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चुनावी विश्लेषण-2: बीजेपी को ओवर कॉन्फिडेंस ले डूबा, ये आंकड़े हैं गवाही!

By बद्री नाथ | Updated: January 1, 2019 07:42 IST

विधानसभा चुनाव विश्लेषण 2018: कैसे लड़ा गया चुनाव, कैसे रहे नतीजे, कैसी हो रही हैं चर्चाएं, आगे आम चुनावों में क्या होंगी राजनीतिक संभावनाएं?

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अगर हम इन चुनावों का सूक्ष्म विश्लेषण करें तो यह बात स्पष्ट होती है कि इस विधान सभा चुनावों में वसुन्धरा की जैसी हार लग रही थी वैसी हार नहीं हुई। छत्तीसगढ़ का मुकाबला अप्रत्याशित रहा। दो दलीय राजनीतिक व्यवस्था वाले राज्य छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी की  जनता कांग्रेस 10 % मतों के साथ तीसरे राजनितिक ध्रुव के रूप में स्थापित हुई। मध्य प्रदेश का मुकाबला शुरू से ही कांटे का बना रहा।

तेलंगाना और मिजोरम में ये दोनों राष्ट्रीय पार्टियाँ मुकाबले में क्षेत्रीय दलों से मुकाबला करनें में असमर्थ दिखीं। विकल्प हीनता के कारण इन तीनों राज्यों में हुए चुनावों में बीजेपी को होने वाले नुकसान का पूरा फायदा कांग्रेस ने ने उठा लिया वहीं मिजोरम में होने वाले चुनाव में कांग्रेस को होने वाले पुरे नुकसान को एमएनऍफ़ ने अपने खाते में जोड़ा।

 वहीं तेलंगाना में में बीजेपी के पूर्व सहयोगी सहयोगी टी डी पी को साथ लेकर भुनाने की जोरदार कोशिश की लेकिन यहाँ की जनता ने पूर्व सीएम को और भी ज्यादे सीटों के साथ जनादेश दिया कुल मिलकर कांग्रेस की तेलंगाना बनाने के कट्टर विरोधी रहे चंद्रबाबू नायडू के साथ जानें की ये रणनीति पूरी तरह से फेल रही। 

शहरी क्षेत्र को बीजेपी का गढ़ माना जाता है लेकिन इंदौर, जबलपुर, ग्वालियर में भी बीजेपी हारी है जो कि शहरी विधान सभाएं हैं। पीछली बार जीएसटी के विरोध में सूरत के व्यापारियों ने बीजेपी के खिलाफ काफी हफ्तों दुकाने बंद रखी थी लेकिन अंत में बीजेपी ने सूरत को भी जीत कर शहरों में अपना वर्चस्व कायम रखा थो जो कि इस चुनाव में नहीं देखने को मिला।

शहरी मतदाताओं पर बरकरार है भाजपा की पकड़

राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ तीनों राज्यों में भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला था।
मध्य प्रदेश में अबकी बार 200 पार का नारा देने वाली बीजेपी पांचो राज्यों में 184 सीटों पर सिमट गई। हिंदी हार्ट लैंड अहम राज्यों के समग्र आंकड़ों पर नजर डाले तो स्पष्ट है कि इस बार तीनों राज्यों में ग्रामीण और किसानी से जुड़े मतदाताओं के प्रभाव वाली सीटों पर कांग्रेस ने भाजपा पर निर्णायक बढ़त बनाई।

हालांकि, राजस्थान और मध्यप्रदेश की शहरी मतदाताओं वाली सीटों पर भाजपा की पारंपरिक मजबूत उपस्थिति इस बार भी दिखी। विश्लेषकों की मानें तो भाजपा के लिए सबसे बड़ी चिंता अधिक मत के बावजूद सीटों में उन्हें तब्दील नहीं कर पाना है।

इस बार राजस्थान और मध्यप्रदेश में दोनों दलों को मिले मतों का अंतर क्रमश: 0.5 फीसदी और 0.1 फीसदी रहा लेकिन राजस्थान मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में बीजेपी के वोटों में गिरावट पिछले चुनाव के मुकाबले क्रमशः 9%, 10% और 11% रही इस वजह से भी सीटों की दौड़ में कांग्रेस कहीं आगे निकल गई। 

ऐसे में 2019 लोकसभा चुनाव के लिए भाजपा का जोर अन्य वर्गों और दलों का विश्वास फिर से बहाल करने पर होगी। साथ ही चुनाव में साथ देने वाले शहरी मतदाताओं को बनाए रखने के प्रयास भी जारी रखने होंगे। विश्लेषकों ने कहा, हालांकि, राजस्थान और मध्यप्रदेश में मतों में अंतर कम होने के बावजूद सीटों का फासला बहुत अधिक है।

इसकी वजह विपक्षी एकता और जहां गठबंधन नहीं हुआ वहां पर भी भाजपा विरोधी मतदाताओं ने संभावित विजेता प्रत्याशी के पक्ष में मत दिया इस माहौल का सबसे ज्यादे फायदा कांग्रेस को मिला लेकिन यह भी सही है अगर बसपा सपा को साथ लिया जाता तो कांग्रेस को चुनाव के बाद किसी के भी साथ की जरूरत न पड़ती। विश्लेषण जारी है....

ये लेखक के निजी विचार हैं।

टॅग्स :विधानसभा चुनावलोकसभा चुनावभारतीय जनता पार्टी (बीजेपी)
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