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डरने का नहीं, मजबूत होने का वक्त!

By विकास मिश्रा | Updated: January 13, 2026 18:06 IST

मगर सारी दुनिया ऐसा नहीं सोचती है. यदि सोचती होती तो न किसी देश पर कभी आक्रमण होता और न कोई देश गुलाम होता.

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ठळक मुद्देयह बात हमें समझनी होगी कि आक्रमण इस दुनिया का दस्तूर है. देश के नजरिए से उसे देखेंगे और ट्रम्प अपने नजरिए से देख रहे हैं.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की हम चाहे जितनी भी आलोचना करें कि वे भारत को दबाना चाह रहे हैं, सच यही है कि अपनी बादशाहत कायम रखने के लिए कोई भी देश या उसका नेता यही करेगा. रूस और चीन भी तो इसी राह पर हैं! हमें ये सब अंतरराष्ट्रीय कानूनों के खिलाफ और बुरा इसलिए लगता है क्योंकि हम शांति की राह पर चलने और सबके लिए दुआ करने वाले देश हैं. हमारी सोच सर्वे भवन्तु सुखिन: की है. मगर सारी दुनिया ऐसा नहीं सोचती है. यदि सोचती होती तो न किसी देश पर कभी आक्रमण होता और न कोई देश गुलाम होता.

यह बात हमें समझनी होगी कि आक्रमण इस दुनिया का दस्तूर है. सवाल है कि अपने खिलाफ आक्रमण को हम कैसे धूल चटाते हैं? ट्रम्प ने अमेरिका फर्स्ट की नीति अपना रखी है, तो वह नीति हमारी नजर में गलत हो सकती है क्योंकि हम अपने देश के नजरिए से उसे देखेंगे और ट्रम्प अपने नजरिए से देख रहे हैं.

उन्हें लगता है कि उनके पूर्ववर्ती राष्ट्रपतियों ने दुनिया में अमेरिकी बादशाहत के लिए संगठनों का जो ताना-बाना बुना वह गलत था और दुनिया भर में जो पैसा अमेरिका बहा रहा था, वह फिजूलखर्ची थी तो वह उनकी सोच है. उनका काम करने का अपना तरीका है. वो जिस संगठन में रहना चाहें रहें, जिसे छोड़ना चाहें छोड़ें, जो चाहें करें, उनकी मर्जी है, उनका मन है.

हम वो लोग हैं जो हर देश के राष्ट्राध्यक्ष का सम्मान करना जानते हैं. यही संस्कृति है हमारी. मगर जब कोई यह सोचता है या तमन्ना रखता है कि भारत अपने कृषि क्षेत्र को विदेशियों के लिए चारागाह बना दे, तो वैसी सोच के बारे में हमारा गंभीर होना लाजिमी है. भले ही 500 प्रतिशत तो क्या 1000 प्रतिशत भी टैरिफ लग जाए, हम अपने किसानों को किसी भी दूसरे देश की नीतियों के हवाले कैसे कर सकते हैं?

हम इतने उदार कैसे हो जाएं कि आइए जनाब, ये रहा हमारी कृषि का मैदान, इसमें चरिए और इसे सफाचट कर जाइए! नहीं, ये संभव ही नहीं है! फिर चाहे जिस बादशाह को नाराज होना हो, हो जाए! हमें पता है कि वैश्विक बाजार और खुली अर्थव्यवस्था के नाम पर दुनिया में जो स्थितियां पैदा हो चुकी हैं, हम चाहें या न चाहें, हमें दुष्परिणाम भुगतने के लिए भी तैयार रहना होगा.

लेकिन दुष्परिणाम के ऐसे ही वक्त में यदि खुद को मजबूत करने का रास्ता भी तलाशा जाए तो वर्तमान की तमाम चुनौतियों के बावजूद मजबूत भविष्य की दिशा में जरूर कदम बढ़ाए जा सकते हैं. चीन हमारे सामने सबसे बड़ा उदाहरण है. वर्ष 1978 में जिस चीन का निर्यात महज 10 बिलियन डॉलर हुआ करता था वह वर्ष 2000 पार करते-करते 4.3 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया.

व्यापार के मामले में आज चीन दुनिया में पहले पायदान पर है. उसने ऐसी-ऐसी चीजें बनाईं जो बुनियादी जरूरत की चीजें थीं. इस तरह वह दुनिया में छा गया. आज विश्व में शायद ही कोई ऐसा देश हो जिसे चीन से सामान आयात करने की जरूरत न पड़ती हो. और चीन ने केवल सामान्य चीजें ही नहीं बनाईं बल्कि रक्षा से लेकर विज्ञान तक में अपनी अलग राह पकड़ी.

वह दुनिया का कारखाना बन गया और आज यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि वह हर मामले में अमेरिका को चुनौती दे रहा है. इसके बावजूद चीन की नकेल अमेरिका नहीं कस पा रहा है. हम ताजा घटनाक्रम ही देखें और केवल टैरिफ की ही बात करें तो चीन ने शुरुआती दौर में ही अमेरिका को अपने तेवर दिखा दिए.

आज भारत पर अमेरिका ने 50 प्रतिशत टैरिफ लगा रखा है लेकिन चीन पर केवल 30 प्रतिशत ही टैरिफ है. कारण आप जानते हैं कि चीन के पास दुर्लभ खनिज पदार्थों की भरमार है और इलेक्ट्रिक वाहनों, सेमीकंडक्टर, रक्षा उपकरण और नवीकरणीय ऊर्जा तकनीकों के लिए बहुत जरूरी इन खनिज पदार्थों के निर्यात की सप्लाई चेन को उसने थोड़ा धीमा किया तो अमेरिकी बाजार हिल गया.

चीन के प्रति इसीलिए अमेरिका को नरम रवैया अपनाने को मजबूर होना पड़ा. भारत के पास ऐसा कोई रणनीतिक नुस्खा नहीं है इसलिए अमेरिका की कोई नस हम नहीं दबा पा रहे हैं. वो हमारी नस बेवजह दबा रहा है. रूस से बड़ी मात्रा में तेल चीन खरीद रहा हैै, बड़ी मात्रा में यूरोप के देश रूस से ईंधन ले रहे हैं. अमेरिका खुद रूस से कई चीजें खरीद रहा है.

इसके बावजूद टैरिफ हमला सबसे ज्यादा भारत पर! इस बात से हमें सीख लेने की जरूरत है कि भय बिनु होइ न प्रीति. आपके पास ऐसा नुस्खा होना जरूरी है कि दुनिया आपसे दोस्ती रखने पर मजबूर हो.  तो सवाल है कि हमारी ताकत क्या है? हमें इस बात को समझना होगा कि हमारी ताकत हमारे बाजार में समाहित है.

ठीक है कि हम निर्यात के मामले में 17 वें नंबर पर आते हैं लेकिन आयात के मामले में हम 8वें पायदान पर हैं. हमें यह समझना होगा कि यदि हमें चीजों को आयात करने की जरूरत पड़ रही है तो निर्यातकों को भी हमारे बाजार की जरूरत है. हम यदि किसी देश को बड़ी मात्रा में जेनेरिक दवाइयां निर्यात कर रहे हैं तो उन दवाइयों को टैरिफ में छूट दी जाए और दूसरी चीजों पर टैरिफ लगाया जाए तो हमें यह स्वीकार्य नहीं होना चाहिए! और उससे बड़ी बात कि कोई देश यदि हमें धमकाने की कोशिश कर रहा है तो अपने नेतृत्व के साथ पूरे भारत को खड़ा होना चाहिए.

यह वक्त राजनीति का बिल्कुल नहीं है क्योंकि किसी की भी राजनीति राष्ट्र से ऊपर नहीं हो सकती है. ध्यान रखिए कि उंगलियां कमजोर होती हैं लेकिन मुट्ठी बहुत मजबूत होती है. जब सारा देश एकजुट होगा तो दुनिया की कोई भी ताकत हमें झुका नहीं सकती. ये वक्त डरने का नहीं है. मजबूत भविष्य की नींव रखने का है. हमारे युवा इसमें सबसे बड़ी भूमिका निभा सकते हैं.

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