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रहीस सिंह का ब्लॉग: अमेरिका-चीन की लड़ाई में भारत को अपनाना होगा संतुलित रवैया

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: June 12, 2020 14:06 IST

जी-7 उन सात विकसित देशों का समूह है जो अब तक वैश्विक अर्थव्यवस्था, जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल गवर्नेस सहित तमाम विषयों पर दुनिया को दिशा-निर्देश देने की कोशिश करता रहा. लेकिन कोविड महामारी के दौर में इन देशों की चरमराती व्यवस्थाएं और टूटती एकजुटता यह संदेश दे रही है कि ये अब वैश्विक अर्थव्यवस्था का नेतृत्व करने में सक्षम नहीं रहे हैं इसलिए अब इन्हें अपने साथ भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं को लेकर चलना चाहिए.

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 हाल ही में जी-7 की सितंबर में संभावित शिखर बैठक में भारत, रूस, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण कोरिया को आमंत्रित करने की अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की योजना पर चीन ने नाराजगी भरी प्रतिक्रिया दी थी. चीनी विदेश मंत्रलय के प्रवक्ता का कहना था कि बीजिंग के खिलाफ किसी भी गुटबंदी का प्रयास नाकाम साबित होगा.

इसके साथ ही बीजिंग से चीनी विदेश मंत्रलय के प्रवक्ता झाओ लिजियन द्वारा यह भी कहा गया कि चीन का मानना है कि सभी अंतरराष्ट्रीय संगठनों और सम्मेलनों को विभिन्न देशों के बीच आपसी विश्वास बढ़ाने वाला होना चाहिए, जिससे बहुपक्षीयता कायम रह सके और विश्व शांति तथा विकास को बढ़ावा मिल सके. लेकिन चीन की प्रतिक्रिया और चीन की नई विश्वव्यवस्था स्थापित करने की कोशिश क्या वास्तव में विश्व शांति एवं विकास को बढ़ावा देने वाली लगती है? इसके साथ ही कुछ सवाल भी हैं.

पहला- क्या चीन वास्तव में विश्व शांति एवं विकास के लिए काम कर रहा है या फिर उसके द्वारा अपनाई जा रही जियो-पॉलिटिक्स एवं टैक्टिक्स नए तरह के क्षेत्रीय संघर्षो को जन्म देने वाली है?

दूसरा- चीन को भारत जैसे उदारवादी प्रगतिशील देश की विश्व व्यवस्था के निर्माण में सक्रियता अखरती क्यों है?

तीसरा- एक बड़ी अर्थव्यवस्था के दम पर एक विशाल आकार वाली सेना खड़ी कर दुनिया को धौंस दिखाने और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के अधिकारों का अतिक्रमण करने वाला यह देश आखिर इतना डरा हुआ क्यों रहता है?

चौथा- चीन इन दिनों अपने बढ़ते हुए ट्रस्ट डेफिसिट से गुजर रहा है और भारत के प्रति दुनिया का विश्वास बढ़ा है, ऐसे में चीन का भारत के  साथ व्यवहार कैसा रहेगा?

एक बात और, अमेरिका की रणनीति क्या है? अर्थात क्या वह वास्तव में चीन से लड़ना चाहता है या दूसरे देशों को चीन से उलझाकर अपना मकसद पूरा करना चाहता है? क्या जी-7 में भारत सहित तीन अन्य देशों को शामिल करने संबंधी ट्रम्प का निर्णय इसी दूसरे विकल्प का हिस्सा है या फिर अमेरिका सचमुच पुराने पड़ गए इस संगठन को विस्तार देकर वैश्विक अर्थव्यवस्था के निर्माण में इसे अधिक लोकतांत्रिक और सर्वानुगामी बनाना चाहता है? यदि ऐसा है तो फिर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के ढांचे में परिवर्तन लाने के लिए वह इसी तरह का आह्वान क्यों नहीं करता?

जी-7 उन सात विकसित देशों का समूह है जो अब तक वैश्विक अर्थव्यवस्था, जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल गवर्नेस सहित तमाम विषयों पर दुनिया को दिशा-निर्देश देने की कोशिश करता रहा. लेकिन कोविड महामारी के दौर में इन देशों की चरमराती व्यवस्थाएं और टूटती एकजुटता यह संदेश दे रही है कि ये अब वैश्विक अर्थव्यवस्था का नेतृत्व करने में सक्षम नहीं रहे हैं इसलिए अब इन्हें अपने साथ भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं को लेकर चलना चाहिए. प्रथम दृष्टया तो यह भारत के लिए सम्मान का विषय है कि भारत दुनिया की सात विकसित अर्थव्यवस्थाओं के अंतरसरकारी संगठन का स्थायी हिस्सा बनने जा रहा है. लेकिन अमेरिका एक पारंगत बिजनेसमैन की तरह है इसलिए यह समझने की जरूरत होगी कि उसकी इस न्यू इकोनॉमिक डिप्लोमेसी की कैलकुलस में असल पक्ष क्या है.

को देखते हुए भारत को अवसरों के साथ-साथ भावी चुनौतियों का भी आकलन करना होगा. अमेरिका और चीन के बीच व्यापक टकराव की संभावनाओं को देखते हुए भारत के सामने दो विकल्प हैं. पहला यह कि भारत जिस तरह से पॉलिसी ऑफ बैलेंसिंग पर काम करता रहा है, आगे भी जारी रखे. लेकिन यदि दोनों देशों के बीच व्यापक टकराव की स्थिति बनती है तो यह विकल्प अव्यावहारिक भी साबित हो सकता है. ऐसी स्थिति में भारत को अन्य विकल्पों पर भी विचार करना होगा. दूसरा विकल्प किसी एक के साथ खड़े होने का है. शायद चीन को यह भय है कि भारत अमेरिका के साथ खड़ा होगा.

शायद इसी वजह से चीन ने भारत पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के लिए न केवल सीमा पर सैन्य गतिविधियां बढ़ाईं और एलएसी का उल्लंघन किया बल्कि वह नेपाल और पाकिस्तान को भी उकसा रहा है. दरअसल चीन नहीं चाहता कि उसके बढ़ते ट्रस्ट डेफिसिट का फायदा भारत उठाए. चूंकि राष्ट्रपति ट्रम्प भी कूटनीति के अस्थिर एवं जटिल ट्रैक पर चल रहे हैं, इसलिए उनसे भी ठोस अपेक्षा नहीं की जा सकती. ऐसे में भारत के लिए संतुलित रणनीति और इंडिया सेंट्रिक कूटनीति के साथ फारवर्ड ट्रैक पर चलने का निर्णय लेना ज्यादा उचित लगता है.

टॅग्स :चीनअमेरिका
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