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अश्विनी वैष्णव पर दांव क्यों लगा रहा केंद्र?

By हरीश गुप्ता | Updated: January 21, 2026 05:52 IST

आईआईटी कानपुर से इंजीनियरिंग की डिग्री और व्हार्टन से एमबीए कर चुके पूर्व आईएएस अधिकारी वैष्णव मोदी सरकार के नेतृत्व के पसंदीदा मॉडल का प्रतीक हैं.

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ठळक मुद्देवैष्णव की ताकत उनके विशिष्ट कौशलों के अनूठे संगम में निहित है.प्रशासनिक रूप से कुशल और क्रियान्वयन पर अटूट रूप से केंद्रित. प्रधानमंत्री के आर्थिक दूत के रूप में कार्य कर रहे थे.

अश्विनी वैष्णव उस तरह के मंत्री नहीं हैं जो टेलीविजन पैनलों या दैनिक सुर्खियों में छाए रहते हैं. वे जानबूझकर सादगी से रहते हैं, मीडिया की चकाचौंध से बचते हैं और राजनीतिक शोमैन की बजाय एक टेक्नोक्रेट की तरह व्यवहार करते हैं. फिर भी, नरेंद्र मोदी की सरकार में उनका महत्व उनकी दृश्यता से कहीं अधिक है. वैष्णव की ताकत उनके विशिष्ट कौशलों के अनूठे संगम में निहित है.

आईआईटी कानपुर से इंजीनियरिंग की डिग्री और व्हार्टन से एमबीए कर चुके पूर्व आईएएस अधिकारी वैष्णव मोदी सरकार के नेतृत्व के पसंदीदा मॉडल का प्रतीक हैं- तकनीकी रूप से निपुण, प्रशासनिक रूप से कुशल और क्रियान्वयन पर अटूट रूप से केंद्रित. रेल, इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मामलों के मंत्री के रूप में, उन्हें एक ऐसे व्यावहारिक प्रशासक के तौर पर देखा जाता है.

जो नीति निर्माण और क्रियान्वयन दोनों की बारीकियों को समझते हैं. उन्होंने सर्वसुलभ होने की भी छवि बनाई है. कई वरिष्ठ मंत्रियों के विपरीत, वैष्णव सोशल मीडिया का सक्रिय रूप से उपयोग करते हैं, जनता की शिकायतों का निराकरण करते हैं और रियल टाइम में शिकायतों पर नजर रखते हैं. इसके अलावा, उनके पास महत्वपूर्ण सूचना और प्रसारण मंत्रालय का प्रभार है,

जो उन्हें प्रधानमंत्री कार्यालय के साथ समन्वय सहित सरकार के संवेदनशील मीडिया प्रबंधन कार्यों के केंद्र में रखता है. इस विस्तारित भूमिका को दर्शाते हुए, सरकार की शीर्ष मीडिया टीम का एक हिस्सा अब रेल भवन से ही कार्य करता है- यह एक असामान्य लेकिन महत्वपूर्ण संस्थागत समन्वय है. इसी पृष्ठभूमि में कुछ दिन पहले वाशिंगटन में उनका चुपचाप आगमन महत्वपूर्ण हो जाता है.

आधिकारिक तौर पर, यह यात्रा महत्वपूर्ण खनिजों पर केंद्रित थी. राजनीतिक और आर्थिक दृष्टि से, इसका महत्व कहीं अधिक था. वैष्णव के पास व्यापार या खनन मंत्रालय का कोई प्रभार नहीं है. उनकी उपस्थिति ने एक और संकेत दिया : कि वे प्रधानमंत्री के आर्थिक दूत के रूप में कार्य कर रहे थे.

मोदी के करीबी और औद्योगिक कार्यान्वयन पर सीधा नियंत्रण रखने वाले मंत्री को भेजकर, नई दिल्ली ने वाशिंगटन को गंभीरता का संकेत दिया. यह केवल प्रारंभिक कूटनीति नहीं थी, बल्कि उद्देश्यपूर्ण बातचीत थी. विदेश मंत्री एस. जयशंकर रणनीतिक दिशा-निर्देश दे रहे हैं और वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल व्यापार परिधि की रक्षा कर रहे हैं,

लेकिन सत्ता का केंद्र स्पष्ट रूप से बदल गया है. उन्हें विश्व आर्थिक मंच की बैठक के लिए दावोस भी भेजा गया है. बातचीत कूटनीति से हटकर व्यावहारिक कार्यान्वयन की ओर बढ़ गई है. अब कार्यान्वयनकर्ता सबसे आगे हैं- और इस बदलाव में मोदी के सबसे भरोसेमंद सलाहकार के रूप में अश्विनी वैष्णव उभरे हैं.

अंकिता भंडारी मामला : भाजपा खुद संकट में फंसी

भाजपा ने राजनीतिक रणनीति तैयार करने में महारत हासिल कर ली है, जिसके चलते वह एक के बाद एक राज्यों में अपने प्रतिद्वंद्वियों को धूल चटा रही है. भाजपा शासित राज्यों के अधिकांश मुख्यमंत्री आराम से सत्ता में हैं, जब तक कि उच्च कमान उन्हें पद से हटाने का फैसला न कर ले. कुछ समय तक उत्तराखंड में पुष्कर सिंह धामी सरकार के लिए सब कुछ सुचारू रूप से चलता दिख रहा था.

कार्य निष्पादन और राजनीतिक प्रबंधन के मामले में आरएसएस और भाजपा दोनों के शीर्ष नेतृत्व में उनकी अच्छी साख थी. लेकिन अंकिता भंडारी हत्याकांड में उनकी कमजोरियां उजागर हो गईं. होटल की रिसेप्शनिस्ट की हत्या के तीन साल से अधिक समय बाद और इस मामले में आरोपियों को दोषी ठहराए जाने के सात महीने बाद, नए आरोप सामने आए हैं,

जिनमें एक वरिष्ठ भाजपा नेता पर संलिप्तता का आरोप लगाया गया है. इस नए आक्रोश ने मुख्यमंत्री को अंकिता भंडारी के माता-पिता से मिलने और उनकी हत्या में कथित तौर पर शामिल ‘वीआईपी’ की पहचान के लिए सीबीआई जांच का आदेश देने के लिए मजबूर कर दिया. इससे कांग्रेस को बड़ा फायदा हुआ और भाजपा कमजोर पड़ गई.

इसका कारण जांच में नहीं, बल्कि भाजपा नेताओं की कई ऐसी गलतियों में निहित था जिन्हें टाला जा सकता था और जिनसे मामला धीरे-धीरे उलझता चला गया. यदि वीआईपी की पहचान स्थापित करने के लिए सीबीआई जांच अपरिहार्य थी, तो सवाल उठता है कि यह पहले क्यों नहीं की गई. शायद इसका कारण यह था राज्य भाजपा अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने इस मामले के मुखबिर को ‘कांग्रेस की कठपुतली’ करार दिया.

मुखबिर, जो पूर्वोत्तर का एक छात्र है, ने दावा किया कि ‘जी’ नाम का एक व्यक्ति पुलकित आर्य के माध्यम से अंकिता भंडारी पर ‘विशेष सेवाओं’ के लिए दबाव डाल रहा था, और अंकिता के इनकार के कारण उसकी हत्या कर दी गई. इन दावों के बाद, एक वरिष्ठ भाजपा नेता का नाम सामने आया, जिससे उन्हें न्यायिक हस्तक्षेप का सहारा लेना पड़ा.

भाजपा में नए अध्यक्ष के सम्मान की चिंता

पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने चुपचाप एक आंतरिक निर्देश जारी किया है: वरिष्ठ नेताओं से अनुरोध किया गया है- यहां शब्द का विशेष महत्व है - कि वे नए अध्यक्ष नितिन नबीन को केवल अध्यक्षजी कहकर संबोधित करें. भैयाजी नहीं, नितिन बाबू नहीं, और निश्चित रूप से खतरनाक हद तक स्नेहपूर्ण ‘अरे नितिन!’ भी नहीं. समस्या उम्र की है.

नबीन लगभग हर महत्वपूर्ण नेता से कम उम्र के हैं, और बिहार भाजपा में ऐसे दिग्गज नेता भरे पड़े हैं जो मंडल युग से ही एक-दूसरे को भाई कहकर बुलाते आए हैं. पुरानी आदतें, पुराने नेताओं की तरह, आसानी से नहीं बदलतीं. दिल्ली में इस बात को लेकर वाकई चिंता है कि किसी सार्वजनिक सभा में अनायास ही ‘भैयाजी’ कह देने से नए अध्यक्ष की सावधानीपूर्वक बनाई गई सत्ता को ठेस पहुंच सकती है.

खबरों के मुताबिक, भाजपा के दो मुख्यमंत्रियों को उन्हें उनके पहले नाम से पुकारते हुए सुना गया. आखिर राजनीति में सम्मान अक्सर पदनाम से कम और हाथ जोड़ने के तरीके से ज्यादा आंका जाता है. फिलहाल, परिपत्र लागू है. अध्यक्षजी इसे लागू करते हैं या नहीं, यह अलग बात है.

कांग्रेस क्यों नहीं सीखती सबक?

अगर कांग्रेस कोई एक राजनीतिक सबक सीखने से लगातार इनकार कर रही है, तो वह है अनिर्णय का खामियाजा. पार्टी ने बिहार में गठबंधन को अंतिम क्षण तक टाल दिया और इसकी कीमत चुकाई. इससे पहले उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और गोवा में भी यही सिलसिला जारी रहा - अस्पष्टता और विलंबित निर्णय. अब तमिलनाडु में भी स्थिति चिंताजनक रूप से मिलती-जुलती दिख रही है.

राज्य स्तर पर कांग्रेस पुराने नेताओं और राहुल गांधी से जुड़े युवा नेतृत्व के बीच खींचतान में फंसी हुई है. वरिष्ठ नेता सत्तारूढ़ डीएमके के साथ गठबंधन को मजबूत करना चाहते हैं, उनका तर्क है कि तमिलनाडु में अस्तित्व द्रविड़ खेमे में मजबूती से बने रहने पर निर्भर करता है. वहीं, युवा नेता मणिक्कम टैगोर और ज्योतिमणि चाहते हैं कि कांग्रेस अभिनेता से राजनेता बने विजय की पार्टी ‘तमिलगा वेट्री कजगम’ (टीवीके) के साथ संभावित समझौते की संभावना तलाश कर अपने विकल्प खुले रखे. राहुल गांधी की हालिया तमिलनाडु यात्रा से स्थिति स्पष्ट होने की उम्मीद थी.

लेकिन इसके विपरीत, इससे अनिश्चितता और बढ़ गई. विजय की फिल्म ‘जना नायकन’ को पोंगल पर रिलीज न किए जाने पर सेंसर बोर्ड की उनकी सार्वजनिक आलोचना को एक राजनीतिक संकेत के रूप में देखा गया, जिससे डीएमके में बेचैनी पैदा हुई और टीवीके समर्थक खेमे को बल मिला. फिलहाल राहुल गांधी डीएमके को आश्वस्त करते नजर आ रहे हैं,

साथ ही अपने युवा सहयोगियों को विजय के विकल्प को जीवित रखने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं- ताकि अधिक सीटें और सत्ता में हिस्सेदारी हासिल की जा सके. यह कांग्रेस की जानी-पहचानी आदत है: हर जगह टालमटोल करना, कहीं भी निर्णायक न होना और समय के साथ विरोधाभासों के सुलझने की उम्मीद करना. इतिहास गवाह है कि ऐसा बहुत कम होता है.

टॅग्स :Ashwini Vaishnavउत्तराखण्डUttarakhandBJPNitin NabinTamil Nadu Assembly
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