निश्चित रूप से कोरोना संक्रमण और आरसेप के कारण बदली हुई वैश्विक व्यापार व कारोबार की पृष्ठभूमि में एफटीए को लेकर भारत की रणनीति में बदलाव का स्वागत किया जाना चाहिए।
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अभी तो पता ही नहीं चलता है कि कौनसा नमकीन तेल में तला गया है और कौनसा चर्बी में तला गया है? फिर सवाल यह भी है कि वह चर्बी किसकी है? इसी तरह से कई चीनी नूडल्स और आलू की पपड़ियां मांस और मछली से भी तैयार की जाती हैं।
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मूल बात यह है समर्थन मूल्य से किसान की आय में वृद्धि होती है जबकि देश की आय में गिरावट आती है. इस अंतर्विरोध को हल करना जरूरी है. किसान के हित और देश के हित को एक साथ हासिल करने का रास्ता हमें खोजना पड़ेगा.
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सीएसडीएस-लोकनीति के अनुसंधानकर्ता राहुल वर्मा और प्रणव गुप्ता ने बिहार चुनाव का अध्ययन करके बताया था कि लालू-नीतीश के महागठबंधन की सामाजिक शक्तियों के साथ मुसलमान वोटरों के गठजोड़ ने नीतीश कुमार की शानदार जीत सुनिश्चित की. दिल्ली में भी ऐसा ही हुआ था
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जिंदा और धड़कता लोकतंत्र सिर्फ सरकार में बैठे दल के सहारे नहीं चल सकता. विपक्ष की बेंचों पर असहमतियों के अनेक सुर चाहिए. भारत का संविधान बहुदलीय लोकतंत्र का समर्थन करता है. इस व्यवस्था में प्रतिपक्ष का बौना और नाटा होना देश की सेहत के लिए अच्छा नहीं
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