मानव शरीर में मौजूद 24 घंटे की जैविक घड़ी चुपचाप यह समन्वय करती है कि हम कब सोते हैं, जागते हैं, खाते हैं और आराम करते हैं। यह आंतरिक समय प्रबंधन प्रणाली अंगों और हार्मोन को तालमेल बैठाकर काम करने में मदद करती है। हालांकि, जब जैविक घड़ी अव्यवस्थित हो जाती है, तो इसके प्रभाव खराब गुणवत्ता वाली नींद से कहीं अधिक व्यापक हो सकते हैं और ढलती उम्र में दिमागी सेहत में गिरावट का कारण भी बन सकते हैं। साल 2025 में 79 वर्ष की औसत आयु वाले दो हजार से अधिक बुजुर्गों पर किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि जिन लोगों की जैविक घड़ी अधिक व्यवस्थित होती है, उनके डिमेंशिया की चपेट में आने का जोखिम लगभग 50 फीसदी तक घट जाता है। ------क्यों अहम है जैविक घड़ी------ जैविक घड़ी सोने का समय, हार्मोन का उत्पादन, हृदयगति और शरीर का तापमान सहित कई अन्य दैनिक शारीरिक प्रक्रियाओं को नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभाती है। अव्यवस्थित जैविक घड़ी को अक्सर नींद की खराब गुणवत्ता से जोड़ा जाता है।
विभिन्न अध्ययनों में खराब गुणवत्ता वाली नींद का डिमेंशिया और दिल की बीमारियों के बढ़ते जोखिम से सीधा संबंध पाया गया है। साल 2025 में किए गए अध्ययन में प्रतिभागियों की दिल की सेहत और रक्तचाप का भी विश्लेषण किया गया, जो अन्य कारकों के साथ-साथ नींद की गुणवत्ता पर निर्भर करते हैं। हालांकि, इसमें ‘स्लीप एपनिया’ की समस्या पर गौर नहीं किया गया। ‘स्लीप एपनिया’ एक सामान्य स्थिति है, जिसमें सोते समय श्वास प्रक्रिया लगातार बाधित होती रहती है, जिससे मस्तिष्क को ऑक्सीजन की आपूर्ति कम हो जाती है और व्यक्ति का रक्तचाप बढ़ जाता है। ‘स्लीप एपनिया’ और डिमेंशिया के जोखिम के बीच संबंध बहस का सबब रहे हैं, क्योंकि इस समस्या के शिकार ज्यादातर लोगों में डिमेंशिया का खतरा बढ़ाने वाले अन्य कारक, मसलन-मोटापा, मधुमेह, धूम्रपान, शराब का सेवन, आदि पहले से ही मौजूद होते हैं। ------शारीरिक निष्क्रियता घातक------ नये अध्ययन से पता चलता है कि नींद में खलल से उपजने वाली थकान से पैदा शारीरिक निष्क्रियता को दूर करना ढलती उम्र में दिमाग को दुरुस्त रखने का कारगर तरीका हो सकता है।
दरअसल, शारीरिक सक्रियता बढ़ाने से न सिर्फ वजन नियंत्रित रखने और मोटापा घटाने में मदद मिलती है, बल्कि नींद की गुणवत्ता में भी सुधार होता है और मस्तिष्क की कोशिकाओं में क्षरण की गति भी धीमी हो जाती है। अव्यवस्थित जैविक घड़ी और डिमेंशिया के बीच संबंधों के पीछे प्रतिरक्षा तंत्र का भी हाथ हो सकता है। विभिन्न अध्ययनों में देखा गया है कि व्यक्ति की प्रतिरोधक क्षमता उसकी नींद की गुणवत्ता और जैविक घड़ी दोनों से प्रभावित होती है तथा यह हृदयरोग और दिमागी सेहत में गिरावट का खतरा निर्धारित करने में अहम भूमिका निभाती है। अध्ययनों में यह भी पाया गया है कि नींद की खराब गुणवत्ता याददाश्त, तर्क शक्ति, एक साथ कई काम करने की क्षमता और एकाग्रता में कमी का कारण भी बनती है। एक अन्य अवधारणा यह है कि अच्छी नींद मस्तिष्क से जहरीले प्रोटीन को हटाने की प्रक्रिया को तेज करती है, जिसमें एमिलॉयड के थक्के भी शामिल हैं, जिन्हें विभिन्न अध्ययनों में अल्जाइमर का खतरा बढ़ाने के लिए जिम्मेदार ठहराया गया है। ------नींद की गोलियां कितनी कारगर------ अच्छी नींद की चाह में कई लोग अनिद्रा से छुटकारा दिलाने का दावा करने वाली दवाओं का भी सेवन करते हैं। लेकिन बेंजोडायजेपाइन जैसी नींद की दवाओं को डिमेंशिया का जोखिम बढ़ाने के लिए जिम्मेदार पाया गया है। वहीं, मेलाटोनिन जैसी गोलियां वयस्कों में नींद की गुणवत्ता में सुधार लाने में कुछ खास कारगर नहीं मिली हैं। ------रोज 30 मिनट व्यायाम जरूरी------ रोजाना कम से कम 30 मिनट का व्यायाम, खासकर खुले वातावरण में और दोपहर से पहले, जैविक घड़ी को व्यवस्थित रखने और डिमेंशिया का जोखिम घटाने में मददगार साबित हो सकता है। पार्क में चहलकदमी और ध्यान लगाना दिमागी सेहत को दुरुस्त रखने के सबसे आसान और कारगर तरीकों में शामिल है।