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प्रस्तावित एआरसी से क्षेत्र की मौजूीदा कंपनियों के कामकाज पर असर नहीं: आरबीआई गवर्नर

By भाषा | Updated: February 25, 2021 18:22 IST

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मुंबई, 25 फरवरी रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने बृहस्पतिवार को कहा कि कर्जदाता संस्थानों की गैर- निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) के प्रबंधन के लिये बजट में घोषित नई संपत्ति पुनर्गठन कंपनी (एआरसी) के शुरू होने से इस क्षेत्र में काम कर रही मौजूदा कंपनियों पर असर नहीं होगा।

वित्त मंत्री निर्मला सीमारमण ने 2021- 22 का बजट पेश करते हुये बैंकों और वित्त संस्थानों के मौजूदा फंसे कर्ज का अधिग्रहण करने और उसका बेहतर ढंग से प्रबंधन करने के लिये एक संपत्ति पुनर्गठन और संपत्ति प्रबंधन कंपनी बनाने का प्रस्ताव किया है।

रिजर्व बैंक गवर्नर ने बांबे चैंबर आफ कामर्स द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुये कहा, ‘‘किसी भी तरह से यह (प्रसतावित एआरसी) वर्तमान में काम कर रही एआरसी की गतिविधियों को बाधित नहीं करेगी। मेरा मानना है कि इस क्षेत्र में एक और मजबूत एआरसी के लिये गुंजाइश है .. ।’’

वर्तमान में देश में 28 संपत्ति पुनर्गठन कंपनियां काम कर रहीं हैं। यह कंपनियां बैंकों के फंसी कर्ज संपत्तियों का अधिग्रहण कर उसका प्रबंधन करती है।

दास ने कहा कि एआरसी के गठन का प्रसताव सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने ही सरकार को दिया था। सरकार ने उसे स्वीकार कर लिया और बजट में इसकी घोषणा कर दी। उन्होंने कहा कि यह एआरसी बैंकों के खातों में दर्ज फंसी कर्ज संपत्ति का अधिग्रहण कर अपने स्तर पर उसके समाधान का प्रयास करेगी जैसा की वर्तमान में काम कर रही एआरसी कर रही हैं।

दास ने कहा कि मौजूदा एआरसी के लिये नियामकीय ढांचे को मजबत करना केन्द्रीय बैंक के एजेंडा में शामिल है।

दबाव वाली संपत्ति के बारे में गवर्नर ने कहा कि इस संबंध में बैंकों के बीच जागरुकता बढ़ी है और एनपीए से निपटने को लेकर गतिविधियां बढ़ी हैं। उनहोंने कहा कि रिजर्व बेंक ने इस क्षेत्र में अपनी निरीक्षण प्रणाली को अधिक फना और गहरा बनाया है।

दास ने कहा कि सेंट्रल रिपाजिटरी आफ इन्फोरमेशन आन लार्ज क्रडिट्स (सीआरआईएलसी) के तहत बैंकों से नियमित रूप से फंसे कर्ज को लेकर आंकड़े प्रापत होते रहते हैं और इससे रिजर्व बैंक के पास फंसी कर्ज संपत्ति को लेकर पूरी तस्वीर सामने रहती है। ‘‘हमारे पास बैंकों में दबाव वाली संपत्ति को लेकर एकदम सही स्थिति होती है और जैसे ही हमें इसमें ज्यादा दबाव दिखता है हम तुरंत बैंकों के साथ विचार विमर्श करते हैं और समस्या से सक्रियता के साथ निपटते हैं।

Disclaimer: लोकमत हिन्दी ने इस ख़बर को संपादित नहीं किया है। यह ख़बर पीटीआई-भाषा की फीड से प्रकाशित की गयी है।

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