लखनऊः उत्तर प्रदेश में सब्जियों का राजा आलू की कहानी भी निराली है. कभी नगदी फसल की तरह खेतों में बिक जाता है तो कभी कोल्ड स्टोरेज में छह महीने ठंडा करने के बाद भी जब बोरे का खर्च नहीं निकलता तो यूं ही उसे सड़ने के लिए छोड़ दिया जाता है. इस बार आलू उत्पादक किसानों के हालत कुछ ज्यादा ही खराब हैं. बाजार में नई फसल आने के बाद भी आलू के इतने दाम भी नहीं निकल पा रहे हैं कि भाड़े का पैसा ही निकल आए इस कारण अब प्रदेश के आलू उत्पादक जिलों के कई किसानों ने खेत से आलू की खोदाई करने के बजाय उसे खेत में ही जोत दिया.
बीते वर्ष की तुलना में इस साल आलू के दाम 50 प्रतिशत से ज्यादा गिर गए हैं. आलू उत्पादक एक दर्जन से अधिक जिलों में थोक में आलू पांच से छह रुपए किलो में बिक रहा हैं. इतने कम दाम पर आलू की बिक्री होने से उसके उत्पादन की लागत भी नहीं निकाल रही. इस वजह से ही कन्नौज जिले के नगला विसुना गांव के 40 वर्षीय किसान वेद प्रकाश ने खेत में ही रस्सी से फंदा लगाकर अपनी जान ले ली. वेद प्रकाश को आलू के दाम गिरने की कारण वेद प्रकाश को काफी नुकसान हुआ था.
इन जिलों में हुआ नुकसान
वेद प्रकाश जैसा नुकसान राज्य उत्तर प्रदेश के आगरा, इटावा, मैनपुरी, फर्रुखाबाद, कन्नौज, फिरोजाबाद, फतेहपुर, अलीगढ़, बुलंदशहर, मथुरा, लखनऊ, गोरखपुर और महराजगंज आदि जिलों के आलू उत्पादक किसानों को भी उठाना पड रहा है. उद्यान विभाग के आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश में 2024-25 के दौरान करीब 245 लाख मीट्रिक टन आलू का उत्पादन हुआ.
इसमें से 2207 कोल्ड स्टोरेज में लगभग 150 लाख मीट्रिक टन आलू का भंडारण इस उम्मीद से किसानों ने किया था कि उसने उचित दाम मिलेंगे. परंतु ऐसा हुआ नहीं. बिहार, झारखंड और नेपाल से इस बाद आलू की डिमांड बेहद कम आयी और जब नया आलू आने को हुआ तो अमेरिका-इजरायल ने ईरान पर हमला कर दिया, तो इसका असर भी आलू के निर्यात पर पड़ गया.
आलू के दाम गिर गए. आलू उत्पादक जिलों के किसानों का कहना है कि राज्य में आलू का हब माने जाने वाले आगरा, फरुखाबाद, इटावा, फिरोजाबाद और कन्नौज में इस बार चिप्स बनाने वाली बड़ी कंपनियों और दिल्ली, मुंबई, गुजरात तथा मध्य प्रदेश के व्यापारियों ने आलू खरीदने में रुचि नहीं दिखाई.
जिसके चलते पिछले साल आलू का जो कट्टा 500-600 रुपए में बिका था, वह इन दिनों 200-250 रुपए में मुश्किल से बिक रहा है. जबकि आलू किसान को एक कट्टा आलू (एक क्विंटल) लागत करीब 700 रुपए आ रही है. इसमें पैदावार की लागत और कोल्ड स्टोरेज, माल ढुलाई, बारदाना और मजदूरी का भाड़ा शामिल है. अब 600 रुपए क्विंटल का आलू 200 से 250 रुपए में बिक रहा है.
प्रदेश सरकार किसानों की मदद के लिए अभी तक आगे नहीं आयी है. इस कारण से अब किसान आलू को खेत में और बागों में फेंक रहे हैं. कोल्ड स्टोरेज से निकाल नहीं रहे हैं. यूपी के आगरा, इटावा, मैनपुरी, फरुखाबाद, कन्नौज, फिरोजाबाद, फतेहपुर, अलीगढ़, बुलंदशहर, मथुरा आदि जिलों में आलू के ढेर बाग में, सड़क किनारे, तालाब किनारे पड़े दिखाई दे रहे हैं.
आलू का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय हो
उद्यान विभाग में कार्यवाहक उप निदेशक (आलू) राजीव वर्मा कहते हैं कि जिला प्रशासन के साथ मिलकर आलू किसानों को हो रही नुकसान का आंकलन किया जाएगा और उसी आधार पर आगे की रणनीति बनेगी. जबकि आलू किसान यह मांग कर रही हैं कि आलू के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य तय किया जाए या सरकारी खरीद की व्यवस्था हो.
किसानों का कहना है कि जब गेहूं, धान जैसी फसलों को सुरक्षा मिल सकती है, तो आलू जैसी नकदी फसल को क्यों नहीं. फिलहाल कई किसान अब नुकसान की भरपाई के लिए टमाटर, खीरा, खरबूजा और बैंगन जैसी सब्जियों की ओर देख रहे हैं.
किसान का कहना है कि आलू के साथ टमाटर की खेती कर जोखिम बांटने की कोशिश करेंगे. जबकि घाटा उठाने के बावजूद हजारों किसानों ने फिर आलू पर दांव लगाया. अब देखना यह है कि फिर से यह कहानी न दोहराई जाए.