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विजय दर्डा का ब्लॉगः वैश्विक मंच पर भारत को अमेरिकी सलाम

By विजय दर्डा | Updated: November 21, 2022 08:11 IST

वैसे भारत ने 17वें सम्मेलन के दौरान अपना रुख साफ कर दिया है कि हम किसी खेमे में नहीं हैं और वसुधैव कुटुम्बकम में विश्वास रखते हैं। बीते सितंबर में शंघाई सहयोग संगठन की बैठक के दौरान रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से नरेंद्र मोदी ने कहा था कि यह वक्त युद्ध का नहीं है।

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आर्थिक दृष्टि से विश्व के बीस शक्तिशाली और प्रभावशाली देशों के समूह जी-20 के 17वें सम्मेलन में अमेरिकी राष्ट्रपति की भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सैल्यूट करती तस्वीर वायरल हो रही है।  वास्तव में ये तस्वीर दुनिया के मंच पर भारत की गहरी होती छाप की परिचायक है। अमेरिका का कोई भी राष्ट्रपति हो, वह किसी दूसरे राष्ट्र के प्रमुख को सामान्य तौर पर सैल्यूट नहीं करता है। बाइडेन ने ऐसा किया तो इसे पूरी दुनिया नए संकेत के रूप में ले रही है। इसी सम्मेलन में मोदीजी की फ्रांस के राष्ट्रपति इमेनुअल मैक्रों और ब्रिटेन के नये-नवेले प्रधानमंत्री  ऋषि सुनक के साथ की तस्वीर भी मोदीजी की कूटनीति और भारतीय प्रभाव को दर्शाने के लिए काफी है। जिस अंदाज में वे चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मिले उसका भी संदेश स्पष्ट है कि भारत को कोई भी देश अब हल्के में न ले! महत्वपूर्ण बात यह कि जी-20 सम्मेलन में भारत की भूमिका की तारीफ महाबली अमेरिका ने भी की है।

जी-20 सम्मेलन में भारत की भूमिका की चर्चा से पहले चलिए सबसे पहले इस बात पर गौर करते हैं कि दुनिया के मंच पर इसकी महत्ता क्या है? वैसे तो इस समूह की बुनियाद जी-7 के रूप में पड़ी थी जिसका गठन अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, ब्रिटेन और कनाडा ने मिलकर किया था। बाद में रूस शामिल हुआ और अब यह 20 देशों का समूह बन चुका है। जी-20 में अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, कनाडा, चीन, फ्रांस, जर्मनी, भारत, इंडोनेशिया, इटली, जापान, दक्षिण कोरिया, मैक्सिको, रूस, सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका, तुर्की, ब्रिटेन, अमेरिका और यूरोपीय संघ शामिल हैं। इस समूह की महत्ता को इसी बात से समझा जा सकता है कि दुनिया की करीब 60 प्रतिशत आबादी इन्हीं देशों में रहती है और दुनिया के जीडीपी का करीब 80 प्रतिशत हिस्सा इन्हीं देशों से आता है। इतना ही नहीं वैश्विक कारोबार का 75 प्रतिशत  से ज्यादा हिस्सा इन्हीं देशों से जुड़ा हुआ है। वैश्विक निवेश भी करीब 80 प्रतिशत है।

जाहिर सी बात है कि ऐसे समूह की अध्यक्षता भारत के हाथ में आना कोई छोटी-मोटी बात नहीं है। बहुत बड़ी बात है। खासकर तब जब खेमों में बंटी दुनिया वर्चस्व की लड़ाई में उलझी हुई है। महाशक्तियों के बीच गहरा अविश्वास है। आर्थिक हथियार से चीन बहुत सारे देशों को जख्मी कर चुका है और उसकी विस्तारवादी नीतियां छोटे देशों को हजम कर जाने की फिराक में हैं। रूस ने यूक्रेन पर हमला कर रखा है और दुनिया भर की आपूर्ति शृंखला बुरी तरह प्रभावित हो चुकी है। पाकिस्तान आतंक का गढ़ बना हुआ है और खुद बाइडेन भी यह बात खुलेआम कह चुके हैं। स्वाभाविक सी बात है कि चीन और पाकिस्तान जैसे देशों को यह बात बहुत चुभ रही होगी कि जी-20 की अध्यक्षता भारत के पास क्यों आ गई और भारत का रुख क्या होगा?

वैसे भारत ने 17वें सम्मेलन के दौरान अपना रुख साफ कर दिया है कि हम किसी खेमे में नहीं हैं और वसुधैव कुटुम्बकम में विश्वास रखते हैं। बीते सितंबर में शंघाई सहयोग संगठन की बैठक के दौरान रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से नरेंद्र मोदी ने कहा था कि यह वक्त युद्ध का नहीं है। वही बात फिर दोहराई और जी-20 के घोषणापत्र में यह दर्ज भी हुई। इस सम्मेलन में मोदीजी ने स्पष्ट तौर पर कहा कि इस संगठन को भारत वैश्विक कल्याण के लिए लाभकारी बनाएगा। वास्तव में भारत आज ऐसी स्थिति में है जब वह एक तरफ अमेरिका के साथ स्पष्ट बातें करता है तो अपने पुराने मित्र रूस की गलतियों पर भी उंगली उठाने से परहेज नहीं करता। हालांकि जी-20 की अध्यक्षता कोई फूलों की सेज नहीं है। मौजूदा परिस्थितियों में तो यह निश्चित रूप से कांटों का ताज है लेकिन मोदीजी की कूटनीति ऐसी है कि वे सबसे सहज संबंध स्थापित कर लेते हैं। किसी से गले मिल लेते हैं तो किसी की पीठ थपथपा देते हैं। उनका अंदाज स्वाभिमान से भरा होता है। जाहिर सी बात है कि यह स्वाभिमान भारत का है। मौजूदा दौर में जिस तरह से मोदीजी ने भारत को खेमेबाजी से दूर रखा है, उससे मुझे भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की याद आ जाती है। भारत स्वतंत्र हुआ था। कमजोर था लेकिन पंडितजी ने किसी भी खेमे के साथ जाने के बजाय गुट निरपेक्षता का रास्ता अख्तियार किया। गुटनिरपेक्षता की जो नींव पंडितजी ने रखी थी, उसी रास्ते पर इंदिरा गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी चले और अब यशस्वी ढंग से नरेंद्र मोदी उसे आगे बढ़ा रहे हैं।

जी-20 के अध्यक्ष के रूप में भारत का कार्यकाल 1  दिसंबर से शुरू हो रहा है। अगले साल का सम्मेलन भारत की अध्यक्षता में होगा। इस बीच 200 कार्यक्रमों की रूपरेखा पहले से तैयार कर ली गई है। भारत ने अपने समावेशी रुख का परिचय देते हुए वर्ष 2023 के सम्मेलन के लिए बांग्लादेश, मिस्र, मॉरिशस, नीदरलैंड, नाइजीरिया, ओमान, सिंगापुर, स्पेन और यूएई को अतिथि देश के रूप में आमंत्रित कर लिया है। जाहिर सी बात है कि भारत के सामने यह बड़ा अवसर भी है। जी-20 के अध्यक्ष के रूप में सफलता से जो विश्वसनीयता अर्जित होगी, वह अंतरराष्ट्रीय निवेशकों को आकर्षित करने में भी कामयाब होगी। हमारे कारोबारियों और उद्योगपतियों के लिए दुनिया भर में काम करना आसान होगा। हमारे युवाओं को शिक्षा से लेकर कौशल तक में नई राह मिलेगी।

मैंने पहले भी लिखा है कि 2050 तक भारत दुनिया की दूसरी बड़ी आर्थिक शक्ति के रूप में विकसित हो जाएगा। भारत की बढ़ती हुई सक्रियता इसी बात का संकेत दे रही है। उम्मीद करें कि ऐसा ही हो..! यह पूरा प्रसंग आम आदमी की आर्थिक बेहतरी से जुड़ा है। हम समय-समय पर इससे आपको अवगत कराते रहेंगे।

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