ज्ञान और भाषा का बड़ा गहरा रिश्ता है. महान चिंतक भर्तृहरि की मानें तो भाषा के आलोक में ही दुनिया दिखती है : सर्वं शब्देन भासते. भारत भाषाओं की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है जहां एक हजार से अधिक भाषाएं विद्यमान हैं. हिंदी भारत के लोक जीवन में व्याप्त रही और देश के स्वतंत्रता संग्राम में उसकी अखिल भारतीय भागीदारी ने उसे राष्ट्रभाषा बना दिया. जनता से जुड़ने के प्रयास में हिंदी भारत में चतुर्दिक गूंजी.
सहज संपर्क के लिए हिंदी स्वाभाविक माध्यम बनी. महाराष्ट्र हो या बंगाल, कश्मीर हो या गुजरात,पंजाब हो या दक्षिण भारत- हर कहीं हिंदी को अंगीकार किया गया. अंग्रेज सरकार ने सरकारी तंत्र और शिक्षा में अंग्रेजी वर्चस्व स्थापित किया जिसके अवशेष अभी भी विद्यमान हैं.
हिंदी की अंतरराष्ट्रीय छवि को तब विशेष बल मिला जब 10 जनवरी 1975 को नागपुर में विश्व हिंदी सम्मेलन का पहली बार आयोजन हुआ. इस ऐतिहासिक पहल की स्मृति में 2006 से ‘विश्व हिंदी दिवस’ मनाया जा रहा है. हिंदी को अंतरराष्ट्रीय भाषा के रूप में बढ़ावा देने के संकल्प के साथ यह आयोजन शुरू हुआ था और तब से बारह ऐसे सम्मेलन भारत और अन्य देशों में हो चुके हैं.
माॅरिशस में एक विश्व हिंदी सचिवालय तथा वर्धा में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय बना है. अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक संबंध परिषद अनेक देशों में हिंदी के अध्ययन-अध्यापन के लिए प्राध्यापकों को उपलब्ध कराती है. हिंदी के वैश्विक प्रचार-प्रसार के अनेक प्रयास हो रहे हैं. 12 वां विश्व हिंदी सम्मेलन फिजी में हुआ था.
ऐसे सम्मेलनों से न केवल हिंदी को वैश्विक मंच मिला है बल्कि विश्व में अन्यत्र रहने वाले हिंदीभाषियों के बीच संबंधों को सुदृढ़ करने में भी मदद मिली है. आज हिंदी भाषा संयुक्त राष्ट्र में गैरआधिकारिक भाषाओं की सूची में सम्मिलित है. विश्व में अंग्रेजी और मंडारिन (चीनी) भाषाओं के बाद इसी का स्थान आता है. प्रवासी समुदाय में हिंदी प्रचलित है, उसका उच्च कोटि का साहित्य है और अनुमानतः 60 करोड़ से अधिक लोग इसे बोलते हैं. हिंदी के प्रति जागरूकता और प्रचार-प्रसार का कार्य प्रगति पर है.
इस वर्ष विश्व हिंदी दिवस पारंपरिक ज्ञान से कृत्रिम बुद्धिमत्ता तक के विकास पर केंद्रित है. आज इसे कोडिंग से लेकर डिजिटल प्लेटफार्म पर उपयोग के लिए आसान बनने का प्रयास हो रहा है. मशीन अनुवाद में बड़ी सफलता मिल रही है.
कृत्रिम मेधा ( एआई) के सहयोग से अपार संभावनाएं उभर रही हैं जिससे हिंदी को बड़ा आकाश मिल सकेगा. उल्लेखनीय है कि संयुक्त राष्ट्र में अंग्रेजी, फ्रेंच, स्पेनिश, चीनी, अरबी और रूसी आधिकारिक भाषाएं हैं. स्मरणीय है कि संयुक्त राष्ट्र में हिंदी की गूंज 4 अक्तूबर 1977 को विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के भाषण द्वारा हुई थी परंतु अभी तक वह आधिकारिक भाषा की सूची में नहीं आ सकी है.
स्मृति और भाषा के बीच जैसे बड़ा गहरा रिश्ता है उसी तरह स्मृति हमारी अपनी पहचान से भी जुड़ी हुई है. विश्व के अनेक देशों में फैले भारतीय मूल के लोगों का हिंदी से लगाव और भारतीय संस्कृति के संरक्षण में रुचि इसकी पुष्टि करती है. विदेशों के कई विश्वविद्यालय हिंदी के अध्यापन और अनुसंधान में लगे हुए हैं. हिंदीभाषी जन-समुदाय के संख्या बल को देखते हुए एक बड़े बाजार का अवसर भी दिखता है और हिंदी के प्रसार को बल मिलता है.