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वेदप्रताप वैदिक का ब्लॉग: शिवसेना की निर्थक जिद

By वेद प्रताप वैदिक | Updated: November 5, 2019 05:58 IST

भाजपा को रोकने के लिए राकांपा और कांग्रेस, शिवसेना को अपने कंधे पर जरूर बिठा सकती हैं लेकिन उसे वे कब और कितने गहरे में पटकेंगी इसकी कल्पना शिवसेना के नेता अभी नहीं कर पा रहे हैं.

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महाराष्ट्र में भाजपा और शिवसेना के बीच जो खेल चल रहा है, उसका अर्थ क्या है? क्या यह नहीं कि हमारी राजनीतिक पार्टियों को किसी सिद्धांत, नीति या विचारधारा से भी कहीं ज्यादा श्रद्धा सत्ता पाने में है? वे कुर्सी पाने के लिए किसी भी हद तक जा सकती हैं. शिवसेना की सौदेबाजी यही संकेत दे रही है कि वह अपना मुख्यमंत्नी बनाने के लिए शरद पवार की पार्टी राकांपा या सोनिया गांधी की पार्टी कांग्रेस से भी हाथ मिला सकती है. ये वे पार्टियां हैं, जिन्हें कोसते-कोसते शिवसेना का गला सूखता रहा है. उसके प्रवक्ता ने कहा है कि शिवसेना की सरकार को 175 विधायकों का समर्थन मिलेगा.

भाजपा को रोकने के लिए राकांपा और कांग्रेस, शिवसेना को अपने कंधे पर जरूर बिठा सकती हैं लेकिन उसे वे कब और कितने गहरे में पटकेंगी इसकी कल्पना शिवसेना के नेता अभी नहीं कर पा रहे हैं. शिवसेना ने अपने समान विचारवाली पार्टी के साथ पिछले पांच साल कैसे काटे हैं, यह किसी से छिपा नहीं है. अब यदि कांग्रेस और राकांपा के साथ उसने सरकार बना ली तो यह बेमेल गठबंधन शीघ्र धराशायी हो जाएगा. 

शिवसेना की तो जड़ें उखड़ सकती हैं. इस वक्त भाजपा यदि सत्ता का मोह छोड़ दे और इस अप्राकृतिक राजनीतिक गठबंधन को होने दे तो वह शीघ्र ही प्रचंड बहुमत से सत्ता में लौट सकती है. यदि भाजपा अपने रवैये पर डटी रहे तो शिवसेना शायद यथार्थ को समझ लेगी.

यह पता नहीं कहां तक सच है कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने चुनाव के पहले जल्दबाजी में शिवसेना को मुख्यमंत्नी पद के बंटवारे की बात कह दी थी.  शिवसेना को यदि भाजपा के बराबर या उससे ज्यादा सीटें मिल जातीं तो भी कोई बात थी लेकिन इस समय वह जो कुछ कर रही है, वह बेकार की जिद के अलावा कुछ नहीं है.

टॅग्स :महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव 2019विधानसभा चुनावशिव सेना
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