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अरुण जेटली: दिल्ली में मोदी-शाह को स्थापित करने में निभाई अहम भूमिका

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: May 29, 2019 14:46 IST

अरुण जेटली 2000, 2006 और 2012 में गुजरात से राज्यसभा सांसद चुने गए। 2006 और 2102 जब वो राज्यसभा के लिए चुने गए तब नरेंद्र मोदी गुजरात के सीएम थे।

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ठळक मुद्देस्वतंत्र भारत के इतिहास में जेटली एक मात्र राजनेता हैं जिन्होंने वित्त मंत्री और रक्षा  मंत्री का दोहरा दायित्व एक साथ निभाया है।जेटली के वित्त मंत्री रहने के दौरान ही मोदी सरकार ने जीएसटी और नोटबंदी जैसे दो ऐतिहासिक कदम उठाए।

सभी अटकलों पर विराम लगाते हुए निवर्तमान वित्तमंत्री अरुण जेटली ने बुधवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर कहा कि वह स्वास्थ्य संबंधी कारणों की वजह से नयी सरकार में मंत्री नहीं बनना चाहते हैं। जेटली ने चार पैराग्राफ के पत्र में कहा कि वह अपने उपचार और स्वास्थ्य पर ध्यान देना चाहते हैं, इसलिए उन्होंने नयी सरकार में मंत्री न बनने की अपनी इच्छा के बारे में मोदी को मौखिक रूप से सूचित कर दिया था। उन्होंने प्रधानमंत्री को भेजे गए अपने पत्र में लिखा, ‘‘मैं आपसे औपचारिक आग्रह करने के लिए पत्र लिख रहा हूं कि मुझे स्वयं के लिए, मेरे उपचार और स्वास्थ्य के लिए पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए और इसलिए मुझे नयी सरकार में फिलहाल कोई दायित्व नहीं दिया जाए।’’

पिछले 20 सालों से बीजेपी के सबसे बड़े रणनीतिकार

1991 में बीजेपी के औपचारिक सदस्य बनने के बाद से ही जेटली का ग्राफ तेजी से ऊपर चढ़ता गया। दिल्ली के मीडिया में अपने बेहतरीन संपर्कों और प्रखर प्रवक्ता होने के चलते उन्हें 1999 में बीजेपी का प्रवक्ता बनाया गया। उस समय नरेंद्र मोदी बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव थे। केशु भाई पटेल से अनबन के चलते उस वक्त मोदी का ज्यादा वक्त गुजरात से बाहर तो बितता था लेकिन उनका दिल गुजरात में ही था। इसी बीच अटल सरकार में केंद्रीय मंत्री बने जेटली 2000 में पहली बार गुजरात से ही राज्यसभा सांसद बने।

मोदी-जेटली की जुगलबंदी

2001 में गुजरात में जब केशुभाई पटेल को हटाकर नए मुख्यमंत्री बनाने की बात चली तो नरेंद्र मोदी का नाम दावेदार के रूप में चलने लगा। वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी की किताब 'हार नहीं मानूंगा-अटल एक जीवन गाथा' के अनुसार अक्टूबर 2001 की सुबह नरेंद्र मोदी को एक फोन आया। यह फोन अटल जी का था। उन्होंने मोदी को तुरंत मिलने के लिए बुलाया था। इस समय बीजेपी में अटल-आडवाणी के बाद दूसरी पांत के नेताओं में अरुण जेटली, प्रमोद महाजन और सुषमा स्वराज जैसे बड़े नामों का बोलबाला हुआ करता था। 

उपचुनावों में मिली हार के बाद केशुभाई पटेल की स्थिति बीजेपी में खराब होती चली गई और उन्हें हटाने का फैसला लिया गया। 7 अक्टूबर 2001 को अटल बिहारी वाजपेयी की रजामंदी से मोदी को गुजरात का नया सीएम बनाया गया। राजनीति जानकारों का कहना है कि मोदी के सीएम पद के लिए और गुजरात दंगों के बाद जब उनको हटाने की बात चल रही थी तब जेटली मोदी के पीछे चट्टान की तरह खड़े थे।

गुजरात से तीन बार राज्यसभा सांसद बने

अरुण जेटली 2000, 2006 और 2012 में गुजरात से राज्यसभा सांसद चुने गए। 2006 और 2102 जब वो राज्यसभा के लिए चुने गए तब नरेंद्र मोदी गुजरात के सीएम थे।

शाह को दी कानूनी सलाह

इंडिया टुडे में छपी एक खबर के अनुसार साल 2010 में जब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अमित शाह को गुजरात छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा तो वह सीधे दिल्ली में अरुण जेटली के घर पहुंचे थे। साल 2014 में जब अमित शाह बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने तो उस समय उनके अदालतों में उनके ऊपर केस चल रहा था। अमित शाह अपने केस के सिलसिले में अक्सर अरुण जेटली से ही सलाह लेते थे।

सबसे ज्यादा भरोसा जेटली पर

स्वतंत्र भारत के इतिहास में जेटली एक मात्र राजनेता हैं जिन्होंने वित्त मंत्री और रक्षा  मंत्री का दोहरा दायित्व एक साथ निभाया है। जेटली के वित्त मंत्री रहने के दौरान ही मोदी सरकार ने जीएसटी और नोटबंदी जैसे दो ऐतिहासिक कदम उठाए। पीएम मोदी अरुण जेटली पर इतना भरोसा करते हैं कि गुजरात विधानसभा चुनाव 2017 में उन्हें ही प्रभारी बनाया। रणनीतिकार के रूप में जेटली के कद का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भले ही बीजेपी हार गई लेकिन गुजरात के बेहद कड़े में बीजेपी को जीत मिली थी।

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