नहीं कर पाते हैं तो हम अतिरिक्त शुल्क लेते हैं.राजनीतिक दल सीधे तौर पर कभी संपर्क नहीं करते हैं बल्कि कार्यकर्ता उनके पास आते हैं. यह पूछे जाने पर कि भीड़ में किस तरह के लोग होते हैं, उन्होंने कहा कि खेतों, दुकानों में काम करने वाले होते हैं. कॉलेज में जाने वाले लड़के, घूंघट वाली महिलाएं भी होती हैं. भीड़ जुटाना आसान नहीं एक अन्य टैक्सी ऑपरेटर मनजिंदर सिंह ने कहा कि 2014 के लोकसभा चुनाव के पहले इस तरह के कारोबार ने गति पकड़ी थी.उन्होंने कहा कि पहले भीड़ जुटाना आसान था लेकिन अब चीजें बदल गई हैं. रैलियों में जाने वाले लोग पूछते हैं कि कार में एसी है कि नहीं, खाने में क्या मिलेगा. अब लोग इतनी आसानी से नहीं मानते. अगर वे एक दिन बिताते हैं तो बदले में वे कुछ चाहते भी हैं.

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