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प्राथमिकी रद्द करने के मामलों में ‘बिना विवेक के’ आदेश पारित कर रहे हैं इलाहाबाद, उत्तराखंड उच्च न्यायालय: शीर्ष अदालत

By भाषा | Updated: August 23, 2021 19:23 IST

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उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को कहा कि इलाहाबाद और उत्तराखंड उच्च न्यायालय कोई बलपूर्वक कार्रवाई नहीं करने या गिरफ्तारी से संरक्षण के लिए ‘विवेक का इस्तेमाल किये बगैर’ ही एक के बाद एक आदेश पारित कर रहे हैं, जबकि शीर्ष अदालत ने पहले एक आदेश में उनसे सावधानी से इस अधिकार का इस्तेमाल करने को कहा था। न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति एम आर शाह की पीठ ने कहा, ‘‘हमने देखा है कि मैसर्स निहारिका, इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाम महाराष्ट्र राज्य के वाद में मामलों को खारिज करने की याचिकाओं पर हमारे फैसले के बाद भी दो उच्च न्यायालय-इलाहाबाद और उत्तराखंड बिना विवेक के ये आदेश पारित कर रहे हैं।’’सर्वोच्च अदालत ने हत्या के एक मामले में प्राथमिकी रद्द करने की याचिका पर उत्तराखंड उच्च न्यायालय के आदेश के विरुद्ध अपील पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। पीठ ने कहा, ‘‘यह गंभीर मामला है। भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत प्राथमिकी दर्ज की गयी थी। उच्च न्यायालय की बेचैनी देखिए कि उसने निर्देश दिया है कि शख्स को 10 अगस्त तक समर्पण करना चाहिए और जमानत पर फैसला उसी दिन होगा और यदि जमानत अर्जी खारिज कर दी जाती है तो सत्र अदालत को उसी दिन जमानत आवेदन पर सुनवाई करनी चाहिए।’’ शीर्ष अदालत ने कहा, ‘‘यह आदेश हैरान करने वाला है।’’ उसने कहा कि उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में दर्ज किया है कि प्राथमिकी रद्द करने की प्रार्थना पर जोर नहीं दिया गया है और उसके समक्ष अन्य अनुरोध ‘अहानिकारक’ हैं और इसलिए आरोपी को 10 अगस्त से पहले समर्पण करना चाहिए और यदि जमानत अर्जी दायर की जाती है तो उस पर विचार किया जाएगा तथा उसी दिन फैसला सुनाया जाएगा। पीठ ने कहा कि वह मुद्दे का अध्ययन करेगी। उसने उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर उत्तराखंड सरकार को नोटिस जारी किया। न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति शाह की पीठ ने 13 अप्रैल को निहारिका, इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाम महाराष्ट्र के मामले में कुछ निर्देश दिये थे और कहा था कि पुलिस को किसी संज्ञेय अपराध के मामले में जांच करने का वैधानिक अधिकार है और यह दंड प्रक्रिया संहिता के संबंधित प्रावधानों के तहत उसका कर्तव्य भी है एवं अदालत संज्ञेय अपराधों के मामले में किसी जांच को रोकेंगी नहीं। शीर्ष अदालत ने कहा था कि प्राथमिकी रद्द करने के अधिकार का इस्तेमाल सावधानी के साथ संयम से होना चाहिए और ऐसा केवल दुर्लभ मामलों में होना चाहिए जहां प्राथमिकी में किसी संज्ञेय अपराध या किसी तरह के अपराध का खुलासा नहीं किया गया है।

Disclaimer: लोकमत हिन्दी ने इस ख़बर को संपादित नहीं किया है। यह ख़बर पीटीआई-भाषा की फीड से प्रकाशित की गयी है।

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