पटनाः बिहार में सूख चुकी और विलुप्त हो रही करीब पांच दर्जन से अधिक छोटी नदियों को पुनर्जीवित करने के लिए राज्य सरकार ₹700 करोड़ की व्यापक कार्ययोजना पर काम कर रही है। इसमें गाद की सफाई, अतिक्रमण हटाना, शहरी कचरा रोकना और नदियों को आपस में जोड़ना (कोसी-मेची) शामिल है, ताकि पटना, वैशाली, समस्तीपुर सहित अन्य जिलों की नदियों में जलधारा लौट सके। राज्य के जल संसाधन मंत्री विजय कुमार चौधरी ने कहा कि पूरे प्रदेश में नदियों के संकट को बचाने के प्रयास में जुट गई है। सरकार नदियों को संरक्षित करने का काम करेगी।
उन्होंने बताया कि छोटी नदियों को पुनर्जीवित करने के लिए विशेष सर्वेक्षण और योजनाएं तैयार की जा रही हैं। इसके तहत नदियों के तल से गाद निकालकर उनकी जल धारण क्षमता बढ़ाई जाएगी, ताकि वे फिर से जीवित हो सकें। नदियों के बहाव क्षेत्र से अवैध अतिक्रमण को हटाना प्राथमिकता है।
विजय चौधरी ने कहा कि शहरों के नालों के गंदे पानी को सीधे नदियों में गिरने से रोकने के लिए सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) लगाए जा रहे हैं। कोसी-मेची इंटरलिंकिंग जैसी परियोजनाओं के जरिए पानी की कमी वाली नदियों को पानी मिलेगा। उन्होंने कहा कि नदियों की समस्याओं की पहचान कर उसके लिए अलग-अलग कार्ययोजना बनेगी।
नदियों को बचाना बेहद आवश्यक है। यह सभ्यता और संस्कृति से जुड़ी भौतिक व सांस्कृतिक विरासत है। यही नहीं, नदियां किसी इलाके के सामाजिक-आर्थिक जीवन का आधार होती है। विजय चौधरी ने कहा कि नदियों को बचाना जल संसाधन विभाग की प्राथमिकता है। नदियों को बचाने में कई तरह की चुनौतियां हैं, क्योंकि यह कई कारणों से मृतप्राय होती जा रही हैं।
इसके उद्गम स्थल से लेकर अंतिम बहाव तक की दूरी में जो पारिस्थितिकी संतुलन का अवयव है, वह सबसे महत्वपूर्ण है। किसी भी नदी में जल की उपलब्धता मूल रूप से बारिश पर निर्भर होती है। जो स्वयं अनेक कारणों से प्रभावित हो रही है। नदियों में पानी आने के जल स्रोत संकट में हैं। इसके अलावा गाद की समस्या गंभीर होती जा रही है।
लगातार व नियमित गाद की उड़ाही की व्यवस्था नहीं होने के कारण नदियों का तल ऊपर उठ रहा है। इससे जल संचयन की क्षमता लगातार घट रही है। इस संबंध में जल संसाधन विभाग ने नवाचारी कार्यक्रम के तहत कई नई योजनाओं पर काम किया है। उन्होंने कहा कि जब तक गाद के व्यापक व सकारात्मक उपयोग की व्यवस्था नहीं होगी, तब तक इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता है।
अभी हम लोग इसके पायलट प्रोजेक्ट के रूप में कई काम कर रहे हैं। उल्लेखनीय है कि 5 दर्जन से ज्यादा छोटी-बड़ी नदियां विलुप्त होने की कगार पर हैं और लगभग 32 पूरी तरह सूख चुकी हैं। अतिक्रमण, प्रदूषण और गाद जमा होने से सौरा, दुहवा, सिर्मनिया, दाहा, बदुआ, चांदन, ओढ़नी, चीर, धई, और चंद्रभागा जैसी नदियों का अस्तित्व खतरे में है।
गंगा और बागमती जैसी प्रमुख नदियां भी पानी की कमी से जूझ रही हैं। पटना के बख्तियारपुर में गंगा की पुरानी धारा को पुनर्जीवित करने का कार्य प्रगति पर है। बता दें कि बिहार में 19वीं सदी में 6,000 से अधिक नदियां थीं, जो घटकर अब 600 के आसपास रह गई हैं। पूरे प्रदेश में नदियों की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है।
कोसी, सीमांचल सहित बिहार के लगभग सभी जिलों में बहने वाली एक दर्जन से अधिक नदियों के वजूद पर खतरा मंडरा रहा है। सहरसा जिले में कोसी की सहायक नदियां तिलावे और सुरसर लगभग समाप्ति की ओर है। सिमरी बख्तियारपुर के धनुपुरा इलाके में कमला बलान, सिमरटोका नदी, दह कोसी उपधारा और आगर नदी पूरी तरह सूख चुकी हैं। वहीं अररिया जिले के रानीगंज प्रखंड से गुजरने वाली कारी कोसी नदी भी अस्तित्व के संकट से जूझ रही है।