डॉ. अनन्या मिश्र
गणतंत्र दिवस के पावन अवसर पर भारत केवल एक उत्सव नहीं मना रहा, बल्कि अपने भविष्य की धड़कन को सुन रहा है. यह वह क्षण है जब राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी युवा शक्ति है. विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में भारत में लगभग 90 करोड़ मतदाता हैं, और इनमें से लगभग दो-तिहाई की आयु 35 वर्ष से कम है. यह आंकड़ा लोकतंत्र की ऊर्जा, जिजीविषा और निर्णायक क्षमता का उद्घोष है. कहा जाता रहा है कि आज का युवा राजनीति से दूर है; किंतु सत्य यह है कि आज का युवा राजनीति से विमुख नहीं, बल्कि लोकतंत्र को जड़ परंपराओं से मुक्त कर नई ऊंचाइयों की ओर ध्वज लहराते बढ़ रहा है.
यह वही पीढ़ी है जो राष्ट्र की तथाकथित डिजिटल रीढ़ को अपने कंधों पर थामे हुए है. भारत में आज 100 करोड़ से अधिक इंटरनेट उपभोक्ता हैं, जिनमें बहुसंख्यक युवा हैं. यह युवा तकनीक को केवल सुविधा का उपकरण नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक भागीदारी का शस्त्र बना चुका है. चाहे सरकारी मंचों पर शिकायत दर्ज कराने का साहस हो, नीतिगत सुझाव रखने की दृढ़ता हो, या स्थानीय समस्याओं के समाधान हेतु सामूहिक प्रयासों का संकल्प – स्वच्छता अभियानों से लेकर पर्यावरण संरक्षण और आपदा प्रबंधन तक, असंख्य उदाहरण हैं जहां युवाओं ने संगठित होकर नीति को जमीन पर उतारने का कार्य किया है.
यह नागरिकता का नया, सजग और परिणामोन्मुख स्वरूप है. आज जब भारत डिजिटल लेन-देन के क्षेत्र में विश्व में अग्रणी स्थान पर है और सार्वजनिक सेवा वितरण में तकनीक के माध्यम से दक्षता का नया मानदंड स्थापित कर चुका है, तब यह स्वीकार करना होगा कि यह उपलब्धियां केवल नीतियों की उपज नहीं, बल्कि सजग, सहभागी और उत्तरदायी नागरिकों की देन हैं.
यही सहभागिता आज युवा पीढ़ी की पहचान बन चुकी है. अक्सर यह कहा जाता है कि आज का युवा सड़कों पर नहीं उतरता, इसलिए वह उदासीन है. किंतु यह दृष्टि संकीर्ण ही नहीं, समय से पिछड़ी हुई भी है. आज का युवा सड़क के साथ-साथ संस्थागत, रचनात्मक और दीर्घकालिक मार्गों को भी उतना ही महत्व देता है. वह स्थानीय प्रशासन से संवाद करता है,
डिजिटल अभियानों के माध्यम से जनचेतना जागृत करता है, स्वयंसेवी संगठनों और उद्यमिता के माध्यम से सामाजिक समस्याओं के स्थायी समाधान गढ़ता है. स्टार्ट-अप संस्कृति, सामाजिक नवाचार और सामुदायिक पहलें इस सत्य की साक्षी हैं कि यह विरोध की नहीं, निर्माण की राजनीति है.
शिक्षा के क्षेत्र में यह परिवर्तन और भी मुखर होकर सामने आता है. आंकड़े बताते हैं कि उच्च शिक्षा में छात्राओं की भागीदारी 50 प्रतिशत से अधिक हो चुकी है. स्थानीय स्वशासन संस्थाओं से लेकर नवाचार और नेतृत्व के मंचों तक, युवा नेतृत्व निरंतर उभर रहा है.
यह उस गणतांत्रिक दृष्टि का परिणाम है, जिसमें अवसर की समानता को केवल आदर्श नहीं, बल्कि नीति और व्यवहार बनाया गया. जब युवा आगे आता है तो वह केवल अपने भविष्य की नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था के सुदृढ़ीकरण की चिंता करता है.