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कृषि विशेषज्ञों ने नए कृषि कानूनों पर रोक लगाने के न्यायालय के फैसले का स्वागत किया

By भाषा | Updated: January 12, 2021 23:09 IST

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नयी दिल्ली, 12 जनवरी कई जाने-माने कृषि अर्थशास्त्रियों ने नए कृषि कानूनों को लागू करने पर रोक लगाने तथा सरकार और आंदोलनकारी किसान संगठनों के बीच उन कानूनों को लेकर जारी गतिरोध दूर कराने के लिए चार सदस्यीय समिति का गठन किये जाने के उच्चतम न्यायालय के मंगलवार केइफैसले का स्वागत किया।

पूर्व केंद्रीय मंत्री और प्रख्यात अर्थशास्त्री वाई के अलघ ने कहा कि उन्हें लगता है कि यह (उच्चतम न्यायालय का फैसला) बहुत विवेकपूर्ण है। अलघ ने पीटीआई-भाषा से कहा, ‘‘क्योंकि उन्होंने (उच्चतम न्यायालय के न्यायधीशों ने) कहा है कि आपको (केंद्र को) पर्याप्त तैयारी करनी चाहिए थी क्योंकि नए कृषि कानूनों को बड़ी जल्दबाजी में पारित किया गया था।

उन्होंने आगे बताया कि चीफ जस्टिस एस ए बोबडे और जस्टिस ए एस बोपन्ना और वी रामसुब्रमणियन की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि कोविड-19 वर्ष की समाप्ति के बाद ही केंद्र नए कृषि कानूनों के लिए कोई ढांचा विकसित कर सकता है।

अलघ ने कहा, ‘‘क्योंकि लॉकडाऊन के समय आप व्यापार और परिवहन के बारे में बात नहीं कर सकते।’’

शीर्ष अदालत ने मूल्य आश्वासन और कृषि सेवा अधिनियम पर किसानों का (सशक्तिकरण एवं सुरक्षा) समझौता अधिनियम, कृषकों के उत्पाद व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अधिनियम, और आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम- इन तीन कानूनों के कार्यान्वयन पर रोक लगा दी। इन कानूनों के खिलाफ इनके कई संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए कई याचिकायें दायर की गई हैं।

इसी तरह योजना आयोग के पूर्व सदस्य अभिजीत सेन ने कहा, ‘‘मुझे लगता है कि यह अच्छा है। ’’

इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट रिसर्च (आईजीआईडीआर) के अर्थशास्त्र के प्रोफेसर, महेंद्र देव एस, ने भी कहा, ‘‘यह एक अच्छा सुझाव है ।’’ उन्होंने कहा कि प्रदर्शनकारी किसान नए कृषि कानूनों को रद्द करने की मांग कर रहे हैं और सरकार केवल नए कृषि कानूनों में संशोधन करने के लिए तैयार है। पैनल यह सुझाव दे सकता है कि और क्या विकल्प हो सकते हैं।

समिति के सदस्यों के चार नामों को रखने वाली पीठ ने कहा कि वह इस मुद्दे पर किसानों की शिकायतों पर गौर करेगी।

इन चार सदस्यों में भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष भूपिंदर सिंह मान, महाराष्ट्र के शेतकारी संगठन के अध्यक्ष, अनिल घणवत, दक्षिण एशिया, अंतर्राष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान के निदेशक प्रमोद कुमार जोशी और कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी शामिल हैं।

अलघ ने यह भी कहा कि एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में होना चाहिए जहां सिंचाई का उपयोग करते हुए चावल और गेहूं उगाये जाते हैं।

उन्होंने कहा, ‘‘हमें स्टॉक बनाना होगा क्योंकि यह कहना मूर्खतापूर्ण है कि हमारे पास अतिरिक्त स्टॉक है क्योंकि दुनिया में अनाज व्यापार की राजनीति उन देशों के साथ बुरा व्यवहार करती है जो अच्छी तरह से भंडारण नहीं करते हैं।’’

पूर्व केंद्रीय मंत्री ने यह भी कहा कि भारत को कृषि के लिए दीर्घकालिक योजना की आवश्यकता है।

अलघ ने कहा कि चूंकि मोदी सरकार ने योजना आयोग को समाप्त कर दिया है, इसलिए राज्यों के साथ परामर्श में कृषि के लिए दीर्घकालिक योजना विकसित करने के लिए एक विशेष तंत्र स्थापित करने की सलाह अच्छी होगी।

केएस लीगल एंड एसोसिएट्स के मैनेजिंग पार्टनर सोनम चंदवानी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित चार सदस्यीय समिति इस मामले में न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा है और किसान यूनियन इसका हिस्सा बनने से इनकार नहीं कर सकते।

उन्होंने कहा कि उच्चतम न्यायालय ने न्यायपालिका और राजनीति के बीच के अंतर को भी स्पष्ट किया और किसानों को इसमें सहयोग करने के लिए कहा।

Disclaimer: लोकमत हिन्दी ने इस ख़बर को संपादित नहीं किया है। यह ख़बर पीटीआई-भाषा की फीड से प्रकाशित की गयी है।

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