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प्रतिष्ठित विद्वान, लेखक और साहित्यकार मुंबई में दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन में आयोजित भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में हिंदी, मराठी, संस्कृत और गुजराती साहित्य के योगदान विषय पर चर्चा के लिये जुटे

By अनुभा जैन | Updated: January 24, 2023 10:14 IST

सम्मेलन का आयोजन एसएनडीटी महिला विश्वविद्यालय, मुंबई के नव स्थापित भारतीय ज्ञान, संस्कृत और योग केंद्र द्वारा उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ और हिंदुस्तानी प्रचार सभा, मुंबई के सहयोग से किया गया था। 

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मुंबई: “हिंदी पत्रिकाओं और हिंदी समाचार पत्रों जैसे अमृत बाजार पत्रिका, महात्मा गांधी के नवजीवन और हरिजन पत्रिका, हिंदुस्तान दैनिक, आदि ने स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन और स्वतंत्रता-पूर्व युग के दौरान ब्रिटिश राज के खिलाफ प्रभावी हथियार के रूप में काम करने, ब्रिटिश राज की अन्यायपूर्ण नीतियों की आलोचना करने; ब्रिटिश सरकार, और समाज में सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन लाने; लोगों के बीच राष्ट्रवादी विचारधारा और राष्ट्रीय चेतना, स्वतंत्रता, समानता और देशभक्ति के विचारों का प्रसार करने का महत्वपूर्ण कार्य किया। 

यह बात पत्रकार लेखिका अनुभा जैन ने “भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में हिंदी, मराठी, संस्कृत और गुजराती साहित्य के योगदान” जैसे महत्वपूर्ण विषय पर मुंबई में हिंदुस्तानी प्रचार सभा में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन में एक सत्र के दौरान कही। सम्मेलन का आयोजन एसएनडीटी महिला विश्वविद्यालय, मुंबई के नव स्थापित भारतीय ज्ञान, संस्कृत और योग केंद्र द्वारा उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ और हिंदुस्तानी प्रचार सभा, मुंबई के सहयोग से किया गया था। 

राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्घाटन मध्य प्रदेश के साहित्यकार मनोज कुमार श्रीवास्तव और एसएनडीटी महिला विश्वविद्यालय की कुलपति डॉ. उज्ज्वला चक्रदेव ने की। मनोज श्रीवास्तव ने स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी उन हिंदी, मराठी, गुजराती और संस्कृत रचनाओं और कृतियों के बारे में बात की, जिनके लेखकों को अंग्रेजों ने फांसी या कैद दी थी। 

उन्होंने कहा कि उस समय का साहित्य जन आंदोलनों को उकसाने में सफल रहा, जिसके फलस्वरूप देश को 1947 में आजादी मिली। एसएनडीटी महिला विश्वविद्यालय की कुलपति डॉ. उज्ज्वला चक्रदेव ने अपने उद्बोधन में कहा कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में भारतीय साहित्य का बहुत बड़ा योगदान है। आज जरूरत है कि हम उस साहित्य को पहचानें और उसे जन-जन तक पहुंचाएं।

 उन्होंने आगे कहा कि संस्कृत स्त्री पराशक्ति एसएनडीटी महिला विश्वविद्यालय का आदर्श वाक्य है। एक प्रबुद्ध महिला समाज में अद्भुत बदलाव ला सकती है। उसके साथ, वह दुनिया और समाज को सशक्त बना सकती है। पत्रकार अनुभा जैन ने आगे कहा कि विश्व स्तर पर तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा हिंदी है। लेकिन साथ ही, अंग्रेजी भाषा के प्रति लोकप्रियता और लोगों के लगाव ने हमें हिंदी को सामान्य से अधिक प्रचार करने के लिए मजबूर कर दिया है।

उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के निदेशक श्री. आरपी सिंह; हिन्दुस्तानी प्रचार सभा के निदेशक संजीव निगम; दिल्ली से आये इतिहासकार और उपन्यासकार राजगोपाल सिंह वर्मा और दिल्ली के कवि, कहानीकार भारतेंदु मिश्रा ने सम्मेलन में आयोजित विभिन्न सत्रों में अपने विचार साझा किए। सम्मेलन के उद्घाटन सत्र के दौरान भारतीय ज्ञान केंद्र का एक ब्रोशर भी जारी किया गया।

ज्ञातव्य रहे कि इस संगोष्ठी में देश के विभिन्न भागों के प्रतिष्ठित विद्वानों, लेखकों, साहित्यकारों, शिक्षकों, छात्रों और पत्रकारों ने भाग लिया और स्वतंत्रता आंदोलन से संबंधित हिंदी, मराठी, गुजराती और संस्कृत साहित्य के विभिन्न पहलुओं पर गहराई से चर्चा की। भारतीय ज्ञान, संस्कृत और योग केंद्र के मानद निदेशक और संगोष्ठी के संयोजक डॉ. जितेंद्र कुमार तिवारी ने इस आयोजन के लिए उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान और हिंदुस्तानी प्रचार सभा का धन्यवाद किया।

कार्यक्रम का संचालन मणिबेन नानावती महिला विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यक्ष डॉ. रवींद्र कात्यायन ने किया। अवसर पर डा.उज्जवला ने पत्रकार अनुभा जैन को एसएनडीटी महिला विश्वविद्यालय के संस्थापक दोंडो केशव कार्वे की लुकिंग बैक ऑटोबायोग्राफी पुस्तक भी भेंट की।

इस अवसर पर भारतीय ज्ञान केंद्र की संयोजक डॉ. वत्सला शुक्ला द्वारा तैयार भारतीय ज्ञान केंद्र का पत्रक (ब्रोशर)  का विमोचन कुलगुरु तथा अतिथियों ने किया।

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