Unnao Rape Case: न्याय की भाषा के सवाल का हल भी जरूरी
By कृष्ण प्रताप सिंह | Updated: January 3, 2026 05:57 IST2026-01-03T05:57:38+5:302026-01-03T05:57:38+5:30
Unnao Rape Case: पीड़िता ने विभिन्न समाचार माध्यमों से बातचीत में बार-बार और साफ-साफ कहा है कि सेंगर के खिलाफ संघर्ष की राह में उसके सामने दूसरी कई बाधाएं तो थीं ही,

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Unnao Rape Case: उन्नाव के आठ साल पुराने बहुचर्चित रेप मामले में 20 दिसंबर, 2019 को दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट के जिला एवं सत्र न्यायाधीश (पश्चिम) द्वारा दोषी करार दिए गए रसूखदार कुलदीप सिंह सेंगर की उम्र कैद की सजा निलंबित कर उसे जमानत देने का दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला (जिसे अब सर्वोच्च न्यायालय ने स्थगित कर दिया है) आया तो, जैसा कि बहुत स्वाभाविक था, कई प्रकार के उद्वेलन पैदा हुए. लेकिन तमाम तनी हुई भृकुटियों के बीच एक जरूरी सवाल पूरी तरह अचर्चित रह गया. यह सवाल न्याय की भाषा का है और इस मायने में व्यापक चर्चा व समाधान की मांग करता है कि इस मामले की पीड़िता ने विभिन्न समाचार माध्यमों से बातचीत में बार-बार और साफ-साफ कहा है कि सेंगर के खिलाफ संघर्ष की राह में उसके सामने दूसरी कई बाधाएं तो थीं ही,
अदालती कार्रवाई की भाषा भी एक बड़ी समस्या बनकर सामने आई. उसी के शब्दों में कहें तो : ‘अदालत की कार्यवाही हिंदी में हो तो मैं अपना केस खुद लड़कर दुनिया के सामने सारी सच्चाई स्पष्टता के साथ रख दूं. ...दिल्ली हाईकोर्ट में बलात्कारी की याचिका पर बहस हिंदी में होती तो भी मैं अपना केस खुद लड़ लेती. लेकिन क्या करूं, थोड़ी इंग्लिश कमजोर है मेरी. कुछ-कुछ चीजें ही समझ में आती हैं.’
इस सिलसिले में सोचने की सबसे बड़ी बात यह है कि क्या यह सिर्फ इसी एक पीड़िता की समस्या है? और जवाब है : नहीं, बड़ी संख्या में अन्य पीड़ित भी देश की आजादी के पचहत्तर साल पुरानी हो जाने के बावजूद अपने लिए अपनी समझ में आने वाली भाषा में न्याय की लड़ाई लड़ने के अवसरों से वंचित हैं.
यह स्थिति उन्हें न सिर्फ साधारण से साधारण मामलों में भी ऊंची फीस लेने वाले वकीलों का मोहताज बनाती है बल्कि जब उनके वकील व जज उनके मामले में फैसले तक पहुंचने की अदालती कार्रवाई में मुब्तिला होते हैं, वे बिना कुछ समझे उसे टुकुर-टुकुर निहारने को अभिशप्त होते हैं.
इसीलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्रायः कहते रहते हैं कि अदालती कार्यवाही और फैसलों की भाषा ऐसी होनी चाहिए जिसे साधारण व्यक्ति भी समझ सकें, न कि केवल कानूनी विशेषज्ञ. गत वर्ष आठ नवंबर को सर्वोच्च न्यायालय में कानूनी सहायता वितरण तंत्र को सुदृढ़ बनाने को लेकर आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए भी उन्होंने यह बात दोहराई थी.
साथ ही कहा था कि इसके बगैर सारे देशवासियों के लिए सामाजिक न्याय कतई सुनिश्चित नहीं किया जा सकता. वह तो तभी किया जा सकता है, जब इंसाफ की भाषा हर सामाजिक व आर्थिक पृष्ठभूमि के लोगों के लिए बोधगम्य हो. उम्मीद की जानी चाहिए कि प्रधानमंत्री की यह सदाशयता नए साल में रंग लाएगी और इंसाफ आम लोगों, साफ कहें तो पीड़ितों, की भाषा में उनके पास आने लगेगा. निस्संदेह, तब उन्हें कानूनी प्रक्रिया से डर लगना बंद हो जाएगा और उसमें उनका विश्वास तेजी से बढ़कर नई ऊंचाइयां छुएगा.