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डॉ. विशाला शर्मा का ब्लॉग: देश की गौरवशाली परंपरा का प्रतीक गुढ़ी पाड़वा

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: April 6, 2019 07:36 IST

हमें अपनी संस्कृति को सहेजने हेतु त्यौहारों को मूल भावना के साथ मनाना चाहिए. शुभ कार्य की शुरुआत तथा वाहन खरीदी, गहनों की खरीदी, नए वास्तु का मुहूर्त, किसी विशेष कार्य की पूजा-अर्चना इस दिन करना शुभ होता है.

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भारत त्यौहारों का देश है. सभी त्यौहारों की अपनी-अपनी परंपरा होती है. साथ ही प्रत्येक त्यौहार एक विशेष संदेश लेकर आता है. इन त्यौहारों के द्वारा सामाजिक ताने-बाने को बनाए रखने में मदद मिलती है. त्यौहार जीवन में सुखद परिवर्तन लाते हैं और हमें हर्षोल्लास से भर देते हैं. मानव उत्साह के साथ त्यौहारों की प्रतीक्षा करते हैं और इस वातावरण में अपने दु:खों और अवसादों को भूल जाते हैं. 

गुढ़ी पाड़वा चेतना का पर्व है. साथ ही यह भारत की गौरवशाली परंपरा का प्रतीक भी है. पूरे देश में यह पर्व उत्साह के साथ मनाया जाता है. हम भारतीय शुभ मुहूर्तो में से एक मुहूर्त चैत्न के गुढ़ी पाड़वा को मानते हैं. साथ ही दीपावली के दूसरे दिन बलि प्रतिपदा, दशहरा और अक्षय तृतीया के दिन शुभ कार्यो का श्री गणोश किया जाता है.

भारत के विभिन्न प्रांतों में इस त्यौहार को अलग-अलग तरीके से मनाने की परंपरा चली आ रही है. आंध्र प्रदेश में ‘युगादि’, सिंधी समुदाय द्वारा’ चेट्री चंड के रूप में इसे मनाया जाता है. महाराष्ट्र में गुढ़ी अर्थात विजय पताका के रूप में घरों पर रेशमी साड़ी पर कलश लगाकर विभिन्न तरह के गहने और नीम की डाल से सजाकर गुढ़ी लगाई जाती है. मध्य प्रदेश में घट स्थापना कर नौ दिनों तक अर्थात राम नवमी तक देवी की पूजा-अर्चना की जाती है तथा उपवास किया जाता है. मधुमास में आनेवाला यह पर्व वसंत के उल्लास व उमंग के साथ मनाया जाता है. इस समय प्रकृति अपनी सुंदर छटा बिखेर देती है. यह माना जाता है कि सृष्टि का प्रारंभ चैत्न शुक्ल प्रतिपदा के दिन हुआ था. इसलिए ब्रह्मा जी ने प्रथम सूर्योदय के साथ सृष्टि की रचना देवी दुर्गा के आदेश पर की. इसी दिन पंचांग तैयार किया जाता है. हम जानते हैं कि शक और हूणों के आक्रमणों से भारत त्नस्त था. उज्जैन नरेश 

विक्र मादित्य ने भारत का रक्षण करते हुए शकों पर इसी दिन विजय प्राप्त की थी और नए युग का सूत्नपात किया. इसी दिन पांडवों का भी अज्ञातवास समाप्त हुआ था.  दक्षिण भारतीयों का मानना है कि इस दिन भगवान राम ने बालि के अत्याचारी शासन से प्रजा को मुक्ति दिलाई थी और इसीलिए दक्षिण भारत में आज भी उत्साह के साथ यह त्यौहार मनाया जाता है.  

हमें अपनी संस्कृति को सहेजने हेतु त्यौहारों को मूल भावना के साथ मनाना चाहिए. शुभ कार्य की शुरुआत तथा वाहन खरीदी, गहनों की खरीदी, नए वास्तु का मुहूर्त, किसी विशेष कार्य की पूजा-अर्चना इस दिन करना शुभ होता है. इस दिन मिष्ठान्न खाने के साथ हम अपने आचार एवं विचार में भी मिठास लाने का प्रयास करें. तभी इन पर्वो की सार्थकता होगी.

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