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वेदप्रताप वैदिक का ब्लॉगः तालिबान को मान्यता देने का सवाल

By वेद प्रताप वैदिक | Updated: November 2, 2021 12:41 IST

पाकिस्तान की मदद के बिना तालिबान जिंदा ही नहीं रह सकते थे। काबुल पर उनका कब्जा होते ही पाकिस्तान ने अपने गुप्तचर प्रमुख और विदेश मंत्नी को काबुल भेजा था।

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तालिबान सरकार के मंत्नी जबीउल्लाह मुजाहिद ने काबुल में एक पत्नकार परिषद में बोलते हुए दुनिया के देशों को धमकी दी है कि यदि विभिन्न राष्ट्रों ने तालिबान सरकार को शीघ्र ही मान्यता नहीं दी तो उसका दुष्परिणाम सारी दुनिया को भुगतना होगा। उन्होंने यह भी कहा कि मान्यता उनका हक है और उससे उन्हें वंचित करना किसी के हित में नहीं है। तालिबान की पहली बात व्यावहारिक है और सत्य है लेकिन दूसरी बात अर्धसत्य है। तालिबान को मान्यता देना यदि राष्ट्रों के हित में होता तो वे अभी तक चुप क्यों बैठे रहते? पाकिस्तान जैसे देश भी उसकी मान्यता को अटकाए हुए हैं। सऊदी अरब और यूएई जैसे देशों ने भी तालिबान सरकार को मान्यता अभी तक नहीं दी है जबकि पिछली तालिबान सरकार को उन्होंने सत्तारूढ़ होते ही मान्यता दे दी थी। तालिबान को सबसे पहले एक सवाल खुद से पूछना चाहिए। वह यह कि पाकिस्तान को अभी तक उनसे क्या परहेज है?

पाकिस्तान की मदद के बिना तालिबान जिंदा ही नहीं रह सकते थे। काबुल पर उनका कब्जा होते ही पाकिस्तान ने अपने गुप्तचर प्रमुख और विदेश मंत्नी को काबुल भेजा था। उसने तालिबान को यह अनुमति भी दे दी है कि वह इस्लामाबाद में अपना राजदूतावास चला ले लेकिन वहां कोई राजदूत नहीं होगा। तालिबान के प्रतिनिधि अमेरिका, चीन, रूस, तुर्की, ईरान और यूरोपीय संघ से बराबर मिल रहे हैं। ये देश अफगान जनता को भुखमरी से बचाने के लिए दिल खोलकर मदद भी भिजवा रहे हैं लेकिन तालिबान सरकार को मान्यता देने की हिम्मत कोई भी देश क्यों नहीं जुटा पा रहा है? इसके कई कारण हैं। 

एक तो तालिबान ने अपनी सरकार को खुद ही ‘कामचलाऊ’ घोषित कर रखा है यानी उसे अधर में लटका रखा है तो दुनिया के देश उसे जमीन पर उतारने की जिम्मेदारी क्यों लें? दूसरा, तालिबान सरकार कई गिरोहों से मिलकर बनी हुई है। कब कौन सा गिरोह किसे कत्ल कर देगा, कुछ पता नहीं। 40 साल पहले का खल्की-परचमी जमाना लोग भूले नहीं हैं। तीसरा, ढाई माह गुजर गए लेकिन अभी तक तालिबान कोई सर्वसमावेशी सरकार नहीं बना पाए। चौथा, अब भी अफगानिस्तान से ऐसी खबरें बराबर आ रही हैं, जो तालिबान की छवि पर धब्बा लगाती हैं। यदि यही स्थिति चलती रही तो तालिबान को मान्यता मिलना कठिन होगा और अफगानिस्तान की जो 10 अरब डॉलर की राशि अमेरिकी बैंकों में पड़ी हुई है, वह भी उसे नहीं मिल पाएगी। इस समय जरूरी यह है कि अफगान जनता को भुखमरी और अराजकता से बचाया जाए और इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए तालिबान को यदि अपने समर्थकों के विरुद्ध कठोर कदम उठाना पड़े तो वे भी बेहिचक उठाए जाएं। 

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