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पुण्य प्रसून वाजपेयी का नजरियाः डॉलर पर निर्भर होता दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र

By पुण्य प्रसून बाजपेयी | Updated: September 10, 2018 05:44 IST

ये कहकर कोई सरकार बच भी नहीं सकती है कि उसके खजाने में डॉलर भरा पड़ा है, विदेशी निवेश पहले की सरकार की तुलना में कहीं ज्यादा है तो चिंता किस बात की।

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हो सकता है डॉलर के मुकाबले रुपए की गिरती कीमत का असर सरकार पर न पड़ रहा हो और सरकार यह सोच रही हो कि उसका वोटर तो देशभक्त है और रुपया देशभक्ति का प्रतीक है क्योंकि डॉलर तो विदेशी करेंसी है। पर जब किसी देश की अर्थव्यवस्था संभाले न संभले तो सवाल सिर्फ करेंसी का नहीं होता। और ये कहकर कोई सरकार बच भी नहीं सकती है कि उसके खजाने में डॉलर भरा पड़ा है, विदेशी निवेश पहले की सरकार की तुलना में कहीं ज्यादा है तो चिंता किस बात की।

दरअसल देश जिस रास्ते निकल पड़ा है उसमें सवाल सिर्फ डॉलर के मुकाबले रुपए के कमजोर होने भर का नहीं है। देश में उच्च शिक्षा का स्तर इतना नीचे जा चुका है कि 40 फीसदी की बढ़ोत्तरी बीते तीन बरस में छात्नों के विदेश जाने की हो गई है। सिर्फ पेट्रोल-डीजल ही नहीं बल्कि कोयला खदानों को लेकर सरकार के रु ख ने ये हालात पैदा कर दिए हैं कि कोयले का आयात 66 फीसदी तक बढ़ गया है। भारत में इलाज सस्ता जरूर है लेकिन विदेश में इलाज कराने जाने वालों की तादाद में 22 फीसदी की बढ़ोत्तरी हो गई है। चीनी, चावल, गेहूं, प्याज के आयात में भी 6 से 11 फीसदी तक की बढ़ोत्तरी हो गई है। और दुनिया के बाजार से कोई भी उत्पाद लाने या दुनिया के बाजार में जाकर पढ़ाई करने या इलाज कराने का मतलब है डॉलर से भुगतान करना। 2013-14 में भारत से विदेश जाकर पढ़ने वाले छात्नों को 61.71 रुपए के हिसाब से डॉलर का भुगतान करना पड़ता था। विदेश में पढ़ रहे भारतीय बच्चों को ट्यूशन फीस और होस्टल का कुल खर्च 1.9 बिलियन डॉलर यानी 117 अरब 24 करोड़ 90 लाख रुपए देने पड़ते थे। 2017-18 में ये रकम बढ़कर 2.8 बिलियन डॉलर यानी 201 अरब 88 करोड़ रुपए हो गई। और ये रकम इसलिए बढ़ गई क्योंकि रुपया कमजोर हो गया।  यानी डॉलर जो 72 रु पए को छू रहा है अगर वह 2013-14 के मूल्य के बराबर टिका रहता तो करीब तीस अरब रुपए से ज्यादा भारतीय छात्रों का बच जाता। परंतु डॉलर या रुपए से इतर ज्यादा बड़ा सवाल तो ये हो चला है कि उच्च शिक्षा के लिए अगर भारतीय बच्चे विदेश जा रहे हैं और पढ़ाई के बाद भारत लौटना नहीं चाहते हैं तो जिम्मेदारी किसकी होगी या फिर वोट बैंक पर असर नहीं पड़ता है यह सोच कर हर कोई खामोश है। क्योंकि आलम तो ये भी है कि अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जाकर पढ़ने वाले बच्चों की तादाद लाखों में बढ़ गई है।

तो क्या सिर्फ डॉलर के मुकाबले रुपए की कम होती कीमत भर का मामला है। क्योंकि देश छोड़कर जाने वालों की तादाद और दुनिया के बाजार से भारत आयात किए जाने वाले उत्पादों में लगातार वृद्धि हो रही है। और इसे हर कोई जानता समझता है कि डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर होगा तो आयल इम्पोर्ट बिल बढ़ जाएगा। सवाल सिर्फ डॉलर की कीमत बढ़ने या रुपए का मूल्य कम होने भर का नहीं है बल्कि देश की राजनीतिक व्यवस्था ने सिर्फ तेल, कोयला, स्टील, सेव, मेवा, प्याज, गेहूं भर को डॉलर पर निर्भर नहीं किया है बल्किएक वोट का लोकतंत्न भी डॉलर पर निर्भर हो  चला है।

टॅग्स :डॉलरभारतीय रुपया
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